परिमल नाथवानी, क्रॉस वोटिंग और सत्ता के गलियारों का गणित
Special Report : झारखंड में राज्यसभा चुनाव एक बार फिर राष्ट्रीय और क्षेत्रीय राजनीति के केंद्र में है। 18 जून को होने वाले मतदान से पहले राजनीतिक गलियारों में जितनी चर्चा उम्मीदवारों की है, उससे कहीं अधिक चर्चा उन समीकरणों की हो रही है जो अक्सर राज्यसभा चुनावों में अंतिम समय पर तस्वीर बदल देते हैं। इस बार मुकाबले का केंद्र बने हैं उद्योगपति और पूर्व राज्यसभा सांसद परिमल नाथवानी, जिनकी उम्मीदवारी ने एक बार फिर यह बहस तेज कर दी है कि राज्यसभा वास्तव में राज्यों के हितों की रक्षा का मंच है या फिर यह धीरे-धीरे आर्थिक और राजनीतिक प्रभाव रखने वाले लोगों के लिए सत्ता के गलियारों तक पहुंचने का सबसे सुरक्षित रास्ता बन चुकी है।
झारखंड में चुनावी गणित पहली नजर में सत्तारूढ़ गठबंधन के पक्ष में दिखाई देता है। विधानसभा में संख्याबल स्पष्ट रूप से इंडिया गठबंधन के पास है। इसके बावजूद भाजपा समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार परिमल नाथवानी की ओर से जीत का दावा किया जा रहा है। यही दावा राजनीतिक विश्लेषकों को अतीत की ओर देखने के लिए मजबूर कर रहा है, क्योंकि झारखंड का राज्यसभा इतिहास बताता है कि यहां कई बार चुनाव परिणाम गणित से नहीं बल्कि राजनीतिक प्रबंधन, रणनीति और क्रॉस वोटिंग से तय हुए हैं।
राज्यसभा की मूल अवधारणा क्या थी?
भारतीय संसद का उच्च सदन कहे जाने वाले राज्यसभा का गठन केवल राजनीतिक प्रतिनिधित्व के लिए नहीं किया गया था। संविधान निर्माताओं की सोच थी कि लोकसभा जहां जनता की आकांक्षाओं और प्रत्यक्ष जनादेश का प्रतिनिधित्व करेगी, वहीं राज्यसभा राज्यों की आवाज और दीर्घकालिक राष्ट्रीय हितों की संरक्षक बनेगी।
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इसी कारण राज्यसभा में अनुभवी, विशेषज्ञ और विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान देने वाले लोगों की भागीदारी सुनिश्चित करने की व्यवस्था की गई। कला, साहित्य, विज्ञान, समाज सेवा और खेल जैसे क्षेत्रों से जुड़े व्यक्तियों को भी सदन तक पहुंचाने के लिए राष्ट्रपति द्वारा 12 सदस्यों के मनोनयन का प्रावधान रखा गया।
हालांकि समय के साथ इस सदन की प्रकृति में बदलाव आया है। राजनीतिक दलों के लिए राज्यसभा केवल संसदीय प्रक्रिया का हिस्सा नहीं रही, बल्कि वह सत्ता संतुलन, नीति निर्माण और राजनीतिक रणनीति का महत्वपूर्ण केंद्र बन गई। इसी बदलाव के साथ कॉर्पोरेट जगत और प्रभावशाली आर्थिक समूहों की उपस्थिति भी बढ़ती चली गई।
राज्यसभा में बढ़ती संपत्ति का गणित क्या बताता है?
