असम चुनाव के बीच झारखंड में भिड़े हैं सत्ता के साथी, बालू पर प्रदीप-संजय तकरार के पीछे की कहानी

Anand Kumar
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प्रदीप संजय

Ranchi : झारखंड की सियासत इन दिनों दो मोर्चों पर एक साथ सक्रिय है। एक तरफ असम का चुनावी मैदान, तो दूसरी तरफ राज्य के भीतर सत्ता के साथियों में खींचतान मची है। एक तरफ मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन समेत सरकार के कई मंत्री असम में झामुमो के चुनाव प्रचार में जुटे थे, वहीं झारखंड में सत्तारूढ़ दलों के बीच आपसी बयानबाजी और आरोप-प्रत्यारोप चल रहे थे।

पहले बयानबाजी की शुरुआत झामुमो से हुई जब पार्टी महासचिव सुप्रियो भट्टाचार्य ने कांग्रेस की तुलना जहर वाले सांप से कर दी। इसके बाद कांग्रेस के प्रभारी के. राजू ने प्रेस कांफ्रेंस बुलाकर सरकार पर निशाना साधा। अफसरों पर माइनिंग माफिया के दबाव में काम करने का आरोप लगाया। शिक्षा व्यवस्था को लचर बता दिया और कानून-व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिये।

ताजा विवाद कांग्रेस विधायक दल के नेता प्रदीप यादव और राजद कोटे से मंत्री संजय प्रसाद यादव के बीच सामने आया है, जहां गोड्डा में अवैध बालू खनन को लेकर सीधी राजनीतिक भिड़ंत देखने को मिली।

बालू खनन से शुरू, सत्ता संतुलन तक पहुंचा विवाद

प्रदीप यादव ने गोड्डा में कथित अवैध बालू खनन को मुद्दा बनाते हुए सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए। हालांकि उनका निशाना अप्रत्यक्ष रूप से राजद कोटे के मंत्री संजय प्रसाद यादव पर था। जवाब में संजय यादव ने खुली चुनौती देते हुए कहा कि इसकी उच्चस्तरीय जांच करा ली जाए। यदि उनका नाम आता है तो वे तत्काल इस्तीफा देने को तैयार हैं।

यह टकराव सिर्फ एक स्थानीय मुद्दा नहीं, बल्कि गठबंधन के भीतर बढ़ती अविश्वास की भावना का संकेत माना जा रहा है।ह

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असम चुनाव के बीच झारखंड में “पावर वैक्यूम”

राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, मुख्यमंत्री और कई मंत्रियों के असम चुनाव में व्यस्त रहने के कारण झारखंड में एक तरह का “पावर वैक्यूम” बना है।
इसी खाली जगह में सहयोगी दल अपने-अपने राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ा रहे हैं
कांग्रेस, जो लंबे समय से दबाव में थी, अब मुखर होकर अपनी ही सरकार पर सवाल उठा रही है

कांग्रेस के प्रदेश नेतृत्व से लेकर विधायक दल तक खनन, शिक्षा और प्रशासन जैसे विभागों पर लगातार हमले हो रहे हैं, जिनका नियंत्रण सीधे मुख्यमंत्री के पास है।

“फुफकार” के पीछे असली कारण: राज्यसभा चुनाव

गठबंधन के भीतर चल रही इस सियासी तल्खी की जड़ें आगामी राज्यसभा चुनाव से जुड़ी मानी जा रही हैं।

गणित क्या कहता है?

  • वर्तमान संख्या बल के आधार पर महागठबंधन के पास दो सीटें जीतने की पूरी क्षमता है
  • कांग्रेस का दावा है कि उसे कम से कम एक सीट मिलनी चाहिए
  • लेकिन संकेत मिल रहे हैं कि झामुमो दोनों सीटों पर अपनी दावेदारी मजबूत रखना चाहता है

यहीं से टकराव की असली शुरुआत होती है

विशेषज्ञों का मानना है कि कांग्रेस की आक्रामकता “नीतिगत विरोध” से ज्यादा “राजनीतिक हिस्सेदारी” से जुड़ी है।

कांग्रेस की आंतरिक स्थिति: कमजोरी और दबाव

झारखंड कांग्रेस इस समय कई स्तरों पर चुनौतियों से जूझ रही है:

  • संगठनात्मक ढांचा अब भी पूरी तरह सक्रिय नहीं
  • विधायकों और मंत्रियों के बीच समन्वय की कमी
  • प्रदेश नेतृत्व और कार्यकर्ताओं के बीच दूरी
  • पिछले राज्यसभा चुनाव में प्रतिनिधित्व नहीं मिलने से असंतोष

