श्वेता शर्मा को मंत्री बनाया जायेगा तो सोमेश सोरेन को क्यों नहीं बनाया? हेमंत सोरेन पर उठ रहे बड़े सवाल

Anand Kumar
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आनंद कुमार | राजनीतिक विश्लेषण

झारखंड की राजनीति में इन दिनों गिरिडीह से लेकर घाटशिला तक एक ऐसा सवाल आकार ले रहा है, जिसका जवाब आने वाले दिनों में झामुमो की राजनीतिक रणनीति को समझने के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है।

सवाल सीधा है—

अगर सुदिव्य कुमार सोनू की पत्नी श्वेता शर्मा को गिरिडीह विधानसभा उपचुनाव से पहले मंत्री बनाया जाता है, तो दिवंगत मंत्री रामदास सोरेन के बेटे सोमेश सोरेन को मंत्री क्यों नहीं बनाया गया?

यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि दोनों मामलों में राजनीतिक परिस्थितियों में कई समानताएं हैं।

दोनों दिवंगत मंत्रियों के परिवार से आते हैं। दोनों को अपने परिजनों की राजनीतिक विरासत आगे बढ़ाने के लिए उपचुनाव में उतारा गया। लेकिन सोमेश सोरेन को चुनाव जीतने के बाद भी मंत्रिमंडल में जगह नहीं मिली, जबकि अब श्वेता शर्मा को लेकर मंत्री पद की चर्चा शुरू हो गई है।

सुदिव्य सोनू की विरासत संभालने की तैयारी में श्वेता

सुदिव्य कुमार सोनू के निधन के 22 दिन बाद उनकी पत्नी श्वेता शर्मा ने 28 सितंबर को पहली बार राजनीतिक कार्यक्रम में हिस्सा लिया। गिरिडीह के हरसिंगरायडीह स्थित उत्सव उपवन में हुई झामुमो कार्यकर्ताओं की बैठक में उन्होंने कार्यकर्ताओं से सहयोग मांगा।

श्वेता शर्मा ने कहा कि जिस तरह सुदिव्य कुमार सोनू लोगों के सुख-दुख में साथ खड़े रहते थे, उसी तरह वह भी लोगों के सुख-दुख में उनके साथ खड़ी रहेंगी। उन्होंने सुदिव्य सोनू के गिरिडीह के विकास के सपने को पूरा करने के लिए कार्यकर्ताओं से सहयोग मांगा।

यह कार्यक्रम इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि इसके साथ श्वेता शर्मा की सक्रिय राजनीतिक भूमिका का संकेत मिला।

मीडिया रिपोर्टों में उन्हें गिरिडीह उपचुनाव में झामुमो का संभावित उम्मीदवार बनाए जाने की चर्चा है। साथ ही यह अटकल भी चल रही है कि उन्हें उपचुनाव से पहले मंत्रिमंडल में शामिल किया जा सकता है। हालांकि, मंत्री बनाए जाने की कोई आधिकारिक घोषणा अभी नहीं हुई है।

यहीं से सोमेश सोरेन का मामला सामने आता है।

हफीजुल हसन से शुरू हुआ था एक राजनीतिक पैटर्न

हेमंत सोरेन की पिछली सरकार में हाजी हुसैन अंसारी के निधन के बाद उनके बेटे हफीजुल हसन को मंत्रिमंडल में शामिल किया गया था।

हफीजुल हसन को अल्पसंख्यक कल्याण विभाग भी मिला। इसके बाद उन्होंने मधुपुर उपचुनाव लड़ा और जीत दर्ज की।

लेकिन उनकी जीत का अंतर था 5,247 वोट।

इसके बाद जगरनाथ महतो के निधन के बाद उनकी पत्नी बेबी देवी को मंत्री बनाया गया। वह डुमरी उपचुनाव में झामुमो की उम्मीदवार बनीं और 17,153 वोटों के अंतर से चुनाव जीता।

इन दोनों मामलों में दिवंगत नेताओं की राजनीतिक विरासत और उनके सामाजिक आधार का सवाल महत्वपूर्ण था।

हफीजुल हसन के मामले में अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व का पहलू था, जबकि बेबी देवी के मामले में जगरनाथ महतो की राजनीतिक विरासत के साथ कुड़मी-महतो सामाजिक आधार का समीकरण भी राजनीतिक विश्लेषण का हिस्सा रहा।

यानी एक ऐसा पैटर्न दिखाई देता है जिसमें दिवंगत नेता के परिवार के सदस्य को राजनीतिक विरासत संभालने का अवसर दिया गया और उन्हें सत्ता में भी प्रतिनिधित्व मिला।

लेकिन 2025 में यही पैटर्न सोमेश सोरेन के मामले में दिखाई नहीं दिया।

सोमेश सोरेन के आंकड़े क्यों महत्वपूर्ण हैं?