राज्यसभा के स्वरूप में आए परिवर्तन को समझने के लिए सांसदों की घोषित संपत्ति का अध्ययन महत्वपूर्ण माना जाता है। पिछले एक दशक में राज्यसभा सदस्यों की औसत संपत्ति में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। राजनीतिक सुधार और चुनावी पारदर्शिता पर काम करने वाले संगठनों द्वारा जारी आंकड़े बताते हैं कि राज्यसभा में करोड़पति और अरबपति सदस्यों की संख्या लगातार बढ़ी है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह केवल व्यक्तिगत सफलता की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस बदलती राजनीतिक संस्कृति का भी संकेत है जिसमें आर्थिक शक्ति और राजनीतिक पहुंच का रिश्ता पहले की तुलना में कहीं अधिक मजबूत हुआ है। यही वजह है कि राज्यसभा चुनावों को अब केवल राजनीतिक प्रक्रिया के रूप में नहीं देखा जाता, बल्कि उन्हें आर्थिक हितों और राजनीतिक प्रभाव के संगम के रूप में भी समझा जाता है।
2003 का संशोधन और बदल गया पूरा खेल
राज्यसभा चुनावों के इतिहास में वर्ष 2003 को एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जाता है। इससे पहले किसी भी उम्मीदवार को उसी राज्य का मतदाता होना आवश्यक था, जहां से वह राज्यसभा चुनाव लड़ना चाहता था। लेकिन कानून में संशोधन के बाद यह बाध्यता समाप्त कर दी गई।
इस बदलाव के बाद देश का कोई भी पात्र नागरिक किसी भी राज्य से राज्यसभा चुनाव लड़ सकता है। समर्थकों ने इसे राष्ट्रीय एकीकरण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया, लेकिन आलोचकों का तर्क था कि इससे राज्यसभा का स्थानीय चरित्र कमजोर हुआ और बाहरी प्रभावशाली उम्मीदवारों के लिए नए अवसर खुल गए।
झारखंड समेत कई राज्यों में बाद के वर्षों में ऐसे अनेक उदाहरण सामने आए जब स्थानीय राजनीति से सीधे तौर पर न जुड़े व्यक्ति भी राज्यसभा पहुंचने में सफल रहे।
झारखंड में इस बार का राजनीतिक गणित
वर्तमान चुनाव में झामुमो ने बैद्यनाथ राम को उम्मीदवार बनाया है, जबकि कांग्रेस ने दूसरी सीट के लिए प्रणव झा को मैदान में उतारा है। दूसरी तरफ भाजपा समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में परिमल नाथवानी चुनाव लड़ रहे हैं।
अगर विधानसभा के मौजूदा संख्याबल को देखा जाए तो सत्तारूढ़ गठबंधन के पास 56 विधायक हैं। इनमें झामुमो, कांग्रेस, राजद और वाम दल शामिल हैं। दूसरी ओर भाजपा, आजसू, जदयू और लोजपा (आरवी) को मिलाकर एनडीए के पास 24 विधायक हैं। इसके अतिरिक्त जयराम महतो के नेतृत्व वाले झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा का एक विधायक भी विधानसभा में मौजूद है।
सामान्य गणित कहता है कि दोनों सीटों पर इंडिया गठबंधन के उम्मीदवारों की स्थिति मजबूत है। लेकिन राजनीति केवल अंकगणित नहीं होती। यही वजह है कि राजनीतिक हलकों में परिमल नाथवानी की उम्मीदवारी को गंभीरता से लिया जा रहा है।
झारखंड का वह इतिहास जो सत्ता पक्ष को परेशान करता है
झारखंड के राज्यसभा चुनावों का इतिहास कई विवादों और अप्रत्याशित परिणामों से भरा रहा है। राज्य गठन के बाद हुए कई चुनावों में क्रॉस वोटिंग, हॉर्स ट्रेडिंग और धनबल के आरोप राजनीतिक बहस के केंद्र में रहे हैं।
2010: जब सामने आया ‘कैश फॉर वोट’ विवाद
2010 के राज्यसभा चुनाव के दौरान एक स्टिंग ऑपरेशन ने राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी थी। आरोप लगे कि कुछ विधायक विशेष उम्मीदवारों के समर्थन के बदले आर्थिक लाभ की बातचीत कर रहे थे। बाद में जांच एजेंसियों की कार्रवाई और न्यायिक हस्तक्षेप ने इस मामले को और चर्चा में ला दिया।
2012: जब मतदान के दिन मिली करोड़ों की नकदी
मार्च 2012 का चुनाव झारखंड के राजनीतिक इतिहास में सबसे विवादित घटनाओं में शामिल है। मतदान के दिन बड़ी मात्रा में नकदी बरामद होने के बाद पूरे चुनाव पर सवाल खड़े हो गए थे। आरोप लगाया गया कि यह रकम विधायकों को प्रभावित करने के उद्देश्य से लाई जा रही थी। विवाद इतना बढ़ा कि चुनाव प्रक्रिया पर भी असर पड़ा और राष्ट्रीय स्तर पर झारखंड की राजनीति चर्चा में आ गई।
2016 और 2018: रिसॉर्ट राजनीति और क्रॉस वोटिंग
बाद के चुनावों में भी क्रॉस वोटिंग की घटनाएं सामने आईं। कई दलों ने एक-दूसरे पर विधायकों को प्रभावित करने और राजनीतिक दबाव बनाने के आरोप लगाए। चुनाव परिणामों ने यह संकेत दिया कि राज्यसभा चुनावों में अंतिम क्षण तक कुछ भी संभव है।
यही वजह है कि इस बार भी संख्याबल के बावजूद सत्तारूढ़ गठबंधन पूरी तरह निश्चिंत दिखाई नहीं देता।
आखिर कौन हैं परिमल नाथवानी?
