सुप्रीम कोर्ट का फैसला: नेशनल बुक ट्रस्ट अनुच्छेद 12 के तहत ‘राज्य’

Anand Kumar
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फोटो: Pinakpani / Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0.

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल बुक ट्रस्ट (NBT), इंडिया को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत ‘राज्य’ (State) के दायरे में माना है। अदालत ने कहा कि ट्रस्ट के गठन, प्रशासन, वित्तीय व्यवस्था और कामकाज पर केंद्र सरकार का नियंत्रण इतना गहरा और व्यापक है कि उसे केवल सोसायटी के रूप में पंजीकृत होने या किताबों की बिक्री से आय अर्जित करने के आधार पर सरकारी नियंत्रण से स्वतंत्र संस्था नहीं माना जा सकता। शीर्ष अदालत ने 6 नवंबर 2026 को यह फैसला सुनाते हुए ट्रस्ट की अपील खारिज कर दी।

न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने The Chairman, National Book Trust, India and Another v. A.R. Abdul Gaffar and Others मामले में यह निर्णय दिया। यह सिविल अपील संख्या 14369/2015 है और फैसले का न्यूट्रल साइटेशन 2026 INSC 1202 है। सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट की पूर्ण पीठ के 1 जून 2012 के फैसले को बरकरार रखा, जिसमें नेशनल बुक ट्रस्ट को अनुच्छेद 12 के तहत ‘अन्य प्राधिकरण’ और इस कारण ‘राज्य’ माना गया था।

सरकारी नियंत्रण के कई पहलुओं को एक साथ देखा

सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य सवाल यह था कि क्या नेशनल बुक ट्रस्ट संविधान के अनुच्छेद 12 में दी गई ‘राज्य’ की परिभाषा के अंतर्गत आता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी संस्था का केवल सोसायटी के रूप में पंजीकृत होना उसे इस दायरे से बाहर नहीं कर देता। यह देखना जरूरी है कि संस्था किस उद्देश्य से बनाई गई, उसके प्रशासन और निर्णय लेने की व्यवस्था पर सरकार का कितना प्रभाव है तथा वित्तीय और कार्यात्मक नियंत्रण किसके हाथ में है।

फैसले के मुताबिक, नेशनल बुक ट्रस्ट की स्थापना 15 जून 1957 के भारत सरकार के प्रस्ताव के तहत हुई थी और 28 सितंबर 1962 के एक अन्य सरकारी प्रस्ताव के जरिए इसका पुनर्गठन किया गया। अदालत ने कहा कि ट्रस्ट की शुरुआत किसी स्वतंत्र निजी पहल के रूप में नहीं हुई थी; सरकार ने साहित्य और ज्ञान को उचित कीमत पर उपलब्ध कराने के राष्ट्रीय उद्देश्य से इसकी संरचना तैयार की थी।

चेयरमैन की नियुक्ति से लेकर खातों के ऑडिट तक सरकार की भूमिका

अदालत ने ट्रस्ट के नियमों और प्रशासनिक ढांचे का परीक्षण किया। नियमों के तहत ट्रस्ट के चेयरमैन की नियुक्ति केंद्र सरकार करती है और उनका पद सरकार की इच्छा पर निर्भर रहता है। शिक्षा, वित्त तथा सूचना एवं प्रसारण मंत्रालयों के प्रतिनिधि ट्रस्ट की गवर्निंग बॉडी में शामिल रहते हैं। सरकार को अन्य सदस्यों को नामित करने का अधिकार भी है।

ट्रस्ट की कार्यकारी समिति में भी संबंधित मंत्रालयों के प्रतिनिधियों की भूमिका है। वित्त मंत्रालय का प्रतिनिधि वित्तीय सलाहकार के रूप में काम करता है। अदालत ने वित्तीय मामलों को वित्तीय सलाहकार के समक्ष रखने, वार्षिक रिपोर्ट और ऑडिट किए गए खातों को सरकार को भेजने तथा नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की ओर से खातों के ऑडिट की व्यवस्था को भी महत्वपूर्ण माना। ट्रस्ट के नियमों और उद्देश्यों में निर्धारित बदलावों के लिए सरकार की मंजूरी की आवश्यकता भी फैसले में दर्ज है।

किताबों की बिक्री से होने वाली आय निर्णायक नहीं

नेशनल बुक ट्रस्ट की ओर से दलील दी गई थी कि सरकारी अनुदान उसकी आय का एकमात्र स्रोत नहीं है और पुस्तकों की बिक्री से भी उसे आमदनी होती है। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि वित्तीय सहायता एक महत्वपूर्ण पहलू है, लेकिन किसी संस्था की संवैधानिक स्थिति तय करने के लिए केवल एक स्रोत या एक तथ्य को अलग से नहीं देखा जा सकता। अदालत के अनुसार, अपनी प्रकाशन गतिविधियों से आय अर्जित करना ट्रस्ट पर सरकार के व्यापक प्रशासनिक और वित्तीय नियंत्रण को समाप्त नहीं करता।

