Jan-Man Desk Ranchi : झारखंड के 48 शहरी निकायों में मतदान संपन्न होने के बाद अब राजनीतिक तापमान 27 फरवरी की मतगणना से पहले चरम पर है। सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच बयानबाजी का स्तर यह संकेत दे रहा है कि इस चुनाव को केवल स्थानीय निकाय तक सीमित नहीं देखा जा रहा, बल्कि इसे शहरी जनमत की राजनीतिक दिशा के रूप में पढ़ा जा रहा है। भाजपा ने निकाय चुनाव में सरकार और सत्तारूढ़ दल पर चुनावी धांधली का आरोप लगाया है। इस पर सरकार का कहना है कि शहरी वोटरों ने भी भाजपा को नकार दिया है, इसलिए भाजपा अनर्गल आरोप लगा रही है.
“शहरी मतदाता किसी दल की बपौती नहीं” – सुदिव्य कुमार
राज्य के शहरी विकास मंत्री सुदिव्य कुमार ने भाजपा के आरोपों पर पलटवार करते हुए कहा कि बैलेट पेपर से चुनाव कराना कोई असामान्य व्यवस्था नहीं है। उनके अनुसार अमेरिका और यूरोप के कई विकसित लोकतांत्रिक देशों में आज भी बैलेट प्रणाली लागू है। ऐसे में कभी ईवीएम की मांग, कभी केंद्रीय सुरक्षा बल की तैनाती और अब मतगणना में गड़बड़ी की आशंका जताना यह दर्शाता है कि भाजपा पहले ही अपनी हार स्वीकार कर चुकी है।
उन्होंने यह भी कहा कि इस चुनाव में झारखंड मुक्ति मोर्चा ने भाजपा के उस गुरूर को तोड़ा है कि शहरी मतदाताओं उसकी बपौती है। मंत्री के मुताबिक शहरी मतदाता अब स्थानीय विकास, बुनियादी सेवाओं और नगर प्रबंधन जैसे मुद्दों पर निर्णय ले रहे हैं।
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“मतगणना से पहले आत्मविश्वास लोकतांत्रिक नहीं” – नवीन जायसवाल
मंत्री के बयान पर भाजपा की ओर से तीखी प्रतिक्रिया आई। पार्टी के मुख्य सचेतक और विधायक नवीन जायसवाल ने कहा कि लोकतंत्र में इतना घमंड शोभा नहीं देता। मंत्री जी को 27 फरवरी को मतगणना तक इंतजार करना चाहिए। जायसवाल ने कहा कि अगर महागठबंधन के दल और सरकार शहरों में इतने ही लोकप्रिय हैं, तो दलीय आधार पर चुनाव क्यों नहीं कराया गया औऱ बैलेट पेपर पर मतदान क्यों कराया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि मतदान प्रक्रिया में अव्यवस्था रही और बैलेट प्रणाली को लेकर पर्याप्त जागरूकता नहीं फैलाई गई।
बैलेट वोटिंग पर विवाद : प्रशासनिक चूक या राजनीतिक रणनीति?
भाजपा का आरोप है कि मतदान के दिन मतदाता बूथ बदलने को लेकर भ्रमित रहे। बैलेट पेपर पर मतदान की सही प्रक्रिया की जानकारी पर्याप्त रूप से नहीं दी गई। कई मतदाताओं द्वारा अंगूठा लगाने की घटनाओं को भी भाजपा ने मुद्दा बनाया है, जिससे वोट अमान्य होने की आशंका जताई जा रही है।
विपक्ष का दावा है कि 20 से 30 प्रतिशत शहरी मतदाता अव्यवस्था के कारण मतदान से वंचित रहे। हालांकि इस आंकड़े की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
राज्य निर्वाचन आयोग की चेयरपर्सन अलका तिवारी द्वारा जांच के आदेश दिए जाने की जानकारी सामने आई है। भाजपा ने इसे औपचारिक कार्रवाई बताते हुए इसकी निष्पक्षता पर सवाल उठाया है।
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कानूनी और संवैधानिक संदर्भ
शहरी निकाय चुनाव राज्य निर्वाचन आयोग के अधीन होते हैं, जो संविधान के अनुच्छेद 243ZA के तहत गठित स्वतंत्र संस्था है। आयोग का दायित्व है कि वह स्थानीय निकाय चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष ढंग से कराए। बैलेट प्रणाली अपनाना या ईवीएम का उपयोग करना आयोग के अधिकार क्षेत्र में आता है, बशर्ते वह प्रक्रिया पारदर्शी और विधिसम्मत हो।
यदि मतदान प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर अनियमितता सिद्ध होती है, तो परिणाम न्यायिक समीक्षा के दायरे में आ सकते हैं। हालांकि फिलहाल सभी आरोप राजनीतिक स्तर पर ही सीमित हैं।
शहरी जनमत का राजनीतिक अर्थ
झारखंड की राजनीति में शहरी क्षेत्रों का महत्व लगातार बढ़ा है। रांची, जमशेदपुर, धनबाद, बोकारो जैसे शहरों में मतदान पैटर्न अक्सर सरकार की नीतियों पर जन प्रतिक्रिया के रूप में देखा जाता है। ऐसे में 27 फरवरी की मतगणना केवल पार्षदों और मेयरों का चयन भर नहीं तय करेगी, बल्कि यह संकेत भी दे सकती है कि शहरी मतदाता राज्य सरकार की नीतियों से कितना संतुष्ट हैं।
यदि सत्तापक्ष को बढ़त मिलती है तो यह सरकार के लिए मनोवैज्ञानिक बढ़त होगी। वहीं भाजपा बेहतर प्रदर्शन करती है तो चुनावी प्रक्रिया पर उठाए गए सवालों को राजनीतिक मजबूती मिल सकती है।
मतदान संपन्न हो चुका है, आरोप-प्रत्यारोप जारी हैं, लेकिन अंतिम निर्णय मतगणना ही करेगी। फिलहाल झारखंड की राजनीति में शहरी निकाय चुनाव एक बड़े सियासी संकेत में बदल चुका है। 27 फरवरी को परिणाम आने के बाद ही स्पष्ट होगा कि शहरी मतदाताओं का रुझान किस दिशा में गया है।