MMDR Amendment Act लागू, झारखंड में सियासी घमासान; JMM सड़क पर उतरेगी, हेमंत सरकार जाएगी सुप्रीम कोर्ट

Anand Kumar
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रांची। केंद्र सरकार के माइंस एंड मिनरल्स (डेवलपमेंट एंड रेगुलेशन) संशोधन अधिनियम-2026 (MMDR Amendment Act) को लेकर झारखंड में सियासी टकराव तेज हो गया है। राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद कानून लागू हो चुका है। अब झारखंड सरकार ने इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाने का फैसला किया है, वहीं सत्तारूढ़ झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) ने कानून के विरोध में राज्यव्यापी आंदोलन का ऐलान किया है।

हेमंत सोरेन सरकार का आरोप है कि नए कानून से राज्य की खनिज संपदा पर उसके वित्तीय और संवैधानिक अधिकार प्रभावित होंगे और झारखंड को हजारों करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान हो सकता है। राज्य सरकार इस मुद्दे को कानूनी लड़ाई के साथ-साथ राजनीतिक और जन आंदोलन के रूप में भी आगे बढ़ाने की तैयारी में है।

सुप्रीम कोर्ट जाएगी झारखंड सरकार

झारखंड के वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि राज्य सरकार संशोधित MMDR कानून के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाएगी। सरकार का अनुमान है कि नए प्रावधानों के कारण राज्य को करीब 14 हजार करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान हो सकता है।

सरकार का कहना है कि खनिज संपदा झारखंड की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार है और इससे होने वाले राजस्व का सीधा असर राज्य की विकास और कल्याणकारी योजनाओं पर पड़ता है। वित्त मंत्री ने कहा है कि राज्य अपने आर्थिक हितों और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए कानूनी रास्ता अपनाएगा।

क्या बदला है MMDR कानून में?

संशोधित कानून में राज्यों द्वारा खनिज अधिकारों और खनिज-युक्त भूमि पर टैक्स, सेस या अन्य लेवी लगाने की शक्तियों पर नई पाबंदियां लगाई गई हैं। कानून में ‘मिनरल-बेयरिंग लैंड’ यानी खनिज-युक्त भूमि को लेकर भी नए प्रावधान जोड़े गए हैं।

संशोधन के तहत राज्यों को इस तरह की लेवी लगाने की अनुमति केंद्र द्वारा निर्धारित शर्तों और सीमाओं के अधीन होगी। यही प्रावधान झारखंड सरकार के विरोध का सबसे बड़ा आधार है।

यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि 2024 में सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की संविधान पीठ ने Mineral Area Development Authority मामले में राज्यों की खनिज अधिकारों पर टैक्स लगाने की शक्ति को मान्यता दी थी। अब नए कानून के बाद इस अधिकार की सीमा को लेकर संवैधानिक बहस फिर तेज हो गई है।

JMM का आंदोलन का ऐलान

कानून के खिलाफ JMM ने भी आर-पार की लड़ाई का ऐलान किया है। पार्टी का कहना है कि वह केवल विधानसभा या संसद में विरोध तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि राज्यभर में जनजागरण और आंदोलन चलाया जाएगा।

JMM के नेताओं के अनुसार पार्टी कार्यकर्ता गांव-गांव जाकर लोगों को संशोधित कानून के संभावित प्रभावों के बारे में बताएंगे। पार्टी ने कानूनी और संवैधानिक लड़ाई के साथ राजनीतिक तथा जमीनी आंदोलन चलाने की रणनीति तैयार की है।

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन पहले ही इस मुद्दे को राज्य के अधिकार और संघीय ढांचे से जोड़ चुके हैं। उनका कहना है कि झारखंड की खनिज संपदा से जुड़े अधिकारों की रक्षा के लिए सरकार हर स्तर पर लड़ाई लड़ेगी।

JMM का दावा- हजारों करोड़ का नुकसान

JMM नेताओं का दावा है कि MMDR संशोधन से झारखंड को हर साल हजारों करोड़ रुपये के राजस्व का नुकसान हो सकता है। पार्टी ने यह भी आरोप लगाया है कि इससे राज्य की सामाजिक सुरक्षा और कल्याणकारी योजनाओं पर असर पड़ेगा।