रामदास सोरेन के निधन के बाद उनके बेटे सोमेश चंद्र सोरेन को घाटशिला उपचुनाव में झामुमो ने उम्मीदवार बनाया।

यहां सिर्फ जीत महत्वपूर्ण नहीं थी।

जीत का पैमाना महत्वपूर्ण था।

सोमेश सोरेन को 1,04,794 वोट मिले।

भाजपा के बाबूलाल सोरेन को 66,270 वोट मिले।

सोमेश की जीत का अंतर रहा 38,524 वोट।

इसे तीन उपचुनावों के आंकड़ों के साथ रखकर देखिए—

नेताउपचुनावजीत का अंतर
हफीजुल हसनमधुपुर, 20215,247
बेबी देवीडुमरी, 202317,153
सोमेश सोरेनघाटशिला, 202538,524

हफीजुल हसन और बेबी देवी की जीत की तुलना में सोमेश सोरेन की जीत का अंतर काफी बड़ा था। इसके अलावा वह एक लाख से अधिक वोट हासिल करने वाले घाटशिला के पहले विधायक बने—यह तथ्य भी उनके चुनावी समर्थन के पैमाने को रेखांकित करता है।

फिर भी उन्हें मंत्री नहीं बनाया गया।

यही वह बिंदु है जहां से राजनीतिक सवाल शुरू होता है।

अगर श्वेता मंत्री बनती हैं तो तुलना और तेज होगी

श्वेता शर्मा को यदि गिरिडीह उपचुनाव से पहले मंत्री बनाया जाता है, तो राजनीतिक तुलना अपने आप सामने आएगी।

हफीजुल हसन—दिवंगत मंत्री के बेटे।

बेबी देवी—दिवंगत मंत्री की पत्नी।

श्वेता शर्मा—दिवंगत मंत्री की पत्नी।

सोमेश सोरेन—दिवंगत मंत्री के बेटे।

ऐसे में सवाल सिर्फ परिवार की राजनीतिक विरासत का नहीं रह जाता।

फिर सवाल उठता है कि मंत्री पद देने का राजनीतिक पैमाना क्या है?

क्या सामाजिक प्रतिनिधित्व इसमें भूमिका निभाता है?

क्या क्षेत्रीय संतुलन महत्वपूर्ण है?

क्या चुनावी गणित महत्वपूर्ण है?

या फिर इसके पीछे कोई संगठनात्मक कारण था?

इन सवालों का आधिकारिक उत्तर सामने नहीं आया है।

लेकिन राजनीतिक विश्लेषण के स्तर पर इन्हें नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता।

मुस्लिम, कुड़मी और अब ओबीसी समीकरण?

झारखंड की राजनीति में जातीय और सामाजिक समीकरणों का महत्व किसी से छिपा नहीं है।

हफीजुल हसन को मंत्री बनाए जाने को मुस्लिम राजनीतिक प्रतिनिधित्व के संदर्भ में देखा गया।

बेबी देवी को मंत्री बनाए जाने के पीछे जगरनाथ महतो की विरासत के साथ कुड़मी-महतो समाज का राजनीतिक महत्व भी चर्चा में रहा।

अब अगर श्वेता शर्मा को मंत्री बनाया जाता है, तो उनके ओबीसी सामाजिक आधार को देखते हुए इसे ओबीसी प्रतिनिधित्व और ओबीसी वोट बैंक की राजनीति के संदर्भ में भी पढ़ा जाएगा।

यह जरूरी नहीं कि यही एकमात्र कारण हो।

लेकिन झारखंड जैसी सामाजिक रूप से विविध राजनीति में किसी मंत्री पद या टिकट के पीछे सामाजिक समीकरणों पर चर्चा होना स्वाभाविक है।

और यहीं सबसे कठिन सवाल सामने आता है—

अगर मुस्लिम और कुड़मी-महतो सामाजिक समीकरणों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने की जरूरत महसूस हुई और अब ओबीसी प्रतिनिधित्व भी महत्वपूर्ण माना जाता है, तो आदिवासी प्रतिनिधित्व के मामले में सोमेश सोरेन के साथ अलग पैमाना क्यों अपनाया गया?

