गिरिडीह उपचुनाव में मरांग बुरु VS राम VS जयराम! हेमंत सोरेन के दांव से बदलेगा सियासी गणित?

Anand Kumar
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हेमंत सोरेन ने मरांग बुरु धोरोमगढ़ महासम्मेलन में आदिवासी अस्मिता, संवैधानिक अधिकार और पहाड़ के संरक्षण का मुद्दा उठाया। गिरिडीह के दिवंगत विधायक सुदिव्य कुमार सोनू की सीट पर होने वाले उपचुनाव से पहले इस आयोजन के राजनीतिक मायने भी निकाले जा रहे हैं। सवाल है कि भाजपा इस नैरेटिव का जवाब कैसे देगी और जयराम महतो की भूमिका क्या होगी?

आनंद कुमार

गिरिडीह की राजनीति में एक पहाड़ अब नए राजनीतिक विमर्श का केंद्र बनता दिखाई दे रहा है। पारसनाथ पहाड़, जिसे जैन समाज सम्मेद शिखरजी और संथाल आदिवासी समाज मरांग बुरु के नाम से पूजता है। करीब चार साल पहले इसी पहाड़ को लेकर देशव्यापी जैन आंदोलन हुआ था। इसके बाद आदिवासी समाज ने भी अपने धार्मिक और पारंपरिक अधिकारों को लेकर आवाज उठाई। अब नवंबर 2026 में मरांग बुरु का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है।

इस बार इसकी राजनीतिक अहमियत इसलिए भी बढ़ गई है, क्योंकि गिरिडीह विधानसभा सीट पर उपचुनाव होना है। ऐसे में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का मधुबन पहुंचकर आदिवासी समाज को संबोधित करना और मरांग बुरु के संरक्षण की बात करना राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

इस पूरे घटनाक्रम को तीन राजनीतिक प्रतीकों के जरिए समझा जा सकता है—मरांग बुरु, राम और जयराम महतो।

मधुबन महासम्मेलन में हेमंत सोरेन का संदेश

चार और पांच नवंबर को गिरिडीह के पीरटांड़ प्रखंड स्थित मधुबन थाना मैदान में मरांग बुरु धोरोमगढ़ महासम्मेलन आयोजित किया गया। इसके आयोजक मरांग बुरु बचाओ संघर्ष मोर्चा थे। कार्यक्रम में झारखंड के अलावा बिहार, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, असम और अन्य राज्यों से आदिवासी प्रतिनिधि शामिल हुए।

पांच नवंबर को महासम्मेलन के खुले सत्र में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन मुख्य अतिथि के रूप में पहुंचे। उनके साथ विधायक कल्पना सोरेन भी मौजूद थीं।

मुख्यमंत्री ने संताली भाषा में संबोधन करते हुए आदिवासी समाज की एकजुटता, सांस्कृतिक पहचान और संवैधानिक अधिकारों पर जोर दिया।

उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज को विशिष्ट सामाजिक अधिकार प्राप्त हैं, जिन्हें भारतीय संविधान में भी मान्यता दी गई है। देश में ऐसे कई क्षेत्र हैं, जहां आदिवासी समाज की सहमति और अनुमति के बिना कोई काम नहीं किया जा सकता।

मुख्यमंत्री ने मरांग बुरु धोरोमगढ़ के संरक्षण और देखभाल को सभी की नैतिक जिम्मेदारी बताया। उन्होंने समाज के युवाओं से अपनी परंपरा, रीति-रिवाज और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को समझने की अपील भी की।

उनके भाषण में आदिवासी समाज में बढ़ती नशाखोरी का मुद्दा भी प्रमुखता से आया। उन्होंने नशामुक्त समाज बनाने के लिए सामूहिक प्रयासों की जरूरत बताई।

मुख्यमंत्री ने मंच से मिले ज्ञापन पर न्यायसंगत कार्रवाई का भरोसा दिया। हालांकि उन्होंने इको-सेंसिटिव जोन की अधिसूचना रद्द करने या मरांग बुरु की पूजा को राजकीय पर्व घोषित करने की कोई स्पष्ट घोषणा नहीं की।

यहीं से राजनीतिक विश्लेषण का सवाल पैदा होता है। क्या यह दौरा केवल आदिवासी धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता का संदेश था या गिरिडीह उपचुनाव से पहले राजनीतिक संवाद का भी हिस्सा था?

