एक फरवरी की रात से ही लापता हैं बच्चे, पुलिस कार्रवाई पर उठ रहे सवाल
Koderma : कोडरमा जिले के जयनगर थाना क्षेत्र अंतर्गत खरियोडीह पंचायत के गड़ीयाई बिरहोर टोला से 10 बिरहोर बच्चे लापता हैं। इस घटना ने पूरे इलाके में सनसनी फैला दी है। कई दिनों से बच्चों का कोई सुराग नहीं मिलने के कारण परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल है, वहीं आदिवासी बहुल इस इलाके में भय और अनिश्चितता का माहौल गहराता जा रहा है।
एक फरवरी की रात से लापता
ग्रामीणों के अनुसार, घटना एक फरवरी की रात गड़ीयाई बिरहोर टोला के लोग पास के परसाबाद गांव में एक श्राद्ध कर्म के उपलक्ष्य में आयोजित भोज में शामिल होने गए थे। बताया जा रहा है कि बच्चे भी उसी समूह के साथ थे।
भोज के बाद जब ग्रामीण अपने घर लौटे, तब उन्हें एहसास हुआ कि 10 बच्चे उनके साथ नहीं हैं। शुरुआती तौर पर परिजनों को लगा कि बच्चे किसी दूसरे समूह के साथ लौट रहे होंगे, लेकिन जब अगली सुबह तक बच्चे घर नहीं पहुंचे, तब ग्रामीणों ने खुद तलाश शुरू की।
खोजबीन के बावजूद कोई सुराग नहीं
ग्रामीणों ने आसपास के जंगल, रास्तों और परिचित गांवों में खोजबीन की, लेकिन बच्चों का कोई पता नहीं चला। इसके बाद मामले की सूचना तुरंत पुलिस को दी गई।
आरोप है कि शुरुआत में पुलिस ने मामले को गंभीरता से नहीं लिया और पंचायत मुखिया को ही अपने स्तर पर खोजबीन करने की सलाह दे दी।
प्रशासन हरकत में, लेकिन सवाल बरकरार
जब मुखिया और ग्रामीणों की तमाम कोशिशों के बावजूद बच्चों का कोई पता नहीं चला, तब जाकर जयनगर बीडीओ को मामले की जानकारी दी गई। बीडीओ ने तत्काल वरीय अधिकारियों को सूचना दी, जिसके बाद पुलिस ने जांच शुरू की।
अब बच्चों की एक साथ बड़ी संख्या में गुमशुदगी को देखते हुए पुलिस मामले की गंभीरता से जांच कर रही है, लेकिन घटना के कई दिन बीत जाने के बाद भी कोई ठोस सुराग न मिलना चिंता बढ़ा रहा है।
संवेदनशील पहलू: बिरहोर समुदाय
बिरहोर झारखंड की उन विशेष रूप से कमजोर आदिम जनजातियों में से हैं, हालांकि, आज के बदलते दौर में इनके सामने अस्तित्व बचाने की चुनौती है। 2011 की जनगणना के अनुसार इमकी आबादी लगभग 10 हजार के आसपास है। इनका पारंपरिक जीवन जंगल पर आधारित है और ये आजीविका के लिए प्रकृति पर निर्भर रहते हैं। रस्सी या टोकरी बनाना इनकी पारंपरिक हुनर में शामिल है।
बिरहोर जनजाति मुख्य रूप से झारखंड के हजारीबाग, रामगढ़, रांची, बोकारो, गिरिडीह और कोडरमा जिलों में छोटे-छोटे समूहों में निवास करती है।
ऐसे समुदाय के बच्चों का इस तरह लापता होना केवल कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं, बल्कि प्रशासनिक संवेदनशीलता और निगरानी व्यवस्था की भी परीक्षा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे मामलों में पहले 24 घंटे सबसे अहम होते हैं। शुरुआती देरी अक्सर जांच को कमजोर कर देती है।
राज्य में बढ़ती गुमशुदगी की घटनाएं
यह मामला ऐसे समय सामने आया है, जब झारखंड में बच्चों के लापता होने की कई घटनाएं हाल के महीनों में दर्ज की गई हैं। मानव तस्करी, बाल श्रम और संगठित गिरोहों की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। ऐसे में कोडरमा की यह घटना प्रशासन के लिए एक अलार्म बेल की तरह है।
आगे क्या?
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि—
- शुरुआती स्तर पर पुलिस ने तत्परता क्यों नहीं दिखाई?
परिजनों और ग्रामीणों की निगाहें अब प्रशासन और पुलिस कार्रवाई पर टिकी हैं। हर गुजरता दिन बच्चों की सुरक्षित वापसी की उम्मीद को और बेचैन कर रहा है।