दावोस ने झारखंड की सियासत को दी नई दिशा, हेमंत-मोदी के साझा विजन से निकलेगी विकास की नयी राह

Anand Kumar
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हेमंत सोरेन

दिल्ली ने सोरेन के राजनीतिक वजन को मान लिया है, प्रदेश की राजनीति अब ‘झारखंड फर्स्ट’ पर केंद्रित हो रही है

आनंद कुमार
झारखंड की राजनीति में एक सूक्ष्म लेकिन महत्वपूर्ण बदलाव साफ नजर आ रहा है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन अब खुले तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘विकसित भारत 2047’ विजन का जिक्र कर रहे हैं। दावोस के वैश्विक मंच से उन्होंने इस विजन को ‘समृद्ध झारखंड 2050’ से जोड़ा, जो केंद्र और राज्य के बीच संबंधों में सुधार का मजबूत संकेत है। यह बेहतरी सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि विकास की नई राह भी खोल रही है।

यह कोई झामुमो-भाजपा गठबंधन का संकेत नहीं है। बल्कि केंद्र की ओर से हेमंत सोरेन को स्पष्ट संदेश मिला है: अपनी सरकार स्वतंत्र रूप से चलाएं, गठबंधन की जटिलताओं से ऊपर उठें, और विकास के लिए केंद्र का पूरा सहयोग मिलेगा। दिल्ली अब सोरेन के राजनीतिक वजन को मान रही है। पहले की तकरारें – फंड रोकने की शिकायतें, एजेंसी कार्रवाई की अफवाहें – अब पीछे छूटती दिख रही हैं। दावोस में केंद्रीय मंत्रियों की मौजूदगी में सोरेन की ‘दमदार’ उपस्थिति और ‘एक ही सुर में बात’ इस बदलाव का जीता-जागता सबूत है।

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दावोस के राजनीतिक और आर्थिक निहितार्थ

दावोस समिट झारखंड के लिए राजनीतिक टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। यहां 11,100 करोड़ के टाटा स्टील निवेश समझौते, हरित स्टील तकनीक पर फोकस और हिताची, इंफोसिस, टेक महिंद्रा जैसी कंपनियों से बातचीत ने राज्य को वैश्विक निवेशक नक्शे पर मजबूती से रखा। 300 करोड़ से अधिक के प्रस्ताव आए, जो हरित ऊर्जा, महत्वपूर्ण खनिज और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर पर केंद्रित हैं।

राजनीतिक निहितार्थ और गहरा है।

केंद्र-राज्य तालमेल से ‘पीसफुल डेवलपिंग स्टेट’ की छवि बनेगी, जो औद्योगिक घरानों को आकर्षित करेगी। नक्सलवाद पर केंद्र की मदद (अप्रैल तक समाप्ति का लक्ष्य) सुरक्षा स्थिरता लाएगी। 22 जनवरी को सारंडा में सीआरपीएफ और झारखंड पुलिस के साझा अभियान में एक करोड़ के ईनामी अनल दा उर्फ पतिराम मांझी समेत 16 नक्सलियों मारे गये। यह कदम निवेशकों को आश्वस्त करनेवाला है।

झारखंड चैंबर ऑफ कॉमर्स की दावोस में भागीदारी से स्थानीय व्यापारिक समुदाय भी उत्साहित है। यह सब केंद्र के सहयोग से संभव हुआ, जो हेमंत सोरेन को अपनी सरकार मजबूती से चलाने का मौका दे रहा है।

कांग्रेस के चलते छवि पर पड़ रहा असर

दूसरी ओर महागठबंधन में कांग्रेस अपनी आंतरिक कलह से जूझ रही है। इरफान अंसारी जैसे मंत्री बयानबाजी से सरकार की छवि खराब कर रहे हैं, जबकि योगेंद्र प्रसाद जैसे नेता मुसीबतें खड़ी कर रहे हैं। दिल्ली में मंत्रियों की शिकायतें पहुंच रही हैं। कांग्रेस कोटे के मंत्री अपने विधायकों तक की नहीं सुनते। कांग्रेसी नेता बोर्ड-निगमों में हिस्सेदारी की मांग का दबाव बनाते रहते हैं। योगेंद्र साव जैसे नेता जैसी हरकते कर रहे हैं, वे निवेशकों को हतोत्साहित करती हैं, जबकि हेमंत सोरेन दावोस-लंदन से निवेश ला रहे हैं। कांग्रेस का यह आंतरिक संकट महागठबंधन को कमजोर कर रहा है।

हेमंत सोरेन अब ‘ऑब्जर्व’ मोड में हैं, और उनका अगला कदम निर्णायक हो सकता है। राजद भी मजबूत नहीं दिख रहा। यह स्थिति कांग्रेस-मुक्त झारखंड की संभावना को बल दे रही है, जहां हेमंत सोरेन नवीन पटनायक की तर्ज पर स्वतंत्र सरकार चला सकें।

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विकास प्राथमिकता, निवेश सबसे बड़ा एजेंडा

दावोस ने झारखंड की सियासत को नई दिशा दी है। मोदी और हेमंत के मिलते सुर विकास की इबारत लिख रहे हैं। केंद्र का सहयोग बिना गठबंधन बदलाव के मिलेगा, और राज्य हरित भविष्य की ओर बढ़ेगा। महागठबंधन की चुनौतियां हैं, लेकिन जनता के हित में राजनीतिक स्थिरता और निवेश अब सबसे बड़ा एजेंडा बन चुका है। झारखंड की राजनीति अब ‘झारखंड फर्स्ट’ पर केंद्रित हो रही है- और यह बदलाव राज्य की जनता के लिए सबसे बड़ा फायदा साबित होगा।

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वरिष्ठ पत्रकार आनंद कुमार करीब 30 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। उन्होंने एम.ए. (इतिहास), बैचलर ऑफ जर्नलिज्म और एमबीए (मार्केटिंग) की शिक्षा प्राप्त की है। 1996 में 'प्रभात खबर', रांची से बतौर प्रशिक्षु पत्रकार करियर की शुरुआत करके 'हिन्दुस्तान' और 'अमर उजाला' जैसे राष्ट्रीय समाचार पत्रों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल चुके आनंद कुमार हिन्दुस्तान, जमशेदपुर के स्थानीय संपादक भी रहे हैं। इसके अलावा The Photon News अखबार सहित Lagatar.in तथा Newswing.com जैसे डिजिटल माध्यमों में संपादक पद का दायित्व संभाल चुके हैं। इसके अलावा आनंद कुमार कॉरपोरेट कम्यूनिकेशन/जनसंपर्क, प्रबंधन, सरकार/प्रशासन और मीडिया शिक्षण का भी गहन अनुभव रखते हैं। उन्होंने सरयू राय - एक नाम कई आयाम' नामक पुस्तक का संपादन भी किया है।
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