भावुक माहौल में मना झामुमो का 47वां स्थापना दिवस, बोले हेमंत सोरेन—आज बाबा बहुत याद आ रहे हैं
Dumka : झारखंड मुक्ति मोर्चा का 47वां स्थापना दिवस गुरुवार को दुमका में भावुक वातावरण के बीच मनाया गया। यह पहला अवसर था, जब पार्टी का स्थापना दिवस दिशोम गुरु शिबू सोरेन की गैरमौजूदगी में आयोजित हुआ। कार्यक्रम में शामिल मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन मंच से अपने पिता और पार्टी के संस्थापक को याद करते हुए भावुक हो गए। उन्होंने कहा, “आज बाबा बहुत याद आ रहे हैं।”
मुख्यमंत्री ने कहा कि आज झामुमो परिवार स्थापना दिवस पर उपस्थित तो है, लेकिन इतिहास का वह पन्ना भी सामने है, जब जिन दिशोम गुरु ने राह दिखाई, वे आज हमारे बीच नहीं हैं। उन्होंने कहा कि पार्टी को गर्व है कि वह ऐसे वीर सपूतों की विरासत को आगे बढ़ा रही है, जिनके दिखाए मार्ग और विचारों के सहारे आज जनमानस के बीच काम किया जा रहा है।
एकजुटता ही झामुमो की ताकत: मुख्यमंत्री
मुख्यमंत्री ने कहा कि दिशोम गुरु के आशीर्वाद से राज्य के गरीब-गुरबा, आदिवासी-मूलवासी और समाज की आधी आबादी के लिए बड़े पैमाने पर काम हो रहा है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि झारखंड के साथ किसी भी तरह का अन्याय बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
उन्होंने कहा कि विरोधी झामुमो को कमजोर समझते रहे, लेकिन उनकी चालों और षड्यंत्रों को समय रहते ध्वस्त कर दिया गया। अब झारखंड की जनता राजनीतिक चक्रव्यूह और साजिशों को समझने लगी है।

नगर निकाय चुनाव का जिक्र, कार्यकर्ताओं को किया नमन
मुख्यमंत्री ने आने वाले नगर निकाय चुनाव का जिक्र करते हुए कहा कि पूरे राज्य में उत्साह का माहौल है। उन्होंने ठंड में भी मैदान में जुटे बुजुर्गों, माताओं-बहनों और कार्यकर्ताओं को नमन और जोहार किया।
उन्होंने कहा कि कार्यकर्ताओं की एकजुटता ही पार्टी की सबसे बड़ी ताकत है और इस ताकत को कमजोर नहीं होने देने का संकल्प स्थापना दिवस पर लिया जाना चाहिए।
शिक्षा और भविष्य पर जोर
मुख्यमंत्री ने अपील की कि सभी कार्यकर्ता संकल्प लें कि अपने बच्चों को पढ़ाएंगे, लिखाएंगे और काबिल बनाएंगे, ताकि वे राज्य, गांव और समाज का नाम रोशन कर सकें। उन्होंने कहा कि कार्यकर्ताओं के आशीर्वाद से ही सरकार झारखंड के लोगों के लिए काम कर पा रही है।
असम के आदिवासियों की लड़ाई में झारखंड साथ
मुख्यमंत्री ने अपने हालिया असम दौरे का जिक्र करते हुए कहा कि अंग्रेजी शासन के दौरान झारखंड और ओडिशा से आदिवासियों को जबरन असम के चाय बागानों में ले जाया गया था। आज भी वहां रहने वाले आदिवासी अपनी पहचान और अधिकार की लड़ाई लड़ रहे हैं।
उन्होंने सवाल उठाया कि एक ही देश में आदिवासियों की दो तरह की पहचान कैसे हो सकती है, जबकि आदिवासी इस देश के मूलवासी हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि असम में आदिवासियों पर सरकारी स्तर पर यातनाएं दी जा रही हैं। मुख्यमंत्री ने कहा कि झारखंड का आदिवासी समाज उनकी इस लड़ाई में साथ खड़ा है और जरूरत पड़ी तो पूरे झारखंड के आदिवासी असम जाकर समर्थन देंगे।
शहीदों की कुर्बानी भूलना बुरे दिन की शुरुआत
मुख्यमंत्री ने संघर्ष यात्रा के दौरान सरेंगसिया के शहीदों को नमन करने का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि इसी धरती से लोगों के साथ मिलकर सत्ता तक का रास्ता तय हुआ। यह स्थल संघर्ष और आंदोलन की प्रेरणा देता है।
उन्होंने चेतावनी दी कि जिस दिन आंदोलनकारियों और शहीदों की कुर्बानी को भुला दिया गया, उसी दिन बुरे दिनों की शुरुआत हो जाएगी।
कार्यक्रम में राज्य के विभिन्न कोनों से पहुंचे कार्यकर्ताओं और समर्थकों का मुख्यमंत्री ने आभार जताया और कहा कि यही गौरवपूर्ण इतिहास झारखंड मुक्ति मोर्चा की असली ताकत है।