सारंडा में नक्सल नेतृत्व की कमर टूटी, स्थायी ठिकाने छोड़ भागते फिर रहे उग्रवादी

Anand Kumar
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Ranchi : एक समय था जब सारंडा के जंगल नक्सलियों के लिए अभेद्य किले माने जाते थे। वर्षों तक यहां उनके स्थायी कैंप चलते रहे, जन अदालतें लगती थीं और संगठनात्मक ढांचा बेहद मजबूत दिखता था। लेकिन जनवरी 2026 के बाद तस्वीर तेजी से बदली है। अब वही जंगल नक्सलियों के लिए सुरक्षित ठिकाना नहीं, बल्कि डर और अनिश्चितता का पर्याय बन चुका है।

22 जनवरी 2026 को हुए बड़े एनकाउंटर ने नक्सल संगठन की रीढ़ पर सीधा प्रहार किया। एक साथ 17 नक्सलियों के मारे जाने, जिनमें एक करोड़ रुपये का इनामी अनल उर्फ पतिराम मांझी भी शामिल था, ने संगठन को गहरे संकट में डाल दिया। इसके बाद से सारंडा में नक्सली स्थायी कैंप छोड़कर ‘रनिंग कैंप’ की रणनीति अपनाने को मजबूर हो गए हैं।

स्थायी कैंप से पलायन, अब हर रात नया ठिकाना

पुलिस और खुफिया सूत्रों के अनुसार, सारंडा में अब भी 50 से 55 नक्सली सक्रिय हैं, जिनमें दो पर एक-एक करोड़ रुपये का इनाम घोषित है। लेकिन इनकी स्थिति पहले जैसी नहीं रही।
अब नक्सली दिनभर जंगलों में भटकते हैं, रात में किसी सुरक्षित स्थान पर अस्थायी कैंप लगाते हैं और सुबह होते ही उसे छोड़ देते हैं। यही ‘रनिंग कैंप’ रणनीति है, जहां हर कैडर अपना पूरा सामान साथ लेकर चलता है और अगले ठिकाने की जानकारी भी अंतिम समय पर दी जाती है।

नक्सल मामलों के जानकार मानते हैं कि गुरिल्ला युद्ध में यह रणनीति बेहद कठिन होती है। लगातार स्थान बदलने से संगठनात्मक अनुशासन, लॉजिस्टिक्स और मनोबल—तीनों पर असर पड़ता है। इस स्थिति में नक्सली न तो ग्रामीणों पर भरोसा कर पा रहे हैं और न ही अपने पुराने नेटवर्क पर।

जंगल में कैंप की फाइल फोटो।

बंकरों का राज खुला, दशकों की तैयारी उजागर

सारंडा के जंगलों में सुरक्षाबलों के गहराई तक प्रवेश के साथ नक्सलियों की वर्षों पुरानी तैयारियां सामने आई हैं। जंगलों के भीतर बनाए गए अंडरग्राउंड बंकर किसी सीमावर्ती युद्ध क्षेत्र की याद दिलाते हैं।
इन बंकरों में अनाज, दवाइयां, हथियार और गोला-बारूद सुरक्षित रखने की व्यवस्था थी। चारों ओर स्पाइक होल्स और आईईडी बिछाकर सुरक्षा बलों को नुकसान पहुंचाने की पूरी रणनीति तैयार की गई थी।

पिछले एक साल में 45 से अधिक बंकर ध्वस्त किए जा चुके हैं। कुल मिलाकर 600 से ज्यादा आईईडी, 170 से अधिक स्पाइक होल और लगभग 100 नक्सली ठिकानों को नष्ट किया गया है। यह साफ संकेत है कि नक्सली संगठन ने लंबे समय तक टिकने की पूरी तैयारी कर रखी थी, लेकिन अब वही ढांचा ढहता नजर आ रहा है।

सुरक्षा बलों की बढ़ती मौजूदगी, नक्सलियों की सिमटती दुनिया

2022 के बाद से सारंडा क्षेत्र में करीब चार दर्जन पुलिस कैंप स्थापित किए जा चुके हैं। पिछले पांच वर्षों में लगभग 380 नक्सलियों की गिरफ्तारी हुई है और 2023 से 2026 के बीच 27 नक्सली मारे गए हैं।
इन अभियानों में 70 से अधिक हथियार बरामद किए गए हैं, जिससे संगठन की मारक क्षमता पर सीधा असर पड़ा है।

