पड़ताल : करोड़ों का बजट कागजों पर खर्च, सुदूर गांवों में कानून नहीं ‘कुप्रथा’ का राज; पश्चिमी सिंहभूम और गुमला सबसे ज्यादा प्रभावित
Ranchi/Hazaribagh : झारखंड के हजारीबाग जिले के विष्णुगढ़ में 12 साल की एक मासूम बच्ची की तंत्र-मंत्र के नाम पर हत्या ने राज्य को झकझोर दिया है। यह घटना सिर्फ एक आपराधिक वारदात नहीं, बल्कि उस सामाजिक सच्चाई को उजागर करती है, जहां आज भी अंधविश्वास कानून, शिक्षा और आधुनिकता पर भारी पड़ रहा है।
यह मामला बताता है कि झारखंड के कई ग्रामीण इलाकों में आज भी बीमारी, दुर्भाग्य या किसी अनहोनी के पीछे ‘डायन’ या ‘टोना-टोटका’ को जिम्मेदार ठहराकर निर्दोष लोगों को मौत के घाट उतार दिया जाता है। सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि इस कुप्रथा का सबसे आसान निशाना महिलाएं और बच्चे बन रहे हैं।
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चार साल में 73 हत्याएं: अंधविश्वास बना मौत का कारण
दैनिक भास्कर अखबार की एक रिपोर्ट में सामने आया है कि वर्ष 2022 से 2025 के बीच झारखंड में अंधविश्वास के नाम पर 73 लोगों की हत्या हुई। यानी हर साल औसतन 18 लोग सिर्फ इसलिए अपनी जान गंवा रहे हैं, क्योंकि समाज का एक हिस्सा अब भी झाड़-फूंक और तंत्र-मंत्र को सच मानता है।
यह आंकड़े इस बात का संकेत हैं कि कानून और जागरूकता अभियान जमीनी स्तर पर अपेक्षित प्रभाव नहीं छोड़ पा रहे हैं।

पश्चिमी सिंहभूम और गुमला: अंधविश्वास के ‘हॉटस्पॉट’
अखबार के अनुसार, राज्य के कुछ जिले इस कुप्रथा की चपेट में बुरी तरह फंसे हुए हैं:
- पश्चिमी सिंहभूम: यहां सबसे ज्यादा 13 हत्याएं हुई हैं।
- गुमला: 9 लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी।
- गढ़वा में 6, दुमका और खूंटी में 5-5 हत्याएं
रांची: राजधानी होने के बावजूद यहां 7 लोगों की हत्या अंधविश्वास के कारण हुई।
यह स्थिति दर्शाती है कि शहरी क्षेत्रों का प्रभाव भी अंधविश्वास को खत्म नहीं कर पा रहा है और ग्रामीण मानसिकता अब भी हावी है।
मौत का आंकड़ा (2022-2025)
झारखंड पुलिस के स्रोतों से प्राप्त डेटा बताता है कि हर साल औसतन 18 लोग डायन-बिसाही या झाड़-फूंक के नाम पर मार दिए जाते हैं:

कानून बेअसर: सिर्फ 5% सजा दर क्यों?
राज्य में ‘डायन प्रथा प्रतिषेध अधिनियम’ लागू है, फिर भी अपराधी बेखौफ हैं। इसके पीछे के कड़वे सच निम्नलिखित हैं:
- गवाहों का मुकरना: ग्रामीण इलाकों में सामाजिक बहिष्कार का इतना डर होता है कि कोर्ट पहुँचने से पहले ही गवाह मुकर जाते हैं।
- कानूनी पेचीदगियां: सजा की दर महज 5 प्रतिशत होना यह साबित करता है कि पुलिस और अभियोजन पक्ष (Prosecution) साक्ष्य जुटाने में विफल रह रहे हैं।
- भीड़ का तंत्र: अक्सर इन हत्याओं को ‘भीड़ की सजा’ का रूप दे दिया जाता है, जिससे मुख्य साजिशकर्ता बच निकलते हैं।
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सरकारी बजट का खेल: नुक्कड़ नाटकों तक सीमित जागरूकता
झारखंड सरकार इस कुप्रथा को मिटाने के लिए सालाना 2 करोड़ रुपए का बजट देती है, लेकिन इसकी हकीकत निराशाजनक है:
- 60% खर्च: शहरों और प्रखंड मुख्यालयों में बैनर, पोस्टर और नुक्कड़ नाटकों पर खर्च हो जाता है।
- 25% खर्च: मुआवजा और पुनर्वास पर।
- जमीनी हकीकत: वह टीम जो जागरूकता फैलाने के लिए बनी है, सुदूर जंगल और पहाड़ी गांवों तक पहुँचती ही नहीं, जहाँ इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है।
बदलाव कैसे आएगा?
सामाजिक विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक शिक्षा, स्वास्थ्य सुविधाओं और कानून के डर का त्रिकोण नहीं बनेगा, तब तक मासूमों की बलि चढ़ती रहेगी। गांवों में जब कोई बीमार पड़ता है, तो डॉक्टर की कमी उसे ओझा-गुणी के पास ले जाती है, और यहीं से शुरू होता है ‘डायन’ करार देने और हत्या का सिलसिला।
सवाल बड़ा है: कानून बनाम अंधविश्वास
हजारीबाग की यह घटना एक बड़े सवाल को जन्म देती है, क्या सिर्फ कानून बना देने से अंधविश्वास खत्म हो जाएगा?
जब तक शिक्षा, सामाजिक जागरूकता और सख्त कानून का संयुक्त प्रभाव नहीं दिखेगा, तब तक ऐसे मामले रुकने वाले नहीं हैं।
(समाचार स्रोत – दैनिक भास्कर)