सांप-मगरमच्छ बॉर्डर गार्ड: सुरक्षा का जंगली प्रयोग या मानव-पर्यावरण का खुला उल्लंघन?

Anand Kumar
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Jan-man Opinion

नयी दिल्ली में गृह मंत्रालय (MHA) का एक ऐसा प्रस्ताव सामने आया है जो सुनने में किसी जासूसी थ्रिलर की पटकथा लगता है, लेकिन हकीकत में यह पर्यावरण, मानवाधिकार और वैज्ञानिक सोच का मजाक बनकर रह गया है। यह योजना है भारत-बांग्लादेश की 175 किलोमीटर लंबी नदी-दलदली सीमा पर सांप और मगरमच्छ जैसे रेंगने वाले सरीसृपों को ‘तैनात’ करने की।

अमित शाह के निर्देश पर BSF को 26 मार्च को भेजे गए एक गोपनीय संदेश में साफ कहा गया है – कमजोर नदी गैप्स में रेप्टाइल्स (सांप/मगरमच्छ) की संभावना तलाशो और ऑपरेशनल दृष्टि से इसकी जांच करो।

क्या रेप्टाइल्स सुरक्षा का स्मार्ट समाधान हैं?

निश्चित रूप से सुरक्षा की चिंता जायज है। पश्चिम बंगाल के सुंदरबन जैसे मैंग्रोव क्षेत्र में स्मगलिंग, घुसपैठ और हथियारों की तस्करी एक पुरानी और गंभीर समस्या है। चूंकि पारंपरिक बाड़ लगाना यहाँ असंभव है, इसलिए BSF को कुछ ‘क्रिएटिव’ सोचना पड़ा। लेकिन क्या जानवरों को हथियार बनाना वाकई एक स्मार्ट समाधान है? या यह सरकारी हताशा का सबसे अजीब और खतरनाक उदाहरण है?

1. कानूनी पेंच: वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972

लेख का सबसे पहला और सबसे गंभीर सवाल कानूनी है। पर्यावरण कार्यकर्ता और वन्यजीव विशेषज्ञ फिरोज अहमद (आरण्यक) ने साफ कहा है कि यह भारतीय वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम 1972 का सीधा उल्लंघन है। कोई भी प्रजाति को उसके प्राकृतिक निवास से उठाकर दूसरे मकसद के लिए इस्तेमाल नहीं कर सकता।

मगरमच्छ (क्रोकोडायलस पैलस्ट्रिस) तो 1982 से IUCN रेड लिस्ट में ‘Vulnerable’ (VU) श्रेणी में है, जो पहले से ही खतरे में है। इन्हें पकड़कर ‘ड्यूटी’ पर लगाना अवैध और अव्यवसायिक है। अहमद का सवाल बिल्कुल सही है – सरकार बिना राज्य वन विभाग, पर्यावरण एवं वन मंत्रालय (MoEF) और विशेषज्ञों की अनुमति के अगर आगे बढ़ती है, तो यह गंभीर उल्लंघन होगा।

2. मानवाधिकार का सवाल: 60% आबादी खतरे में

दूसरा सवाल मानवाधिकार का है। बांग्ला मानवाधिकार सुरक्षा मंच (MASUM) के सचिव किरीटी रॉय ने चेतावनी दी है कि नदी क्षेत्रों में रहने वाली 60 प्रतिशत आबादी सीधे खतरे में आ जाएगी।

“क्या सुरक्षा के नाम पर अपने ही नागरिकों को जहरीले सांपों और मगरमच्छों के बीच रहने को मजबूर करना स्वीकार्य है? यह पिछड़े इलाकों में रोजी-रोटी, मछली पकड़ने और नाव चलाने को पूरी तरह प्रभावित कर देगा।”

3. व्यावहारिकता का संकट: ‘कंट्रोल’ कैसे रहेंगे जानवर?

सबसे बड़ा सवाल – ये जानवर ‘कंट्रोल’ में कैसे रहेंगे? क्या BSF उन्हें कमांड देगा कि “सिर्फ घुसपैठियों पर हमला करो, स्थानीय लोगों को छोड़ दो”? यह विचार हास्यास्पद तो है, लेकिन खतरनाक भी।

इकोसिस्टम का संकट: विज्ञान के अनुसार, प्रत्येक जीव एक विशिष्ट पारिस्थितिकी तंत्र के लिए अनुकूलित होता है। बाहरी जीवों को किसी नए क्षेत्र में ‘प्रविष्ट’ कराना (Introduction of Invasive Species) पूरे इकोसिस्टम के लिए विनाशकारी हो सकता है।

सुंदरबन की अपनी एक संवेदनशीलता है। अगर बाहर से लाए गए रेप्टाइल्स वहां के स्थानीय चक्र को बिगाड़ते हैं, तो इसका खामियाजा वहां की जैव-विविधता और स्थानीय समुदायों को भुगतना होगा। क्या सरकार ने इस जोखिम का आकलन करने के लिए पर्यावरण विशेषज्ञों से कोई परामर्श किया है?

21वीं सदी की सोच या पुरापाषाण काल?

सरकार को समझना चाहिए कि 21वीं सदी में बॉर्डर सुरक्षा का मतलब ड्रोन, स्मार्ट फेंसिंग, AI निगरानी, थर्मल कैमरे और डिप्लोमेसी है—रेप्टाइल्स की सेना नहीं। अगर इतनी ही हताशा है तो सुंदरबन जैसे क्षेत्र में इको-फ्रेंडली, हाई-टेक समाधान तलाशे जाएं।

यह प्रस्ताव सरकारी सोच की संकीर्णता को उजागर करता है। समय आ गया है कि गृह मंत्रालय अपनी ‘क्रिएटिव’ योजना को वापस ले और विशेषज्ञों, पर्यावरणविदों और स्थानीय समुदायों के साथ बैठकर वास्तविक, स्थायी और मानवीय समाधान निकाले।

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क्या आपको लगता है कि सांप-मगरमच्छ बॉर्डर गार्ड बनाना एक ‘मास्टरस्ट्रोक’ है या सरकारी हताशा का ‘जंगली’ प्रमाण? नीचे कमेंट बॉक्स में अपने विचार जरूर लिखें।

#JanManKiBaat #MHA #BorderSecurity #Environment #HumanRights

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वरिष्ठ पत्रकार आनंद कुमार करीब 30 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। उन्होंने एम.ए. (इतिहास), बैचलर ऑफ जर्नलिज्म और एमबीए (मार्केटिंग) की शिक्षा प्राप्त की है। 1996 में 'प्रभात खबर', रांची से बतौर प्रशिक्षु पत्रकार करियर की शुरुआत करके 'हिन्दुस्तान' और 'अमर उजाला' जैसे राष्ट्रीय समाचार पत्रों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल चुके आनंद कुमार हिन्दुस्तान, जमशेदपुर के स्थानीय संपादक भी रहे हैं। इसके अलावा The Photon News अखबार सहित Lagatar.in तथा Newswing.com जैसे डिजिटल माध्यमों में संपादक पद का दायित्व संभाल चुके हैं। इसके अलावा आनंद कुमार कॉरपोरेट कम्यूनिकेशन/जनसंपर्क, प्रबंधन, सरकार/प्रशासन और मीडिया शिक्षण का भी गहन अनुभव रखते हैं। उन्होंने सरयू राय - एक नाम कई आयाम' नामक पुस्तक का संपादन भी किया है।
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