मोहन भागवत बोले- सत्ता बदलने से समस्याएं हल नहीं होतीं, समाधान के लिए होने चाहिए आंदोलन

Anand Kumar
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नागपुर: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने आंदोलनों और विरोध प्रदर्शनों को लेकर कहा है कि उनका उद्देश्य सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि समस्याओं का समाधान होना चाहिए। उन्होंने कहा कि समाज में समस्याएं और व्यवस्था में कमियां होना स्वाभाविक है, लेकिन आंदोलनों के जरिए समाधान निकालने का प्रयास किया जाना चाहिए। यदि आंदोलन राजनीतिक लाभ का माध्यम बन जाएं, तो इससे समाज में द्वेष, कड़वाहट और विभाजन बढ़ने का खतरा रहता है।

आरएसएस के विजयादशमी समारोह में अपने संबोधन के दौरान मोहन भागवत ने लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शनों की भूमिका, राष्ट्रीय एकता, वैश्विक राजनीति, युवाओं में नशे की बढ़ती समस्या और विकास की संतुलित दृष्टि जैसे मुद्दों पर अपनी बात रखी।

‘रिजीम चेंज से बुनियादी समस्याओं का समाधान नहीं होता’

मोहन भागवत ने कहा कि शासन बदलने से जरूरी नहीं कि समस्याएं भी समाप्त हो जाएं। उनके मुताबिक, राजनीतिक सत्ता परिवर्तन के जरिए बुनियादी चुनौतियों का समाधान नहीं किया जा सकता। आंदोलनों का उद्देश्य व्यवस्था में मौजूद कमियों को दूर करना और समाज को समाधान की दिशा में आगे बढ़ाना होना चाहिए।

उन्होंने कहा, “अपने इतने बड़े समाज में समस्याएं तो हैं। व्यवस्था की कमियां भी ढेर सारी होंगी। उनके चलते आंदोलनों का होना भी स्वाभाविक ही है। परंतु आंदोलन समाधान देने के लिए होने चाहिए।”

भागवत ने आगाह किया कि यदि विरोध प्रदर्शन जनहित के बजाय राजनीतिक स्वार्थ से प्रेरित हों, तो वे समाज में अलग-अलग समूहों और विचारधाराओं के बीच शत्रुता बढ़ा सकते हैं।

आंदोलन के दौरान सामाजिक एकता का ध्यान रखने की अपील

आरएसएस प्रमुख ने कहा कि विरोध प्रदर्शन के दौरान ऐसे किसी भी आचरण से बचना चाहिए, जिससे समाज में अनबन, द्वेष या विभाजन पैदा हो। उन्होंने राजनीतिक नेताओं, प्रदर्शनकारियों और प्रशासन से जिम्मेदारी के साथ काम करने की अपील की।

उन्होंने जोर दिया कि भावनाएं कितनी भी तीव्र क्यों न हों, संविधान की सीमाओं, सभ्य सार्वजनिक चर्चा और शिष्ट आचरण के मानकों का सम्मान किया जाना चाहिए।

भागवत के मुताबिक, लोकतंत्र में विरोध का अधिकार महत्वपूर्ण है, लेकिन उसका इस्तेमाल समाज को बांटने के बजाय समस्याओं के समाधान के लिए होना चाहिए।

बांग्लादेश, नेपाल और दूसरे देशों की राजनीतिक उथल-पुथल का जिक्र

अपने संबोधन में मोहन भागवत ने बांग्लादेश, नेपाल, फ्रांस और अल्बानिया में हुई राजनीतिक उथल-पुथल का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि कुछ ताकतें अपने हितों के लिए राजनीतिक परिस्थितियों को प्रभावित करने और सत्ता परिवर्तन का रास्ता अपनाती हैं।

उन्होंने आशंका जताई कि वैश्विक स्तर पर कुछ शक्तियां भारत के बढ़ते प्रभाव को सीमित रखना चाहती हैं, क्योंकि एक मजबूत भारत उनके प्रभुत्व को चुनौती दे सकता है।

