रांची/नई दिल्ली। झारखंड में प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं को लेकर चल रहे विवाद के बीच सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में बड़ा घटनाक्रम सामने आया। JPSC की संयुक्त सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा-2025 में कथित गड़बड़ियों की स्वतंत्र और समयबद्ध CBI जांच की मांग वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड सरकार और झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC) को नोटिस जारी किया है।
- CBI जांच की मांग क्यों?
- एक महीने से अधिक समय से आंदोलन का हवाला
- CJI ने पूछा- न्यायिक सेवा की परीक्षाएं भी PSC कराता है?
- परीक्षा रद्द होना जांच का आधार खत्म नहीं करता- याचिकाकर्ता
- OMR, CCTV और सर्वर रिकॉर्ड सुरक्षित रखने की मांग
- JPSC के साथ JSSC-CGL को लेकर भी आंदोलन
- अब सरकार और JPSC के जवाब पर नजर
- TSDPL को लेकर भी उठे सवाल
- आंदोलन के दबाव में सरकार ने रद्द की परीक्षाएं
मामले की सुनवाई भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने की। यह याचिका सामाजिक कार्यकर्ता हरिशरण देवगन ने अधिवक्ता सत्यम सिंह राजपूत के माध्यम से दायर की है। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मनन कुमार मिश्रा ने पक्ष रखा। मामले का नंबर WP (C) No. 1047/2026, Harisharan Devgan vs. UOI & Ors. है।
CBI जांच की मांग क्यों?
याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट से मांग की है कि JPSC सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा में कथित अनियमितताओं की जांच राज्य स्तर पर चल रही जांच से हटाकर CBI को सौंपी जाए। याचिका में जांच को स्वतंत्र और समयबद्ध तरीके से कराने की मांग की गई है, ताकि परीक्षा प्रक्रिया में कथित गड़बड़ियों के पीछे जिम्मेदार लोगों और संस्थागत स्तर पर हुई संभावित अनियमितताओं का पता लगाया जा सके।
याचिकाकर्ता का तर्क है कि मामला सिर्फ किसी एक अभ्यर्थी या किसी एक कथित गड़बड़ी तक सीमित नहीं है, बल्कि परीक्षा की पूरी प्रक्रिया की विश्वसनीयता और पारदर्शिता से जुड़ा है। इसलिए निष्पक्ष जांच के लिए केंद्रीय एजेंसी की जरूरत है।
एक महीने से अधिक समय से आंदोलन का हवाला
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि परीक्षा में कथित अनियमितताओं को लेकर छात्र एक महीने से अधिक समय से आंदोलन कर रहे हैं। पक्ष रखते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता मनन कुमार मिश्रा ने कहा कि परीक्षा विवाद की गंभीरता को देखते हुए इसकी जांच CBI से कराई जानी चाहिए।
याचिकाकर्ता की ओर से जांच CBI या सुप्रीम कोर्ट के किसी सेवानिवृत्त न्यायाधीश को सौंपने का सुझाव भी दिया गया। इस पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने स्पष्ट किया कि किसी पूर्व न्यायाधीश को इस तरह जांच करने के लिए नहीं कहा जा सकता।
CJI ने पूछा- न्यायिक सेवा की परीक्षाएं भी PSC कराता है?
सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने एक महत्वपूर्ण सवाल भी पूछा। उन्होंने जानना चाहा कि क्या न्यायिक भर्ती की परीक्षाएं भी राज्य लोक सेवा आयोग के माध्यम से आयोजित की जाती हैं।
याचिकाकर्ता की ओर से इसका जवाब हां में दिया गया। इससे यह स्पष्ट होता है कि सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने परीक्षा संचालन और राज्य लोक सेवा आयोग की भूमिका से जुड़े व्यापक पहलुओं को भी सुनवाई के दौरान समझने की कोशिश की।
परीक्षा रद्द होना जांच का आधार खत्म नहीं करता- याचिकाकर्ता
याचिकाकर्ता की ओर से यह भी दलील दी गई कि केवल किसी परीक्षा को रद्द कर देने से कथित “व्यवस्थित भ्रष्टाचार” या अनियमितताओं की जांच की जरूरत खत्म नहीं हो जाती।
याचिका में राज्य स्तर पर चल रही जांच को CBI को सौंपने की मांग इसी आधार पर की गई है कि परीक्षा से जुड़े सरकारी अधिकारियों और परीक्षा संचालन से जुड़ी एजेंसियों की भूमिका की निष्पक्ष जांच हो सके।
OMR, CCTV और सर्वर रिकॉर्ड सुरक्षित रखने की मांग
याचिका में केवल CBI जांच की मांग ही नहीं की गई है, बल्कि परीक्षा से जुड़े महत्वपूर्ण भौतिक और डिजिटल साक्ष्यों को सुरक्षित रखने का भी आग्रह किया गया है।
इनमें मूल OMR शीट, अभ्यर्थियों के पास मौजूद OMR की कार्बन कॉपी, CCTV फुटेज और सर्वर ऑडिट लॉग समेत अन्य डिजिटल रिकॉर्ड शामिल हैं। याचिकाकर्ता का कहना है कि इन साक्ष्यों को सुरक्षित रखना जरूरी है, ताकि जांच के दौरान किसी तरह की छेड़छाड़ की आशंका न रहे।
JPSC के साथ JSSC-CGL को लेकर भी आंदोलन
झारखंड में भर्ती परीक्षाओं को लेकर विवाद केवल JPSC तक सीमित नहीं है। JSSC-CGL समेत कई भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं को लेकर भी अभ्यर्थी लंबे समय से आंदोलन करते रहे हैं। हाल के दिनों में राज्य सरकार द्वारा कई भर्ती परीक्षाओं को रद्द करने और अन्य परीक्षाओं की जांच कराने के फैसले के बाद विवाद और तेज हुआ है। JSSC-CGL से जुड़े मामले में भी जांच और परीक्षा की पारदर्शिता को लेकर अलग से सवाल उठ रहे हैं।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को जारी हुआ नोटिस इस याचिका के तहत JPSC सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा से संबंधित है। इसे सीधे JSSC-CGL मामले में सुप्रीम कोर्ट का नोटिस कहना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा।
अब सरकार और JPSC के जवाब पर नजर
सुप्रीम कोर्ट के नोटिस के बाद अब झारखंड सरकार और JPSC का जवाब महत्वपूर्ण होगा। अदालत के सामने यह मामला केवल परीक्षा की वैधता तक सीमित नहीं है, बल्कि याचिकाकर्ता ने परीक्षा प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं की स्वतंत्र जांच और साक्ष्यों को सुरक्षित रखने की मांग की है।
ऐसे में आने वाली सुनवाई में यह महत्वपूर्ण होगा कि राज्य सरकार और JPSC कथित अनियमितताओं, अब तक की जांच और परीक्षा से जुड़े रिकॉर्ड को लेकर अदालत के सामने क्या स्थिति रखते हैं।
TSDPL को लेकर भी उठे सवाल
याचिका में JPSC द्वारा परीक्षा के लिए नियुक्त एजेंसी TSDPL का भी उल्लेख किया गया है। याचिकाकर्ता का दावा है कि इसी एजेंसी को झारखंड कर्मचारी चयन आयोग (JSSC) ने इससे पहले कथित अनियमितताओं और गोपनीयता संबंधी उल्लंघनों के मामले में ब्लैकलिस्ट किया था।
याचिका में इसी आधार पर सवाल उठाया गया है कि ऐसी एजेंसी को JPSC की महत्वपूर्ण परीक्षा प्रक्रिया की जिम्मेदारी कैसे दी गई।
याचिकाकर्ता का आरोप है कि मामले के तार झारखंड के बाहर दूसरे राज्यों और यहां तक कि नेपाल तक जुड़े हो सकते हैं। ऐसे में राज्य CID की जांच की क्षमता और क्षेत्राधिकार को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं।
आंदोलन के दबाव में सरकार ने रद्द की परीक्षाएं
JPSC विवाद को लेकर रांची में लंबे समय से छात्र आंदोलन कर रहे हैं। प्रदर्शन की शुरुआत बापू वाटिका से हुई और बाद में आंदोलन जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम तक पहुंचा।
कई छात्र-छात्राओं ने स्वतंत्र जांच और परीक्षा व्यवस्था में सुधार की मांग को लेकर आमरण अनशन भी शुरू किया था।
लगातार बढ़ते दबाव के बीच JPSC के अध्यक्ष का इस्तीफा और गिरफ्तारी और तीन अन्य सदस्यों के इस्तीफे हुए। इसके बाद राज्य सरकार ने 14वीं JPSC संयुक्त सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा के साथ 2023 और 2025 की बैकलॉग परीक्षाओं को भी रद्द करने का फैसला लिया। लेकिन छात्र संगठनों की मांग अब भी यही रही कि सिर्फ परीक्षा रद्द करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि पूरे मामले की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए।
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