103 करोड़ का सवाल: झारखंड में सांसद निधि का ‘अनुपयोग’ और विकास की राजनीति का मौन संकट

Anand Kumar
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Jan-man Analysis

झारखंड की राजनीति में अक्सर सत्ता, गठबंधन और जातीय समीकरणों की चर्चा होती है। लेकिन इन बहसों के बीच एक ऐसा आंकड़ा मौजूद है, जो विकास की पूरी कहानी पर सवाल खड़ा करता है- 103 करोड़ रुपये

यह राशि किसी घोटाले की नहीं, बल्कि उस धन की है जो खर्च ही नहीं हुआ।

सांसद स्थानीय क्षेत्र विकास योजना (MPLADS) के तहत झारखंड के सांसदों को जो धन मिला, उसका बड़ा हिस्सा अब भी अप्रयुक्त पड़ा है। और यही तथ्य इस पूरे विमर्श को राजनीतिक बहस से निकालकर प्रशासनिक जवाबदेही के केंद्र में ले आता है।


आंकड़ों की सच्चाई: पैसा है, काम नहीं

उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, झारखंड के 19 सांसदों को कुल 225.75 करोड़ रुपये आवंटित हुए। लेकिन खर्च हुए केवल 122.37 करोड़ रुपये। यानी कुल उपयोग लगभग 54.2% शेष 103.38 करोड़ रुपये अब भी पड़े हैं यह केवल वित्तीय आंकड़ा नहीं, बल्कि विकास की गति का संकेतक है।

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MPLADS : विकास का ‘खोया हुआ’ 103 करोड़

राजनीतिक उठापटक के बीच एक और बड़ा सवाल उभरकर सामने आया है – विकास बनाम राजनीति। झारखंड के 19 सांसदों को MPLADS के तहत 225.75 करोड़ रुपये मिले, लेकिन खर्च हुए केवल 122.37 करोड़ रुपये।

  • यानी 54.2% उपयोग
  • 103.38 करोड़ रुपये अब भी पड़े हैं

यह आंकड़ा सिर्फ वित्तीय डेटा नहीं, बल्कि विकास की रफ्तार पर सवाल है।


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प्रदर्शन की तस्वीर: कौन आगे, कौन पीछे

टॉप परफॉर्मर (70-90%)

  • आदित्य साहू – 85.86%
  • महुआ मांझी – 83.97%
  • दीपक प्रकाश – 82.06%
  • संजय सेठ – 81.75%
  • सुखदेव भगत – 75.55%
  • विद्युत वरण महतो – 74.07%
  • काली चरण मुंडा – 71.41%

औसत (50-70%)

  • प्रदीप वर्मा – 65.28%
  • नलिन सोरेन – 64.67%

कमजोर (<50%)

  • बीडी राम – 49.30%
  • चंद्रप्रकाश चौधरी – 42.53%
  • डॉ. सरफराज अहमद – 39.98%
  • ढुल्लू महतो – 34.20%
  • जोबा मांझी – 28.90%
  • अन्नपूर्णा देवी – 25.01%
  • विजय हांसदा – 20.54%
  • कालीचरण सिंह – 10.90%
  • निशिकांत दूबे – 1.82%

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  • मनीष जायसवाल – एक भी रुपया खर्च नहीं

बड़ा सवाल: पार्टी नहीं, प्राथमिकता की समस्या

इस डेटा की सबसे अहम बात यह है कि प्रदर्शन किसी एक पार्टी तक सीमित नहीं है।

  • टॉप परफॉर्मर: BJP, JMM, कांग्रेस – सभी
  • लो परफॉर्मर: सभी दलों के सांसद

यानी समस्या राजनीतिक विचारधारा नहीं, बल्कि सांसदों की प्राथमिकता और कार्यशैली है।


103 करोड़: विकास का ‘डेड कैपिटल’

यह राशि सड़क, अस्पताल, शिक्षा, पेयजल और ग्रामीण विकास में लग सकती थी। लेकिन इसका उपयोग नहीं होना यह बताता है कि
– राजनीतिक बहस तेज है
– लेकिन जमीनी विकास धीमा


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MPLADS : अवधारणा और वास्तविकता के बीच

MPLADS योजना का उद्देश्य स्पष्ट है—
स्थानीय स्तर पर छोटे लेकिन प्रभावी विकास कार्यों को गति देना।

  • ग्रामीण सड़क
  • स्कूल भवन
  • पेयजल सुविधा
  • स्वास्थ्य केंद्र

ये सभी ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ छोटी राशि भी बड़ा बदलाव ला सकती है।

लेकिन झारखंड के आंकड़े बताते हैं कि समस्या संसाधनों की कमी नहीं, बल्कि उनके उपयोग की प्राथमिकता में है।


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प्रदर्शन की तस्वीर: कोई भी पूरी तरह निर्दोष नहीं

इस आंकड़े की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह किसी एक दल या विचारधारा की समस्या नहीं है। कुछ सांसदों ने 70% से अधिक राशि खर्च की है- यह बताता है कि सिस्टम काम कर सकता है

कई सांसद 50% से नीचे हैं -जो सीधे तौर पर विकास की धीमी गति का संकेत है।

लेकन सबसे चौंकाने वाली स्थिति है एक भी रुपया खर्च नहीं करना।


क्यों नहीं खर्च हो पाता पैसा?