सम्मेद शिखर और मरांग बुरु का विवाद क्या है?

पारसनाथ पहाड़ झारखंड के गिरिडीह जिले में स्थित है। जैन धर्मावलंबियों के लिए यह सम्मेद शिखरजी है। जैन मान्यता के अनुसार 24 में से 20 तीर्थंकरों ने इसी स्थान पर मोक्ष प्राप्त किया था। इसलिए यह जैन समाज के सबसे महत्वपूर्ण तीर्थस्थलों में गिना जाता है।

दूसरी ओर संथाल आदिवासी समाज के लिए यह मरांग बुरु है। उनकी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं में इस पहाड़ का विशेष स्थान है। पूजा-पद्धति, सेंदरा और अन्य पारंपरिक आयोजनों का संबंध भी इससे जुड़ा है।

दोनों समुदायों की मान्यताएं और धार्मिक परंपराएं अलग हैं। विवाद का मूल प्रश्न यही है कि एक ही पहाड़ से जुड़े दोनों समाजों की आस्था, परंपरा और अधिकारों का सम्मान किस तरह सुनिश्चित किया जाए।

अगस्त 2019 में केंद्र सरकार के पर्यावरण मंत्रालय ने पारसनाथ और टोपचांची वन्यजीव अभयारण्यों के आसपास शून्य से 25 किलोमीटर तक के क्षेत्र को इको-सेंसिटिव जोन घोषित करने की अधिसूचना जारी की थी। इसमें पर्यटन और इको-टूरिज्म से संबंधित प्रावधान भी शामिल थे।

जैन समाज ने इसका विरोध किया। उसे आशंका थी कि पर्यटन गतिविधियों के विस्तार से सम्मेद शिखरजी की धार्मिक पवित्रता प्रभावित हो सकती है।

दिसंबर 2022 में जैन समाज के लोगों ने देश के कई शहरों में विरोध प्रदर्शन किया। पांच जनवरी 2023 को केंद्र सरकार ने इस अधिसूचना के पर्यटन और इको-टूरिज्म से संबंधित प्रावधानों के क्रियान्वयन पर तत्काल रोक लगा दी। पूरी अधिसूचना रद्द नहीं की गई थी।

इसी फैसले के साथ केंद्र ने निगरानी समिति में जैन समाज के दो सदस्यों और स्थानीय आदिवासी समुदाय के एक प्रतिनिधि को स्थायी आमंत्रित सदस्य बनाने का निर्देश दिया।

लेकिन इसके बाद आदिवासी समाज ने भी सवाल उठाया कि मरांग बुरु की धार्मिक पहचान और पारंपरिक अधिकारों को पर्याप्त मान्यता क्यों नहीं मिल रही है।

आदिवासी समाज की मांगें और सरकार के सामने सवाल

मरांग बुरु को लेकर आदिवासी समाज का आंदोलन लगातार जारी रहा है।

19 जुलाई 2024 को मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और कल्पना सोरेन मरांग बुरु के दिशोम मांझीथान पहुंचे थे और वहां पूजा की थी।

इसके बाद नौ जून 2025 को मरांग बुरु बचाओ संघर्ष समिति के 51 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल ने मुख्यमंत्री से मुलाकात कर ज्ञापन सौंपा।

समिति की प्रमुख मांगों में इको-सेंसिटिव जोन की अधिसूचना रद्द करने और मरांग बुरु की धार्मिक पहचान तथा प्रबंधन में स्थानीय आदिवासी समुदाय और ग्राम सभाओं की भूमिका सुनिश्चित करने की मांग शामिल थी। इसके अलावा युग जाहेर और वाहा बोंगा पूजा को राजकीय पर्व घोषित करने की मांग भी उठाई गई।