क्या यह मान लिया गया कि आदिवासी वोट झामुमो के साथ स्वाभाविक रूप से बना रहेगा?

क्या यह माना गया कि किसी आदिवासी नेता को मंत्री बनाया जाए या नहीं, इससे पार्टी के आदिवासी समर्थन पर बहुत ज्यादा असर नहीं पड़ेगा?

या फिर सोमेश सोरेन को मंत्री नहीं बनाए जाने के पीछे कोई दूसरा राजनीतिक और संगठनात्मक कारण था?

यही वह सवाल है जिसका जवाब अभी सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं है।

यहां आदिवासी समाज का नजरिया भी महत्वपूर्ण है

इस बहस को केवल राजनीतिक दलों और नेताओं के नजरिए से देखना पर्याप्त नहीं होगा।

क्या आदिवासी समाज में भी यह सवाल उठ रहा है कि राजनीतिक प्रतिनिधित्व केवल चुनाव के समय याद किया जाने वाला विषय नहीं हो सकता?

क्या सोमेश सोरेन की बड़ी जीत को आदिवासी नेतृत्व की स्वीकार्यता के रूप में देखा जाना चाहिए?

क्या झामुमो के भीतर आदिवासी नेतृत्व की अगली पीढ़ी को लेकर कोई नई रणनीति बन रही है?

और क्या यह मान लेना कि आदिवासी मतदाता किसी एक राजनीतिक दल के साथ स्थायी रूप से रहेगा, आने वाले समय में चुनौती बन सकता है?

[यहां आपके वीडियो में आदिवासी पत्रकार का इंटरव्यू/वर्जन लगाया जा सकता है।]

यह वर्जन इस विश्लेषण को एक महत्वपूर्ण दूसरा नजरिया देगा—खासकर इसलिए कि सवाल सिर्फ झामुमो के एक फैसले का नहीं, बल्कि झारखंड की आदिवासी राजनीति में बदलती आकांक्षाओं का है।

किसी वोट बैंक को स्थायी जागीर मानना कितना सुरक्षित?

भारतीय राजनीति में इसका एक बड़ा उदाहरण मायावती की राजनीति है।

बहुजन समाज पार्टी ने दलित सामाजिक आधार पर अपनी मजबूत राजनीतिक जमीन तैयार की और उत्तर प्रदेश में सत्ता तक पहुंची। 2007 में मायावती ने दलित-ब्राह्मण सामाजिक समीकरण को साथ लाकर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई।

लेकिन समय के साथ BSP का चुनावी आधार काफी कमजोर हुआ। 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में पार्टी सिर्फ एक सीट जीत सकी और 2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की 80 सीटों में उसे एक भी सीट नहीं मिली।

यह कहना सही नहीं होगा कि मायावती की पूरी राजनीति केवल जातीय आधार पर टिकी थी। उनकी राजनीति में सामाजिक न्याय, बहुजन प्रतिनिधित्व और व्यापक गठबंधन की रणनीति भी रही।

लेकिन इस पूरे अनुभव से एक राजनीतिक सबक जरूर निकलता है—

किसी एक सामाजिक समूह को अपना स्थायी और अटूट वोट बैंक मान लेना जोखिम भरा हो सकता है।

मतदाता केवल जाति नहीं देखता।

वह सम्मान देखता है।

अपनी हिस्सेदारी देखता है।

नेतृत्व देखता है।

और जरूरत पड़ने पर विकल्प भी तलाशता है।

झारखंड में यह सवाल और महत्वपूर्ण क्यों है?

झारखंड का आदिवासी समाज भी एकसमान राजनीतिक समूह नहीं है।

संथाल, मुंडा, उरांव, हो और दूसरे आदिवासी समुदायों की अपनी क्षेत्रीय और राजनीतिक आकांक्षाएं हैं।

इतिहास यह भी बताता है कि आदिवासी मतदाता किसी एक नेता को हमेशा के लिए अपना प्रतिनिधि मानकर नहीं चलता।

शिबू सोरेन दुमका से चुनाव हार चुके हैं।

हेमंत सोरेन भी 2014 में दुमका से चुनाव हार चुके हैं।

इसलिए यह मान लेना कि किसी एक नेता या पार्टी का आदिवासी समाज पर स्थायी राजनीतिक अधिकार है, लोकतांत्रिक राजनीति के अनुभवों से पूरी तरह मेल नहीं खाता।

कोल्हान का उदाहरण भी इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण है।

चंपाई सोरेन के भाजपा में जाने के बाद रामदास सोरेन झामुमो के साथ बने रहे। उनके निधन के बाद उनके बेटे सोमेश सोरेन ने घाटशिला उपचुनाव में जिस बड़े अंतर से जीत दर्ज की, वह अपने आप में राजनीतिक संदेश था।

1,04,794 वोट।

38,524 वोट की जीत।

और उसके बाद भी मंत्री पद नहीं।

इसलिए अगर गिरिडीह में श्वेता शर्मा को मंत्री बनाया जाता है, तो यह सवाल और मजबूत होकर सामने आएगा—

सोमेश सोरेन को क्यों नहीं?

