Jan-Man Desk : झारखंड में 8 मार्च को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर महिला सशक्तिकरण के बड़े-बड़े संकल्प लिए जाएंगे। लेकिन, इन सरकारी दावों और आश्वासनों के बीच राज्य में बाल विवाह की कुप्रथा आज भी एक नासूर बनी हुई है। एक तरफ रांची में यूनिसेफ (UNICEF) और राज्य सरकार 2029 तक झारखंड को ‘बाल विवाह मुक्त’ बनाने की वृहद कार्ययोजना पर मंथन कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ देवघर जैसे जिले के जमीनी आंकड़े इन संस्थागत संकल्पों पर गंभीर सवाल खड़े कर रहे हैं।
यूनिसेफ का लक्ष्य: किशोरियों की शिक्षा और स्वास्थ्य पर जोर झारखंड की कुल आबादी में लगभग 22 प्रतिशत हिस्सेदारी किशोर-किशोरियों की है, जो एनीमिया, स्कूल ड्रॉपआउट, और कम उम्र में गर्भधारण जैसी गंभीर चुनौतियों से जूझ रहे हैं। इनके बेहतर भविष्य के लिए रांची के विश्वा प्रशिक्षण केंद्र में यूनिसेफ द्वारा ‘किशोर सशक्तिकरण एवं बाल विवाह उन्मूलन’ विषय पर एक अहम कार्यशाला का आयोजन किया गया। इस परामर्श सत्र का मुख्य लक्ष्य 2029 तक राज्य को बाल विवाह से पूरी तरह मुक्त करना है।
यूनिसेफ झारखंड की प्रमुख डॉ. कनीनिका मित्र ने स्पष्ट किया कि हालांकि राज्य में बाल विवाह की स्थिति में पहले से सुधार हुआ है, लेकिन आज भी यह आंकड़ा 32 प्रतिशत पर अटका हुआ है। कार्यशाला में यूनिसेफ इंडिया की चीफ ऑफ फील्ड सर्विसेज सोलेडैड हेरेरो और झारखंड महिला विकास सोसायटी की निदेशक किरण कुमारी पासी ने जोर देकर कहा कि लड़कियों को शिक्षित करना और आजीविका के अवसर प्रदान करना ही बाल विवाह मुक्त राज्य बनाने की सबसे पहली शर्त है। सरकार इसके लिए जिला स्तर पर कार्य योजनाओं के माध्यम से काम कर रही है।
देवघर की डरावनी स्थिति: पूरे राज्य में दूसरे स्थान पर राजधानी के वातानुकूलित कमरों में बन रही इन नीतियों से उलट, संथाल परगना के देवघर जिले की हकीकत बेहद डरावनी है। आंकड़ों के अनुसार, बाल विवाह के मामलों में देवघर पूरे झारखंड में दूसरे स्थान पर है। देवघर की जिला समाज कल्याण पदाधिकारी कुमारी रंजना ने खुद इस बात की पुष्टि की है कि जिले में करीब 49 प्रतिशत ऐसे मामले चिन्हित किए जा रहे हैं जो सीधे तौर पर बाल विवाह की श्रेणी में आते हैं।
विभागीय आंकड़ों पर नजर डालें तो पिछले महज डेढ़ साल के भीतर बाल मजदूरी, खोया-पाया और बाल विवाह से जुड़े लगभग 150 मामले दर्ज किए गए हैं, जिनमें से आधे से अधिक मामले सिर्फ और सिर्फ बाल विवाह के हैं। जनवरी 2025 से अक्टूबर 2025 के बीच ही 20 से 25 बाल विवाह के मामले सामने आए, जिन पर जिला प्रशासन को हस्तक्षेप करना पड़ा।
जागरूकता अभियान और सामाजिक दबाव की जकड़न हाल ही में देवघर के ठाड़ी मोहल्ले में भी प्रशासन ने एक बाल विवाह रुकवाकर परिजनों पर कानूनी कार्रवाई की थी। इस कुरीति को रोकने के लिए प्रशासन लगातार जागरूकता कार्यक्रम चला रहा है। दोनों अनुमंडलों में आंगनबाड़ी सेविका-सहायिका, ग्राम प्रधान, मुखिया और स्वयं सहायता समूहों को विशेष प्रशिक्षण दिया जा रहा है, ताकि वे गांव-गांव जाकर लोगों को इसके दुष्परिणाम समझा सकें। सभी प्रखंडों के सीडीपीओ और बीडीओ को भी सख्त निर्देश हैं कि सूचना मिलते ही तुरंत कार्रवाई की जाए।
इसके बावजूद, स्थानीय लोगों की मानें तो ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी सामाजिक दबाव और जानकारी के घोर अभाव के कारण कई जगहों पर गुपचुप तरीके से बाल विवाह कराए जा रहे हैं। लोग इसे एक ‘सामान्य परंपरा’ मानकर स्वीकार कर लेते हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब तक समाज की सोच नहीं बदलेगी, क्या सिर्फ कागजी लक्ष्यों और कार्यशालाओं के जरिए झारखंड 2029 तक खुद को इस अभिशाप से मुक्त कर पाएगा?