सुरक्षा बलों की लगातार मौजूदगी ने नक्सलियों की आवाजाही को सीमित कर दिया है। जंगल से बाहर निकलते ही उनके पकड़े जाने या मुठभेड़ में मारे जाने का खतरा बढ़ गया है।

आरोपों का सहारा, लेकिन हकीकत अलग

एनकाउंटर के बाद भाकपा (माओवादी) की ओर से जारी ऑडियो बयान में सुरक्षाबलों पर हवाई हमले, जीपीएस ट्रैकर और जहर मिले खाद्य पदार्थों जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं। संगठन ने इसे ‘अमानवीय कार्रवाई’ बताया और संघर्ष जारी रखने की बात कही है।

हालांकि जमीनी हकीकत इन दावों से अलग नजर आती है। नक्सली भले ही सार्वजनिक रूप से संघर्ष तेज करने की बात कर रहे हों, लेकिन अंदरूनी हालात भगदड़ जैसे हैं। हथियारों की कमी, रसद संकट और नेतृत्व का लगातार कमजोर होना संगठन को भीतर से खोखला कर रहा है।

नेतृत्व संकट ने बढ़ाई मुश्किलें

झारखंड में भाकपा (माओवादी) का शीर्ष नेतृत्व लगातार कमजोर हुआ है। संगठन के सेकंड-इन-कमांड प्रशांत बोस उर्फ किशन दा, कंचन दा उर्फ कबीर जैसे नेताओं की गिरफ्तारी और कई वरिष्ठ नक्सलियों के आत्मसमर्पण ने नेतृत्व संकट पैदा कर दिया है।
इसके बाद एक करोड़ रुपये के इनामी नक्सलियों के मारे जाने से संगठन की रणनीतिक क्षमता को गहरा झटका लगा है।

पुलिस की रणनीति साफ है—शीर्ष नेतृत्व को निशाना बनाकर संगठन की कमांड स्ट्रक्चर तोड़ना। पिछले ढाई सालों में इसी रणनीति के तहत जब भी कोई बड़ा नक्सल कमांडर सक्रिय हुआ, उसे गंभीर परिणाम भुगतने पड़े।

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जन-मन की बात | विश्लेषण

सारंडा में नक्सलवाद का मौजूदा स्वरूप बताता है कि यह लड़ाई अब केवल हथियारों की नहीं, बल्कि मनोबल और संगठनात्मक क्षमता की है। स्थायी कैंप से रनिंग कैंप में शिफ्ट होना इस बात का संकेत है कि नक्सली अब बचाव की मुद्रा में हैं, आक्रामक स्थिति में नहीं।
हालांकि पूरी तरह खत्म होने की घोषणा करना अभी जल्दबाज़ी होगी, लेकिन इतना तय है कि सारंडा में नक्सल संगठन अपने सबसे कमजोर दौर से गुजर रहा है। आने वाले महीनों में यह देखना अहम होगा कि सुरक्षा बल इस बढ़त को स्थायी शांति में बदल पाते हैं या नहीं।

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वरिष्ठ पत्रकार आनंद कुमार करीब 30 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। उन्होंने एम.ए. (इतिहास), बैचलर ऑफ जर्नलिज्म और एमबीए (मार्केटिंग) की शिक्षा प्राप्त की है। 1996 में 'प्रभात खबर', रांची से बतौर प्रशिक्षु पत्रकार करियर की शुरुआत करके 'हिन्दुस्तान' और 'अमर उजाला' जैसे राष्ट्रीय समाचार पत्रों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल चुके आनंद कुमार हिन्दुस्तान, जमशेदपुर के स्थानीय संपादक भी रहे हैं। इसके अलावा The Photon News अखबार सहित Lagatar.in तथा Newswing.com जैसे डिजिटल माध्यमों में संपादक पद का दायित्व संभाल चुके हैं। इसके अलावा आनंद कुमार कॉरपोरेट कम्यूनिकेशन/जनसंपर्क, प्रबंधन, सरकार/प्रशासन और मीडिया शिक्षण का भी गहन अनुभव रखते हैं। उन्होंने सरयू राय - एक नाम कई आयाम' नामक पुस्तक का संपादन भी किया है।
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