असली सवाल श्वेता शर्मा का नहीं, राजनीतिक पैमाने का है

श्वेता शर्मा को मंत्री बनाया जाता है या नहीं, यह मुख्यमंत्री और झामुमो नेतृत्व का राजनीतिक फैसला होगा।

उन्हें मंत्री बनाया जाता है तो इसे उनके पति सुदिव्य कुमार सोनू की राजनीतिक विरासत, गिरिडीह उपचुनाव और सामाजिक प्रतिनिधित्व के संदर्भ में देखा जाएगा।

लेकिन उसी समय सोमेश सोरेन का मामला भी चर्चा में आएगा।

क्योंकि हफीजुल हसन की 5,247 वोट की जीत के बाद मंत्री पद मिला।

बेबी देवी ने 17,153 वोट से जीत दर्ज की और मंत्री बनीं।

सोमेश सोरेन ने 38,524 वोट से जीत दर्ज की और एक लाख से ज्यादा वोट हासिल किए।

फिर भी मंत्री नहीं बने।

यही तुलना इस पूरे राजनीतिक विमर्श को महत्वपूर्ण बनाती है।

और शायद सबसे बड़ा सवाल यही है—

क्या झामुमो की राजनीति में अलग-अलग सामाजिक समूहों के लिए अलग-अलग राजनीतिक पैमाने बन रहे हैं?

अगर हां, तो उसकी वजह क्या है?

और अगर नहीं…

तो सोमेश सोरेन के मामले में अलग फैसला क्यों हुआ?

राजनीति में किसी जाति, समुदाय या वर्ग का वोट किसी नेता की निजी संपत्ति नहीं होता।

आज जो समर्थन आपके साथ है, वह कल आपसे सवाल भी पूछ सकता है।

और जब मतदाता को लगता है कि उसकी राजनीतिक हिस्सेदारी, सम्मान या नेतृत्व की उपेक्षा हो रही है, तो वह नया राजनीतिक विकल्प तलाश सकता है।

इसलिए श्वेता शर्मा का संभावित मंत्री बनना केवल गिरिडीह की खबर नहीं होगी।

यह झामुमो की राजनीतिक रणनीति को पढ़ने का एक अवसर भी होगा।

और उस फैसले के साथ एक सवाल लगातार खड़ा रहेगा—

“अगर श्वेता शर्मा मंत्री बनती हैं, तो 38,524 वोट से जीतने वाले सोमेश सोरेन क्यों नहीं बने?”

यही सवाल आने वाले दिनों में झारखंड की राजनीति में एक बड़े विमर्श का आधार बन सकता है।

यह भी पढ़ें – कितना चल पायेगा झारखंड BJP का आदिवासी कार्ड

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वरिष्ठ पत्रकार आनंद कुमार करीब 30 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। उन्होंने एम.ए. (इतिहास), बैचलर ऑफ जर्नलिज्म और एमबीए (मार्केटिंग) की शिक्षा प्राप्त की है। 1996 में 'प्रभात खबर', रांची से बतौर प्रशिक्षु पत्रकार करियर की शुरुआत करके 'हिन्दुस्तान' और 'अमर उजाला' जैसे राष्ट्रीय समाचार पत्रों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल चुके आनंद कुमार हिन्दुस्तान, जमशेदपुर के स्थानीय संपादक भी रहे हैं। इसके अलावा The Photon News अखबार सहित Lagatar.in तथा Newswing.com जैसे डिजिटल माध्यमों में संपादक पद का दायित्व संभाल चुके हैं। इसके अलावा आनंद कुमार कॉरपोरेट कम्यूनिकेशन/जनसंपर्क, प्रबंधन, सरकार/प्रशासन और मीडिया शिक्षण का भी गहन अनुभव रखते हैं। उन्होंने सरयू राय - एक नाम कई आयाम' नामक पुस्तक का संपादन भी किया है।
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