इससे स्पष्ट है कि आदिवासी समाज की मांग केवल धार्मिक मान्यता तक सीमित नहीं है। इसमें पारंपरिक अधिकार, स्थानीय भागीदारी, प्रतिनिधित्व और पहाड़ के प्रबंधन का प्रश्न भी शामिल है।

मुख्यमंत्री ने अब महासम्मेलन में संरक्षण और देखभाल की जिम्मेदारी की बात कही है। लेकिन मांगों पर सरकार का लिखित और नीतिगत रुख क्या होगा, यह अभी महत्वपूर्ण सवाल बना हुआ है।

गिरिडीह उपचुनाव और 3,838 वोटों का अंतर

मरांग बुरु का मुद्दा जिस समय फिर चर्चा में आया है, उसी समय गिरिडीह विधानसभा सीट पर उपचुनाव की तैयारी भी राजनीतिक चर्चा का विषय है।

छह सितंबर 2026 को गिरिडीह के विधायक और झारखंड सरकार में मंत्री सुदिव्य कुमार सोनू का निधन हो गया था। उनके निधन के बाद यह सीट खाली हुई है।

2024 के विधानसभा चुनाव में सुदिव्य कुमार सोनू ने भाजपा के निर्भय कुमार शाहाबादी को 3,838 वोटों से हराया था।

निर्वाचन परिणाम के मुताबिक सुदिव्य सोनू को 94,042 और निर्भय शाहाबादी को 90,204 वोट मिले थे। तीसरे स्थान पर झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा के नवीन आनंद रहे थे, जिन्हें 10,787 वोट मिले थे।

यानी 2024 में झामुमो और भाजपा के बीच मुकाबला काफी करीबी था।

अब उपचुनाव में झामुमो के सामने अपनी जीती हुई सीट बरकरार रखने की चुनौती है। चर्चा है कि दिवंगत विधायक की पत्नी श्वेता शर्मा को उम्मीदवार बनाया जा सकता है। हालांकि उम्मीदवार को लेकर अंतिम फैसला पार्टी को करना है।

ऐसे में पीरटांड़ और मधुबन क्षेत्र की राजनीतिक अहमियत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

स्थानीय राजनीतिक आकलन में गिरिडीह विधानसभा क्षेत्र में आदिवासी मतदाताओं की हिस्सेदारी करीब 16 प्रतिशत बताई जाती है। इनमें पीरटांड़ और मधुबन के आसपास के इलाकों की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है।

हालांकि इन आंकड़ों को आधिकारिक निर्वाचन आंकड़ा नहीं समझना चाहिए। साथ ही किसी समुदाय के सभी मतदाताओं के एक ही दिशा में मतदान करने की धारणा भी सही नहीं होगी।

फिर भी 3,838 वोटों के अंतर वाली सीट पर स्थानीय सामाजिक समीकरणों और क्षेत्रीय मुद्दों की भूमिका पर चर्चा स्वाभाविक है।

मरांग बुरु के मुद्दे पर भाजपा की चुनौती

इस पूरे विवाद में भाजपा की भूमिका भी महत्वपूर्ण है।

भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी ने दो नवंबर को मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर मरांग बुरु से जुड़े एक पुराने मामले में आदिवासी समाज के सदस्यों को परेशान किए जाने का आरोप लगाया था।

मरांडी के मुताबिक, 19 जुलाई 2024 की पूजा से जुड़े मामले में मधुबन थाने में कांड संख्या 13/24 दर्ज है। उन्होंने आरोप लगाया कि इस मामले की आड़ में मरांग बुरु सांवता सुसार बैसी के पांच सदस्यों को परेशान किया जा रहा है और निष्पक्ष जांच की मांग की।

उन्होंने पत्र में बकरों की बलि और आठ बकरों के कथित तौर पर गायब होने का मामला भी उठाया।

इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि होना अभी बाकी है।

यह घटनाक्रम दिखाता है कि मरांग बुरु का मुद्दा केवल झामुमो और आदिवासी संगठनों तक सीमित नहीं है। भाजपा भी इस पर सरकार से जवाब मांग रही है।

भाजपा के सामने एक तरफ सम्मेद शिखरजी की धार्मिक पवित्रता और जैन समाज की भावनाओं का सवाल है, तो दूसरी तरफ आदिवासी समाज के पारंपरिक अधिकारों और मरांग बुरु की पहचान का प्रश्न है।

इसलिए उसके लिए इस मुद्दे पर अपना पक्ष स्पष्ट करना महत्वपूर्ण होगा।

उपचुनाव में भाजपा परीक्षा में गड़बड़ी, भर्ती प्रक्रिया, स्थानीय विकास और सरकार के कामकाज जैसे मुद्दों को भी उठा सकती है। ऐसे में चुनाव का विमर्श केवल धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान तक सीमित रहेगा या दूसरे मुद्दे भी बराबर जगह बनाएंगे, यह देखने वाली बात होगी।

जयराम महतो की भूमिका क्यों है महत्वपूर्ण?

गिरिडीह उपचुनाव के राजनीतिक समीकरण में तीसरा महत्वपूर्ण नाम जयराम महतो का है।

वे पड़ोसी डुमरी विधानसभा क्षेत्र के विधायक हैं। उनका जन्मस्थान गिरिडीह है और 2024 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने गिरिडीह संसदीय सीट से चुनाव लड़ा था।

उनकी पार्टी झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा ने विधानसभा चुनाव में भी गिरिडीह क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई थी।

2024 के विधानसभा चुनाव में JLKM के नवीन आनंद को 10,787 वोट मिले थे। यह आंकड़ा इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि सुदिव्य सोनू और निर्भय शाहाबादी के बीच जीत का अंतर 3,838 वोट था।

हालांकि विधानसभा और लोकसभा चुनाव के मतदाताओं का व्यवहार एक जैसा हो, यह जरूरी नहीं है। लेकिन JLKM की मौजूदगी ने यह दिखाया कि गिरिडीह में झामुमो और भाजपा के अलावा तीसरी राजनीतिक ताकत के लिए भी कुछ समर्थन मौजूद है।

जयराम महतो की राजनीति में कुर्मी समाज और युवाओं का समर्थन महत्वपूर्ण माना जाता है। स्थानीय राजनीतिक आकलन में गिरिडीह क्षेत्र में कुर्मी मतदाताओं की हिस्सेदारी भी उल्लेखनीय बताई जाती है।

ऐसे में उपचुनाव में JLKM की रणनीति पर सबकी नजर रहेगी।

जयराम महतो के सामने तीन संभावित विकल्प हो सकते हैं।

पहला, JLKM अपना उम्मीदवार उतारे और स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़े। ऐसी स्थिति में पार्टी के उम्मीदवार को मिलने वाले वोटों का असर पूरे मुकाबले के समीकरण पर पड़ सकता है।

दूसरा, जयराम महतो मरांग बुरु और सम्मेद शिखर के विवाद पर अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए आदिवासी अधिकारों तथा स्थानीय जमीन के सवाल को अपनी राजनीति का हिस्सा बनाएं। उनके पहले के बयानों में जैन समाज के सभी व्यवसायियों को एक साथ दोषी ठहराने से परहेज और जमीन के सवाल पर आदिवासी पक्ष की चिंता का उल्लेख रहा है।

तीसरा, किसी अन्य दल के साथ राजनीतिक तालमेल की संभावना तलाशें। हालांकि फिलहाल भाजपा में उनके शामिल होने या किसी औपचारिक गठबंधन की चर्चा की कोई पुष्ट जानकारी सामने नहीं है।

इसलिए जयराम महतो की भूमिका को अभी किसी एक राजनीतिक खेमे के साथ जोड़कर देखना जल्दबाजी होगी।

क्या गिरिडीह में मरांग बुरु बनाम राम बनाम जयराम का नैरेटिव बनेगा?