परिमल नाथवानी का नाम भारतीय कॉर्पोरेट और राजनीतिक जगत दोनों में जाना-पहचाना है। वे रिलायंस इंडस्ट्रीज में कॉर्पोरेट मामलों से जुड़े महत्वपूर्ण पदों पर कार्य कर चुके हैं और लंबे समय से देश के प्रभावशाली कारोबारी नेटवर्क का हिस्सा रहे हैं।
उनका राजनीतिक सफर भी कम दिलचस्प नहीं रहा। वे पहले झारखंड से राज्यसभा पहुंचे और बाद में आंध्र प्रदेश से भी उच्च सदन का सदस्य बने। राजनीतिक दलों के साथ संवाद क्षमता, कॉर्पोरेट अनुभव और संसदीय कार्यों में सक्रियता ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई।
उद्योगपति राज्यसभा में क्यों रुचि लेते हैं?
यह प्रश्न अक्सर उठता है कि बड़े कारोबारी और उद्योगपति राज्यसभा का रुख क्यों करते हैं। इसके पीछे कई कारण बताए जाते हैं।
पहला कारण प्रतिष्ठा और सार्वजनिक पहचान है। संसद सदस्य का दर्जा किसी भी व्यक्ति की सामाजिक और राजनीतिक स्वीकार्यता को बढ़ाता है।
दूसरा कारण नीति निर्माण की प्रक्रिया के करीब पहुंचना माना जाता है। संसद में मौजूद रहने से विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े मुद्दों को सीधे उठाने का अवसर मिलता है। हालांकि आलोचक इसे कॉर्पोरेट हितों की लॉबिंग से भी जोड़ते हैं।
तीसरा कारण राजनीतिक नेटवर्क का विस्तार है। सांसद बनने के बाद राष्ट्रीय स्तर पर नौकरशाही, नीति निर्माताओं और राजनीतिक नेतृत्व तक सीधी पहुंच बढ़ जाती है, जिससे व्यक्ति का प्रभाव क्षेत्र विस्तृत होता है।
राज्यसभा चुनाव में क्रॉस वोटिंग कैसे होती है?
सामान्य चुनावों के विपरीत राज्यसभा चुनाव गुप्त मतदान से नहीं होते। वर्ष 2003 के बाद राज्यसभा चुनावों में ओपन बैलट प्रणाली लागू की गई।
इस व्यवस्था के तहत राजनीतिक दल अपने अधिकृत एजेंट नियुक्त करते हैं। विधायक मतदान के बाद अपना बैलेट अपनी पार्टी के अधिकृत एजेंट को दिखाते हैं। यदि कोई विधायक ऐसा नहीं करता या किसी अन्य दल के एजेंट को बैलेट दिखाता है तो उसका वोट अमान्य घोषित किया जा सकता है।
लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि एजेंट केवल बैलेट देख सकता है, वोट बदल नहीं सकता। यदि कोई विधायक अपनी पार्टी के एजेंट को बैलेट दिखाकर भी किसी दूसरे उम्मीदवार के पक्ष में मतदान करता है तो वह वोट वैध माना जाता है।
यही कारण है कि क्रॉस वोटिंग को पूरी तरह रोक पाना राजनीतिक दलों के लिए हमेशा चुनौती बना रहता है।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला और क्रॉस वोटिंग की वैधता
कुलदीप नायर बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि राज्यसभा चुनाव में क्रॉस वोटिंग को सीधे दल-बदल कानून के तहत अयोग्यता का आधार नहीं माना जा सकता।
इसका मतलब यह है कि यदि कोई विधायक अपनी पार्टी की आधिकारिक लाइन से अलग मतदान करता है तो पार्टी उसके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई कर सकती है, लेकिन केवल इसी आधार पर उसकी विधानसभा सदस्यता स्वतः समाप्त नहीं होती।
यही कानूनी स्थिति राज्यसभा चुनावों को और अधिक जटिल बनाती है।
क्या इस बार फिर इतिहास खुद को दोहराएगा?
यही वह सवाल है जो झारखंड की राजनीति में सबसे अधिक चर्चा का विषय बना हुआ है। एक तरफ विधानसभा का स्पष्ट गणित है, दूसरी तरफ झारखंड का राजनीतिक इतिहास है जो बार-बार यह साबित करता रहा है कि राज्यसभा चुनावों में अंतिम परिणाम अक्सर शुरुआती अनुमान से अलग निकलते हैं।
परिमल नाथवानी की उम्मीदवारी केवल एक व्यक्ति की चुनावी लड़ाई नहीं है। यह उस बहस का भी हिस्सा है जिसमें राज्यसभा की भूमिका, कॉर्पोरेट प्रभाव, राजनीतिक रणनीति और विधायकों की निष्ठा जैसे सवाल शामिल हैं।
18 जून को मतदान होगा और परिणाम चाहे जो भी आए, इतना तय है कि झारखंड का यह राज्यसभा चुनाव केवल सीटों का मुकाबला नहीं बल्कि राज्य की राजनीतिक संस्कृति, दलों की एकजुटता और सत्ता के भीतर मौजूद वास्तविक समीकरणों की भी परीक्षा साबित होगा।
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