हालांकि राजस्व नुकसान की वास्तविक राशि को लेकर अलग-अलग अनुमान सामने आए हैं। झारखंड सरकार करीब 14 हजार करोड़ रुपये के नुकसान का अनुमान बता रही है, जबकि कुछ अर्थशास्त्रियों ने इससे कम नुकसान का अनुमान जताया है। इसलिए अंतिम वित्तीय प्रभाव कानून के अमल और वास्तविक खनन राजस्व पर निर्भर करेगा।

केंद्र और भाजपा का अलग तर्क

वहीं, केंद्र सरकार और भाजपा का तर्क इससे अलग है। भाजपा नेताओं का कहना है कि संशोधन का उद्देश्य राज्यों के खनिज राजस्व को पूरी तरह खत्म करना नहीं है, बल्कि खनन क्षेत्र में एकरूपता, पारदर्शिता और नियमन सुनिश्चित करना है।

भाजपा का कहना है कि राज्यों को रॉयल्टी, नीलामी प्रीमियम और अन्य निर्धारित राजस्व स्रोतों से हिस्सा मिलता रहेगा। पार्टी ने JMM और कांग्रेस पर कानून को लेकर भ्रम फैलाने का आरोप भी लगाया है।

यानी अब विवाद केवल यह नहीं है कि झारखंड को कितना राजस्व मिलेगा। असली सवाल यह है कि खनिज अधिकारों और खनिज-युक्त जमीन पर टैक्स लगाने का अंतिम अधिकार किसके पास होगा—राज्य के पास या केंद्र के पास?

अब सड़क से सुप्रीम कोर्ट तक होगी लड़ाई

MMDR कानून के लागू होने के बाद झारखंड में अब लड़ाई के दो मोर्चे साफ दिखाई दे रहे हैं। एक तरफ हेमंत सोरेन सरकार सुप्रीम कोर्ट में कानून को चुनौती देने की तैयारी कर रही है, तो दूसरी तरफ JMM इसे राजनीतिक और जन आंदोलन का मुद्दा बनाने में जुट गया है।

झारखंड जैसे खनिज संपदा से समृद्ध राज्य के लिए यह मामला केवल एक कानून का विरोध नहीं, बल्कि राजस्व, खनिज संसाधनों पर अधिकार और केंद्र-राज्य संबंधों से जुड़ा बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन चुका है।

अब देखना महत्वपूर्ण होगा कि सुप्रीम कोर्ट में राज्य सरकार की चुनौती किस रूप में सामने आती है और JMM का प्रस्तावित आंदोलन जमीन पर कितना प्रभाव पैदा कर पाता है। अगर यह मुद्दा व्यापक जनसमर्थन हासिल करता है तो आने वाले दिनों में झारखंड की राजनीति में ‘खनिज अधिकार बनाम केंद्र का नियंत्रण’ एक बड़ा राजनीतिक नैरेटिव बन सकता है।

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वरिष्ठ पत्रकार आनंद कुमार करीब 30 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। उन्होंने एम.ए. (इतिहास), बैचलर ऑफ जर्नलिज्म और एमबीए (मार्केटिंग) की शिक्षा प्राप्त की है। 1996 में 'प्रभात खबर', रांची से बतौर प्रशिक्षु पत्रकार करियर की शुरुआत करके 'हिन्दुस्तान' और 'अमर उजाला' जैसे राष्ट्रीय समाचार पत्रों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल चुके आनंद कुमार हिन्दुस्तान, जमशेदपुर के स्थानीय संपादक भी रहे हैं। इसके अलावा The Photon News अखबार सहित Lagatar.in तथा Newswing.com जैसे डिजिटल माध्यमों में संपादक पद का दायित्व संभाल चुके हैं। इसके अलावा आनंद कुमार कॉरपोरेट कम्यूनिकेशन/जनसंपर्क, प्रबंधन, सरकार/प्रशासन और मीडिया शिक्षण का भी गहन अनुभव रखते हैं। उन्होंने सरयू राय - एक नाम कई आयाम' नामक पुस्तक का संपादन भी किया है।
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