गिरिडीह उपचुनाव से पहले तीन अलग-अलग राजनीतिक विमर्श सामने आ रहे हैं।

मरांग बुरु आदिवासी धार्मिक पहचान और पारंपरिक अधिकारों का प्रतीक है।

राम भाजपा की राजनीति में एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक और राजनीतिक प्रतीक रहे हैं।

जबकि जयराम महतो क्षेत्रीय राजनीति, कुर्मी समाज और युवाओं के बीच अपनी अलग राजनीतिक पहचान बनाने वाले नेता हैं।

इन तीनों को एक ही चुनावी मुकाबले के तीन पक्षों के रूप में देखना एक राजनीतिक विश्लेषण हो सकता है, लेकिन इसे वास्तविक धार्मिक टकराव या तयशुदा चुनावी समीकरण नहीं समझना चाहिए।

गिरिडीह में चुनाव का परिणाम कई कारकों पर निर्भर करेगा। उम्मीदवार कौन होगा, स्थानीय मुद्दे क्या होंगे, शहरी और ग्रामीण मतदाताओं की प्राथमिकताएं क्या होंगी और राजनीतिक दल किस तरह अपना अभियान चलाएंगे—ये सभी पहलू महत्वपूर्ण रहेंगे।

हेमंत सोरेन ने मधुबन में आदिवासी समाज की पहचान और मरांग बुरु के संरक्षण की बात की है। लेकिन अब सरकार के सामने इन बातों को ठोस निर्णयों में बदलने का सवाल है।

भाजपा के सामने दोनों धार्मिक परंपराओं के सम्मान और अपने राजनीतिक पक्ष को स्पष्ट करने की चुनौती है।

और जयराम महतो के सामने अपनी स्वतंत्र राजनीतिक भूमिका को लेकर फैसला करने का प्रश्न है।

एक पहाड़, दो धार्मिक पहचान और एक विधानसभा उपचुनाव। गिरिडीह की राजनीति में मरांग बुरु, राम और जयराम—तीनों नाम अब एक बड़े राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनते दिखाई दे रहे हैं।

लेकिन अंतिम सवाल यही है कि क्या इस विवाद का समाधान दोनों समुदायों की आस्था और अधिकारों का सम्मान करते हुए निकलेगा, या यह मुद्दा चुनावी बहस तक ही सीमित रह जाएगा?

यह भी पढ़ें – मरांग बुरू धोरोमगाड़ महासम्मेलन में बोले हेमंत सोरेन- आदिवासी समाज को संविधान से मिले हैं विशिष्ट अधिकार, अपनी परंपरा और पहचान को बचाना जरूरी

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वरिष्ठ पत्रकार आनंद कुमार करीब 30 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। उन्होंने एम.ए. (इतिहास), बैचलर ऑफ जर्नलिज्म और एमबीए (मार्केटिंग) की शिक्षा प्राप्त की है। 1996 में 'प्रभात खबर', रांची से बतौर प्रशिक्षु पत्रकार करियर की शुरुआत करके 'हिन्दुस्तान' और 'अमर उजाला' जैसे राष्ट्रीय समाचार पत्रों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल चुके आनंद कुमार हिन्दुस्तान, जमशेदपुर के स्थानीय संपादक भी रहे हैं। इसके अलावा The Photon News अखबार सहित Lagatar.in तथा Newswing.com जैसे डिजिटल माध्यमों में संपादक पद का दायित्व संभाल चुके हैं। इसके अलावा आनंद कुमार कॉरपोरेट कम्यूनिकेशन/जनसंपर्क, प्रबंधन, सरकार/प्रशासन और मीडिया शिक्षण का भी गहन अनुभव रखते हैं। उन्होंने सरयू राय - एक नाम कई आयाम' नामक पुस्तक का संपादन भी किया है।
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