भागवत ने कहा कि भारत का मजबूत होना ऐसी ताकतों के लिए चुनौती बन सकता है, जो अपने हितों के लिए दूसरे देशों की राजनीतिक परिस्थितियों को प्रभावित करने का प्रयास करती हैं।

ओटीटी प्लेटफॉर्म पर अनुशासन की जरूरत बताई

मोहन भागवत ने डिजिटल माध्यमों और ओटीटी प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध सामग्री को लेकर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी विभिन्न माध्यमों से मिलने वाली जानकारी को कई बार उचित-अनुचित का विवेक किए बिना ग्रहण करती है।

उन्होंने कहा कि इसके दुष्परिणाम सामने आने के बाद कई देशों ने अलग-अलग प्रकार के अनुशासन और प्रतिबंध लागू किए हैं। भारत में भी विशेष रूप से ओटीटी प्लेटफॉर्म को लेकर ऐसी जरूरत महसूस की जा रही है। उन्होंने शासन और प्रशासन से इस विषय पर विचार करने की बात कही।

युवाओं में नशे की लत को बताया गंभीर राष्ट्रीय समस्या

आरएसएस प्रमुख ने युवाओं में नशीले पदार्थों की बढ़ती लत पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि नशे की समस्या से निपटने के लिए शासन-प्रशासन और समाज को समय रहते प्रयास शुरू करने चाहिए।

भागवत ने इस दिशा में परिवार और समाज की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि वर्तमान पीढ़ी के अभिभावकों को युवाओं में सही-गलत का विवेक विकसित करने की जिम्मेदारी निभानी होगी।

विकास के लिए संतुलित दृष्टिकोण जरूरी

मोहन भागवत ने विज्ञान और तकनीक की प्रगति को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि इससे जीवन अधिक सुविधाजनक बन सकता है और ज्ञान तथा तर्क के आधार पर व्यवहार में सुधार किया जा सकता है। हालांकि, उन्होंने आगाह किया कि तकनीक को केवल साधन के रूप में देखा जाना चाहिए।

उनके मुताबिक, यदि विकास का दृष्टिकोण केवल उपभोग और भौतिक सुविधाओं तक सीमित रह जाता है, तो इसके गंभीर नुकसान भी हो सकते हैं।

उन्होंने नेपाल में आई विनाशकारी त्रासदी का उल्लेख करते हुए हिमालयी क्षेत्र में असंतुलित विकास के संभावित दुष्परिणामों की ओर ध्यान दिलाया। उन्होंने कहा कि भारत, तिब्बत, भूटान और चीन से जुड़े व्यापक हिमालयी क्षेत्र में विकास की समग्र और संतुलित दृष्टि अपनाना आवश्यक है।

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वरिष्ठ पत्रकार आनंद कुमार करीब 30 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। उन्होंने एम.ए. (इतिहास), बैचलर ऑफ जर्नलिज्म और एमबीए (मार्केटिंग) की शिक्षा प्राप्त की है। 1996 में 'प्रभात खबर', रांची से बतौर प्रशिक्षु पत्रकार करियर की शुरुआत करके 'हिन्दुस्तान' और 'अमर उजाला' जैसे राष्ट्रीय समाचार पत्रों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल चुके आनंद कुमार हिन्दुस्तान, जमशेदपुर के स्थानीय संपादक भी रहे हैं। इसके अलावा The Photon News अखबार सहित Lagatar.in तथा Newswing.com जैसे डिजिटल माध्यमों में संपादक पद का दायित्व संभाल चुके हैं। इसके अलावा आनंद कुमार कॉरपोरेट कम्यूनिकेशन/जनसंपर्क, प्रबंधन, सरकार/प्रशासन और मीडिया शिक्षण का भी गहन अनुभव रखते हैं। उन्होंने सरयू राय - एक नाम कई आयाम' नामक पुस्तक का संपादन भी किया है।
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