Wedding Cost Survey: शादियों में 65% मेहमान सिर्फ खाना खाने आते हैं, 20 सेकंड में खत्म हो जाता है ‘शादी का अनुभव’

Anand Kumar
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स्पेशल डेस्क। शादी को भारतीय समाज में जीवन का सबसे पवित्र और आनंददायक संस्कार माना जाता है, लेकिन समय के साथ यह परंपरा अब दिखावे और प्रतिस्पर्धा का रूप लेती जा रही है। दो परिवारों के मिलन का उत्सव अब इस बात का पैमाना बन गया है कि कौन कितनी भव्य और महंगी शादी कर सकता है। इसी प्रवृत्ति पर अब एक सर्वे ने चौंकाने वाले तथ्य सामने रखे हैं।

औसतन 330 मेहमान, खर्च करीब 30 लाख

WeddingWire के Newlyweds Survey के मुताबिक, भारतीय शादियों में औसतन 330 मेहमान शामिल होते हैं और एक शादी का कुल खर्च लगभग 29.60 लाख रुपये तक पहुंच जाता है।लेकिन हैरानी की बात यह है कि इस भारी खर्च के बावजूद, हर मेहमान दूल्हा-दुल्हन के लिए औसतन सिर्फ 20 सेकंड ही निकाल पाता है।

इन 20 सेकंड में क्या देखते हैं मेहमान?

सर्वे के मुताबिक—

  • 65 प्रतिशत मेहमान शादियों में मुख्य रूप से खाना खाने पर ध्यान देते हैं।
  • 60 प्रतिशत मेहमान शादी को एक तरह का फैशन शो मानते हैं, जहां वे अपने कपड़े, गहने और स्टाइल दिखाने आते हैं।
  • 55 प्रतिशत लोग केवल सामाजिक औपचारिकता निभाने पहुंचते हैं, ताकि रिश्तों में “आना-जाना” बना रहे।

इन आंकड़ों से साफ है कि लाखों रुपये खर्च करने के बावजूद, शादी का भावनात्मक पक्ष बड़ी संख्या में मेहमानों के लिए गौण हो चुका है।


20 प्रतिशत खाना बर्बाद: बुफे सिस्टम सवालों के घेरे में

इस सर्वे का सबसे चिंताजनक पहलू भोजन की बर्बादी है। यूनिवर्सिटी ऑफ बेंगलुरु द्वारा 75 शादियों पर किए गए अध्ययन में पाया गया कि करीब 20 प्रतिशत भोजन सीधे कचरे में चला जाता है

विशेषज्ञों के अनुसार, बुफे सिस्टम में लोग अपनी भूख के हिसाब से नहीं, बल्कि दिखावे और अधिक विकल्प लेने की मानसिकता से प्लेट भरते हैं। नतीजा यह होता है कि बड़ी मात्रा में खाना बिना उपयोग के फेंक दिया जाता है, जो सामाजिक और नैतिक दोनों स्तरों पर गंभीर चिंता का विषय है।


शादी के बाद कर्ज और तनाव की शुरुआत

रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि दिखावे की होड़ में एक औसत भारतीय परिवार अपनी सालाना आय से लगभग छह गुना अधिक खर्च शादी पर कर देता है।
इसका परिणाम यह होता है कि—

  • शादी के बाद आर्थिक दबाव बढ़ जाता है
  • कर्ज का बोझ लंबे समय तक परिवार को परेशान करता है
  • नई शुरुआत खुशी के बजाय तनाव और असुरक्षा के साथ होती है

विशेषज्ञ मानते हैं कि यह प्रवृत्ति मध्यम वर्ग और निम्न मध्यम वर्ग के लिए विशेष रूप से खतरनाक साबित हो रही है।


रिश्तों का उत्सव या दिखावे का मंच?

यह सर्वे केवल खर्च और बर्बादी के आंकड़े नहीं देता, बल्कि समाज के सामने एक बड़ा सवाल भी खड़ा करता है।
क्या शादी अब भी रिश्तों का उत्सव है, या फिर यह केवल प्रदर्शन और सामाजिक दबाव का मंच बनकर रह गई है?

शादियों में बढ़ता खर्च, भोजन की बर्बादी और दिखावे की संस्कृति यह संकेत देती है कि अब पुनर्विचार की जरूरत है—ताकि विवाह फिर से सादगी, भावनाओं और संबंधों के मूल उद्देश्य की ओर लौट सके।

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वरिष्ठ पत्रकार आनंद कुमार करीब 30 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। उन्होंने एम.ए. (इतिहास), बैचलर ऑफ जर्नलिज्म और एमबीए (मार्केटिंग) की शिक्षा प्राप्त की है। 1996 में 'प्रभात खबर', रांची से बतौर प्रशिक्षु पत्रकार करियर की शुरुआत करके 'हिन्दुस्तान' और 'अमर उजाला' जैसे राष्ट्रीय समाचार पत्रों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल चुके आनंद कुमार हिन्दुस्तान, जमशेदपुर के स्थानीय संपादक भी रहे हैं। इसके अलावा The Photon News अखबार सहित Lagatar.in तथा Newswing.com जैसे डिजिटल माध्यमों में संपादक पद का दायित्व संभाल चुके हैं। इसके अलावा आनंद कुमार कॉरपोरेट कम्यूनिकेशन/जनसंपर्क, प्रबंधन, सरकार/प्रशासन और मीडिया शिक्षण का भी गहन अनुभव रखते हैं। उन्होंने सरयू राय - एक नाम कई आयाम' नामक पुस्तक का संपादन भी किया है।
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