पीठ ने कहा कि अनुच्छेद 12 के तहत जांच समग्र आधार पर होती है। किसी संस्था पर केवल सामान्य नियामकीय निगरानी होना उसे ‘राज्य’ बनाने के लिए पर्याप्त नहीं है। लेकिन जब वित्तीय, कार्यात्मक और प्रशासनिक नियंत्रण संस्था-विशेष पर गहरा और व्यापक हो, तब उसे सरकार का साधन या एजेंसी माना जा सकता है। अदालत ने इसी कसौटी पर नेशनल बुक ट्रस्ट की स्थिति का आकलन किया।

अनुच्छेद 12 के तहत ‘राज्य’ होने का मतलब सरकारी विभाग बनना नहीं

फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण भी दिया। ट्रस्ट को अनुच्छेद 12 के तहत ‘राज्य’ मानने का अर्थ यह नहीं है कि वह केंद्र सरकार का विभाग बन जाएगा या उसके सभी कर्मचारी सरकारी कर्मचारी अथवा सिविल सर्वेंट हो जाएंगे। अदालत ने कहा कि इस घोषणा से कर्मचारियों को संविधान के अनुच्छेद 309, 310 और 311 के तहत सरकारी सेवकों को मिलने वाली सुरक्षा स्वतः नहीं मिलती। अनुच्छेद 12 का संबंध संविधान के भाग-3 में दिए गए मौलिक अधिकारों के संदर्भ में संस्था की स्थिति से है।

नेशनल बुक ट्रस्ट का उद्देश्य अच्छी साहित्यिक कृतियों को किफायती कीमत पर उपलब्ध कराना, भारतीय भाषाओं और शास्त्रीय साहित्य को बढ़ावा देना, भारतीय तथा विदेशी पुस्तकों का अनुवाद, ज्ञान का प्रसार, पुस्तक प्रदर्शनियों और संगोष्ठियों का आयोजन करना है। सुप्रीम कोर्ट ने इन गतिविधियों को ट्रस्ट की सरकारी उत्पत्ति और उसके प्रशासनिक ढांचे के साथ मिलाकर देखा। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल सार्वजनिक महत्व का काम करना किसी संस्था को अपने-आप अनुच्छेद 12 के तहत ‘राज्य’ नहीं बना देता; सरकारी नियंत्रण की प्रकृति और व्यापकता भी देखी जाती है।

अंततः सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट की पूर्ण पीठ के निष्कर्ष को सही ठहराया और अपील खारिज कर दी। इस फैसले से यह सिद्धांत फिर स्पष्ट हुआ है कि किसी संस्था की संवैधानिक स्थिति तय करते समय उसके नाम या पंजीकरण के स्वरूप से अधिक महत्व सरकार के वास्तविक और व्यापक नियंत्रण को दिया जाएगा।

मामले का विवरण: The Chairman, National Book Trust, India and Another v. A.R. Abdul Gaffar and Others; Civil Appeal No. 14369 of 2015; 2026 INSC 1202; फैसला 6 नवंबर 2026; पीठ—न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह।

स्रोत: सुप्रीम कोर्ट का 6 नवंबर 2026 का फैसला (2026 INSC 1202); फैसले के पाठ और कानूनी विश्लेषण के लिए LiveLaw, NyayVidhan, Legal Republic और The Daily Bench की रिपोर्टों का मिलान किया गया है।

फीचर इमेज क्रेडिट: सुप्रीम कोर्ट भवन की तस्वीर: Pinakpani, Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0। साइट के लिए तस्वीर का आकार बदला गया है। मूल तस्वीर और लाइसेंस विवरण।

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वरिष्ठ पत्रकार आनंद कुमार करीब 30 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। उन्होंने एम.ए. (इतिहास), बैचलर ऑफ जर्नलिज्म और एमबीए (मार्केटिंग) की शिक्षा प्राप्त की है। 1996 में 'प्रभात खबर', रांची से बतौर प्रशिक्षु पत्रकार करियर की शुरुआत करके 'हिन्दुस्तान' और 'अमर उजाला' जैसे राष्ट्रीय समाचार पत्रों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल चुके आनंद कुमार हिन्दुस्तान, जमशेदपुर के स्थानीय संपादक भी रहे हैं। इसके अलावा The Photon News अखबार सहित Lagatar.in तथा Newswing.com जैसे डिजिटल माध्यमों में संपादक पद का दायित्व संभाल चुके हैं। इसके अलावा आनंद कुमार कॉरपोरेट कम्यूनिकेशन/जनसंपर्क, प्रबंधन, सरकार/प्रशासन और मीडिया शिक्षण का भी गहन अनुभव रखते हैं। उन्होंने सरयू राय - एक नाम कई आयाम' नामक पुस्तक का संपादन भी किया है।
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