यह सवाल सबसे महत्वपूर्ण है – और इसका जवाब बहुआयामी है:

1. प्रशासनिक जटिलता : प्रस्ताव से लेकर मंजूरी और कार्यान्वयन तक कई स्तरों की प्रक्रिया होती है।

2. प्राथमिकता का अभाव : राजनीतिक गतिविधियों और चुनावी रणनीतियों के बीच विकास कार्य अक्सर पीछे छूट जाते हैं।

3. स्थानीय समन्वय की कमी : जिला प्रशासन और जनप्रतिनिधि के बीच तालमेल का अभाव कार्यों को धीमा करता है।

4. जवाबदेही का अभाव : खर्च नहीं होने पर भी राजनीतिक नुकसान सीमित होता है – यही सबसे बड़ी समस्या है।


‘डेड कैपिटल’: विकास की खोई हुई संभावनाएं

103 करोड़ रुपये का मतलब सिर्फ एक आंकड़ा नहीं है।
यह राशि
– सैकड़ों गांवों में सड़क बना सकती थी
– दर्जनों स्कूलों को सुधार सकती थी
– प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को सशक्त कर सकती थी

लेकिन इसका उपयोग नहीं होना यह दर्शाता है कि विकास केवल भाषणों में प्राथमिकता है, व्यवहार में नहीं।


राजनीतिक विमर्श बनाम जमीनी हकीकत

झारखंड की राजनीति में बड़े मुद्दे अक्सर केंद्र में रहते हैं –

  • पहचान
  • गठबंधन
  • सत्ता संघर्ष

लेकिन MPLADS जैसे मुद्दे quietly पीछे छूट जाते हैं, जबकि इनका सीधा संबंध जनता के जीवन से है।

यह एक विडंबना है कि
– राजनीति जितनी तेज है
– विकास उतना ही धीमा


क्या बदल सकता है यह स्थिति?

इस स्थिति को बदलने के लिए केवल नीतिगत सुधार नहीं, बल्कि राजनीतिक इच्छाशक्ति की आवश्यकता है।

  • नियमित मॉनिटरिंग
  • सार्वजनिक रिपोर्टिंग
  • स्थानीय स्तर पर भागीदारी
  • और सबसे महत्वपूर्ण – राजनीतिक दबाव

जब तक खर्च न करने को ‘मुद्दा’ नहीं बनाया जाएगा, तब तक सुधार की गति सीमित रहेगी।


असली परीक्षा यहीं है

चुनाव जीतना राजनीति की पहली परीक्षा है, लेकिन असली परीक्षा उसके बाद शुरू होती है-
– क्या संसाधनों का सही उपयोग हुआ?
– क्या जनता के जीवन में बदलाव आया?

झारखंड में MPLADS के आंकड़े बताते हैं कि
संसाधन मौजूद हैं,
संभावनाएं भी हैं,
लेकिन निष्पादन अधूरा है।

और यही अधूरापन
इस पूरे राजनीतिक विमर्श का सबसे बड़ा प्रश्न बनकर सामने आता है-

क्या विकास कभी राजनीति का केंद्र बनेगा, या आंकड़ों में ही सीमित रह जाएगा?

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वरिष्ठ पत्रकार आनंद कुमार करीब 30 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। उन्होंने एम.ए. (इतिहास), बैचलर ऑफ जर्नलिज्म और एमबीए (मार्केटिंग) की शिक्षा प्राप्त की है। 1996 में 'प्रभात खबर', रांची से बतौर प्रशिक्षु पत्रकार करियर की शुरुआत करके 'हिन्दुस्तान' और 'अमर उजाला' जैसे राष्ट्रीय समाचार पत्रों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल चुके आनंद कुमार हिन्दुस्तान, जमशेदपुर के स्थानीय संपादक भी रहे हैं। इसके अलावा The Photon News अखबार सहित Lagatar.in तथा Newswing.com जैसे डिजिटल माध्यमों में संपादक पद का दायित्व संभाल चुके हैं। इसके अलावा आनंद कुमार कॉरपोरेट कम्यूनिकेशन/जनसंपर्क, प्रबंधन, सरकार/प्रशासन और मीडिया शिक्षण का भी गहन अनुभव रखते हैं। उन्होंने सरयू राय - एक नाम कई आयाम' नामक पुस्तक का संपादन भी किया है।
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