Ranchi: झारखंड में प्रस्तावित परिसीमन और उससे अनुसूचित जनजाति (ST) के राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर पड़ने वाले संभावित असर को लेकर रविवार को रांची का मोरहाबादी मैदान आदिवासी एकता महाजुटान का गवाह बना। राज्य के विभिन्न जिलों से बड़ी संख्या में आदिवासी समाज के लोग कार्यक्रम में पहुंचे। महाजुटान में परिसीमन के साथ जल-जंगल-जमीन, विस्थापन, पलायन, पांचवीं अनुसूची, CNT-SPT कानून और आदिवासियों के संवैधानिक अधिकारों से जुड़े मुद्दे प्रमुखता से उठे।
- राहुल गांधी का संदेश- अधिकार, पहचान और सम्मान की लड़ाई में साथ
- परिसीमन पर तैयार रिपोर्ट राहुल गांधी तक पहुंचाने की तैयारी
- बंधु तिर्की बोले- यह सिर्फ सीटों की नहीं, अधिकारों की लड़ाई
- शिल्पी नेहा तिर्की ने कहा- परिसीमन तय करेगा कितनी मजबूत होगी आदिवासियों की आवाज
- कालीचरण मुंडा ने किया एकजुट होने का आह्वान
- दयामनी बारला ने कहा- अधिकारों के लिए जारी रहेगा संघर्ष
- विक्रांत भूरिया ने आरक्षण और राजनीतिक प्रतिनिधित्व का मुद्दा उठाया
- विकास मुंडा ने 2007 के परिसीमन का किया जिक्र
- ग्लैडसन डुंगडुंग ने पांचवीं अनुसूची का सवाल उठाया
- बिरसा मुंडा के अनुयायी भी पहुंचे महाजुटान
- महाजुटान की प्रमुख मांगें
- परिसीमन के विरोध से ज्यादा प्रक्रिया पर सवाल
महाजुटान का केंद्रीय संदेश यह रहा कि आदिवासी समाज परिसीमन का विरोध नहीं करता, लेकिन ऐसी किसी प्रक्रिया को स्वीकार नहीं करेगा जिससे लोकसभा और विधानसभा में ST के लिए आरक्षित सीटों या राजनीतिक प्रतिनिधित्व में कमी आए।
आयोजकों और वक्ताओं ने मांग की कि परिसीमन के बाद यदि लोकसभा और विधानसभा की कुल सीटों की संख्या बढ़ती है तो ST आरक्षित सीटों की संख्या भी उसी अनुपात में बढ़ाई जाए।
राहुल गांधी का संदेश- अधिकार, पहचान और सम्मान की लड़ाई में साथ
महाजुटान में कांग्रेस नेता राहुल गांधी स्वयं उपस्थित नहीं हुए। लोहरदगा सांसद सुखदेव भगत ने मंच से उनका संदेश पढ़कर सुनाया।
राहुल गांधी ने कार्यक्रम में शामिल नहीं हो पाने पर खेद जताते हुए आदिवासी समाज के अधिकार, पहचान और सम्मान की लड़ाई में साथ खड़े रहने का संदेश दिया। उन्होंने जयपाल सिंह मुंडा के योगदान को याद करते हुए कहा कि आदिवासी अधिकारों को संवैधानिक सुरक्षा दिलाने की लड़ाई का लंबा इतिहास रहा है।
राहुल गांधी के संदेश में पांचवीं अनुसूची, पेसा और वन अधिकार कानून का भी उल्लेख किया गया। उन्होंने जल-जंगल-जमीन के सवाल को केवल प्राकृतिक संसाधनों का मुद्दा नहीं, बल्कि आदिवासी समाज के सम्मान, अस्मिता और अधिकार से जुड़ा विषय बताया।

परिसीमन पर तैयार रिपोर्ट राहुल गांधी तक पहुंचाने की तैयारी
महाजुटान के दौरान परिसीमन और आदिवासी प्रतिनिधित्व से जुड़े मुद्दों पर तैयार एक रिपोर्ट भी प्रस्तुत की गई। हाईकोर्ट के अधिवक्ता सुशीष सोरेन ने यह रिपोर्ट तैयार करने में भूमिका निभाई है।
मंच से बताया गया कि रिपोर्ट झारखंड कांग्रेस प्रभारी के. राजू के माध्यम से राहुल गांधी तक पहुंचाई जाएगी। इसमें परिसीमन के संभावित प्रभाव और आदिवासी समाज के राजनीतिक तथा संवैधानिक अधिकारों से जुड़ी चिंताओं को शामिल किया गया है।
बंधु तिर्की बोले- यह सिर्फ सीटों की नहीं, अधिकारों की लड़ाई
कांग्रेस नेता बंधु तिर्की ने महाजुटान को संबोधित करते हुए परिसीमन को आदिवासी समाज के राजनीतिक और संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा मुद्दा बताया।
उन्होंने कहा कि यदि जनसंख्या को आधार बनाकर झारखंड के आदिवासी क्षेत्रों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व कम करने की कोशिश हुई तो इसका विरोध किया जाएगा। उन्होंने विस्थापन, पलायन और आदिवासी आबादी में आए बदलाव का मुद्दा भी उठाया।
बंधु तिर्की ने केंद्र सरकार और भाजपा-आरएसएस पर आदिवासी हितों को नुकसान पहुंचाने की कोशिश का आरोप लगाया। उन्होंने खनिज संसाधनों और झारखंड के अधिकारों का सवाल उठाते हुए आंदोलन को गांव-गांव तक ले जाने की बात कही।
शिल्पी नेहा तिर्की ने कहा- परिसीमन तय करेगा कितनी मजबूत होगी आदिवासियों की आवाज
मंत्री शिल्पी नेहा तिर्की ने कहा कि परिसीमन को केवल विधानसभा और लोकसभा सीटों के पुनर्गठन तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए। इसका सीधा संबंध आने वाले समय में आदिवासी समाज के राजनीतिक प्रतिनिधित्व से है।
उन्होंने 2007 में उठे परिसीमन विवाद का उल्लेख करते हुए कहा कि आदिवासी समाज की राजनीतिक हिस्सेदारी को कमजोर नहीं होने दिया जाना चाहिए।
शिल्पी नेहा तिर्की ने विस्थापन और पलायन के कारण आदिवासी आबादी पर पड़े प्रभाव का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि अगर आदिवासी परिवार अपनी जमीन से विस्थापित हुए और रोजगार के लिए बाहर जाने को मजबूर हुए तो इसके लिए समुदाय को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
उन्होंने महाजुटान से उठी आवाज को सड़क से सदन और सदन से दिल्ली तक ले जाने की बात कही।
कालीचरण मुंडा ने किया एकजुट होने का आह्वान
खूंटी सांसद कालीचरण मुंडा ने आदिवासी समाज से परिसीमन के मुद्दे पर एकजुट रहने की अपील की। उन्होंने कहा कि आदिवासी पूर्वजों ने देश और अपने अधिकारों के लिए संघर्ष किया था और मौजूदा दौर में भी संवैधानिक तथा राजनीतिक अधिकारों की रक्षा के लिए समाज को जागरूक रहना होगा।
उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज की मौजूदा राजनीतिक हिस्सेदारी में कमी नहीं होनी चाहिए, बल्कि प्रतिनिधित्व बढ़ाने की दिशा में विचार किया जाना चाहिए।

दयामनी बारला ने कहा- अधिकारों के लिए जारी रहेगा संघर्ष
सामाजिक कार्यकर्ता दयामनी बारला ने भी परिसीमन और आदिवासी अधिकारों को लेकर कड़ा रुख अपनाया। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज अपने राजनीतिक अधिकार, जमीन और खनिज संसाधनों की रक्षा के लिए संघर्ष जारी रखेगा।
उन्होंने मांग की कि परिसीमन की प्रक्रिया आदिवासी समाज के प्रतिनिधित्व को मजबूत करने वाली होनी चाहिए, न कि उसे कमजोर करने वाली।
विक्रांत भूरिया ने आरक्षण और राजनीतिक प्रतिनिधित्व का मुद्दा उठाया
आदिवासी कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष विक्रांत भूरिया ने आरक्षण को आदिवासी समाज की शिक्षा, रोजगार और राजनीतिक भागीदारी के लिए महत्वपूर्ण बताया।
उन्होंने भाजपा पर आदिवासी समाज के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को कमजोर करने की कोशिश का आरोप लगाया। साथ ही आदिवासी समुदाय से आंतरिक पहचान के आधार पर बंटने के बजाय एकजुट रहने की अपील की।
विकास मुंडा ने 2007 के परिसीमन का किया जिक्र
तमाड़ विधायक विकास मुंडा ने भी 2007 के परिसीमन विवाद का जिक्र किया। उन्होंने आरोप लगाया कि परिसीमन के जरिए आदिवासी आरक्षित सीटों को प्रभावित किया जा सकता है।
वहीं खिजरी विधायक राजेश कच्छप ने कहा कि परिसीमन के सवाल पर आदिवासी और अनुसूचित जाति समुदायों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को सुरक्षित रखने की जरूरत है।
पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष प्रदीप बालमुचू ने भी जनसंख्या आधारित परिसीमन से ST आरक्षण पर संभावित प्रभाव का मुद्दा उठाया।
ग्लैडसन डुंगडुंग ने पांचवीं अनुसूची का सवाल उठाया
सामाजिक कार्यकर्ता ग्लैडसन डुंगडुंग ने अनुसूचित क्षेत्रों और पांचवीं अनुसूची के संवैधानिक प्रावधानों का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि झारखंड में आदिवासी आबादी के अनुपात को केवल वर्तमान जनसंख्या के आंकड़ों से नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि विस्थापन और पलायन के ऐतिहासिक प्रभाव को भी ध्यान में रखना होगा।
उन्होंने भाजपा और आरएसएस पर झारखंड के संसाधनों और आदिवासी अधिकारों को लेकर गंभीर आरोप लगाए।
बिरसा मुंडा के अनुयायी भी पहुंचे महाजुटान
महाजुटान में पश्चिमी सिंहभूम से बिरसा मुंडा के अनुयायी यानी बिरसाइयत समाज के लोग भी पहुंचे। पारंपरिक वेशभूषा में आए बिरसाइयत समुदाय के लोगों ने कार्यक्रम में अपनी अलग उपस्थिति दर्ज कराई।
देवगांव, बंदगांव समेत पश्चिमी सिंहभूम के विभिन्न इलाकों से पहुंचे बिरसाइयत समाज के लोगों ने आदिवासी पहचान, अस्मिता और अधिकारों की रक्षा के लिए एकजुटता का संदेश दिया।
महाजुटान की प्रमुख मांगें
महाजुटान में परिसीमन और आदिवासी अधिकारों को लेकर कई प्रमुख मांगें सामने रखी गईं। इनमें लोकसभा और विधानसभा में ST के लिए मौजूदा आरक्षित सीटों में किसी तरह की कमी नहीं करने की मांग सबसे प्रमुख रही।
इसके अलावा कुल सीटें बढ़ने की स्थिति में ST आरक्षित सीटों को भी उसी अनुपात में बढ़ाने, पांचवीं अनुसूची वाले क्षेत्रों को परिसीमन में विशेष महत्व देने और आदिवासी बहुल इलाकों की भौगोलिक एवं सामाजिक परिस्थितियों को ध्यान में रखने की मांग की गई।
आदिवासी संगठनों ने CNT और SPT एक्ट के उल्लंघन से हुए कथित अवैध भूमि हस्तांतरण की जांच और जमीन मूल रैयतों को वापस दिलाने की मांग भी उठाई।
इसके साथ अनुसूचित क्षेत्रों में बाहरी बसावट और जनसांख्यिकीय बदलाव, राज्यपाल की पांचवीं अनुसूची के तहत संवैधानिक भूमिका तथा पिछले कई दशकों में हुए विस्थापन, भूमि नुकसान और पलायन के प्रभाव का आकलन करने का मुद्दा भी उठाया गया।

परिसीमन के विरोध से ज्यादा प्रक्रिया पर सवाल
महाजुटान का महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि आयोजकों ने परिसीमन का पूर्ण विरोध करने के बजाय इसकी प्रक्रिया और उससे आदिवासी राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर पड़ने वाले संभावित असर को अपनी मुख्य चिंता बताया।
आदिवासी संगठनों का कहना है कि झारखंड की परिस्थितियों का आकलन केवल जनसंख्या के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए। पांचवीं अनुसूची, आदिवासी बहुल क्षेत्रों की ऐतिहासिक-सामाजिक संरचना, विस्थापन, पलायन और जमीन के हस्तांतरण जैसे कारकों को भी परिसीमन के दौरान ध्यान में रखा जाना चाहिए।
आयोजकों ने यह भी स्पष्ट किया कि महाजुटान किसी धर्म विशेष के खिलाफ नहीं है और इसका उद्देश्य आदिवासी समाज के संवैधानिक अधिकार, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, पहचान और सामाजिक हितों से जुड़े सवाल उठाना है।
रांची के मोरहाबादी मैदान से उठी यह आवाज अब परिसीमन को लेकर झारखंड की राजनीति में नई बहस खड़ी कर सकती है। खासकर ST आरक्षित सीटों और पांचवीं अनुसूची वाले क्षेत्रों को लेकर महाजुटान में उठी मांगें आने वाले दिनों में राजनीतिक दलों के लिए महत्वपूर्ण मुद्दा बन सकती हैं।
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