ऐसे में पार्टी अपने अस्तित्व और हिस्सेदारी दोनों को लेकर दबाव की राजनीति कर रही है

स्थानीय सियासत का पुराना हिसाब, नए विवाद में दिखी गर्मी

झारखंड की मौजूदा सियासी खींचतान को सिर्फ गठबंधन राजनीति के चश्मे से देखना अधूरा होगा। इसके पीछे स्थानीय स्तर की पुरानी प्रतिद्वंद्विता भी उतनी ही अहम भूमिका निभा रही है। कांग्रेस विधायक दल के नेता प्रदीप यादव और राजद कोटे से मंत्री संजय प्रसाद यादव के बीच का टकराव दरअसल वर्षों पुरानी राजनीतिक प्रतिस्पर्द्धा की अगली कड़ी है।

एक समय ऐसा भी रहा है जब संजय यादव महज विधायक थे और प्रदीप यादव बाबूलाल मरांडी सरकार में मंत्री की भूमिका में थे। उस दौर में भी दोनों नेताओं के बीच वर्चस्व की लड़ाई खुलकर सामने आई थी। समय बदला, राजनीतिक दल बदले, लेकिन दोनों के बीच की दूरी कभी खत्म नहीं हुई।

प्रदीप यादव का राजनीतिक सफर भी इस कहानी का अहम हिस्सा है। भाजपा से अलग होकर झाविमो और फिर कांग्रेस तक पहुंचने वाले प्रदीप यादव ने गोड्डा की राजनीति में अपना प्रभाव बनाए रखा है। लेकिन महागठबंधन की मजबूरियों ने उन्हें उन्हीं नेताओं के साथ खड़ा कर दिया, जिनसे उनकी राजनीतिक टकराहट रही है।

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टिकट से लेकर मंत्री पद तक: अधूरी महत्वाकांक्षा का असर

राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, मौजूदा विवाद की जड़ सिर्फ बालू खनन नहीं, बल्कि “राजनीतिक अवसर” से जुड़ी नाराजगी भी है।

लोकसभा चुनाव के दौरान गोड्डा सीट पर जब पार्टी ने आखिरी समय में दीपिका पांडे सिंह का टिकट काटकर प्रदीप यादव को मौका दिया, तब यह माना गया कि संगठन ने उन्हें प्राथमिकता दी है।
इसी आधार पर यह उम्मीद भी बनी कि विधानसभा के बाद बनने वाले मंत्रिमंडल में उन्हें ओबीसी प्रतिनिधित्व के तौर पर जगह मिलेगी।

लेकिन समीकरण बदले-

  • कांग्रेस कोटे से दीपिका पांडे सिंह मंत्री बनीं
  • राजद कोटे से संजय प्रसाद यादव को जगह मिली

दोनों ही गोड्डा क्षेत्र से आते हैं। ऐसे में प्रदीप यादव खुद को राजनीतिक रूप से “अलग-थलग” महसूस कर रहे हैं। यह धारणा पार्टी के भीतर भी चर्चा का विषय है। प्रदीप यादव कांग्रेस विधायक दल के नेता जरूर हैं लेकिन विधायक ही उनकी नहीं सुनते।

“एक तीर, दो निशाना”: बालू खनन बना सियासी हथियार

गोड्डा में अवैध बालू खनन का मुद्दा उठाकर प्रदीप यादव ने सिर्फ प्रशासनिक सवाल नहीं खड़े किए, बल्कि इसके जरिए दो स्तरों पर दबाव बनाने की कोशिश की:

  1. राजद कोटे के मंत्री संजय यादव को सीधे घेरना
  2. कांग्रेस के भीतर अपनी सक्रियता और प्रासंगिकता दिखाना

यानी यह सिर्फ एक मुद्दा नहीं, बल्कि एक सोची-समझी राजनीतिक चाल भी मानी जा रही है।

पूरे घटनाक्रम से यह साफ है कि झारखंड में महागठबंधन केवल संख्या बल का समीकरण नहीं, बल्कि अलग-अलग राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं का अस्थायी संतुलन है।

जहां ऊपर से एकजुटता दिखती है, वहीं अंदर ही अंदर स्थानीय प्रतिद्वंद्विता और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं लगातार टकरा रही हैं।

और गोड्डा का यह विवाद उसी अंदरूनी सियासत की एक झलक भर है।

बड़ा सवाल: क्या गठबंधन स्थिर रहेगा?

अभी की स्थिति में सरकार के पास संख्या बल मजबूत है, लेकिन राजनीतिक केमिस्ट्री कमजोर होती दिख रही है।

तीन संभावित परिदृश्य:

  1. समझौता मॉडल – राज्यसभा सीटों का बंटवारा कर तनाव खत्म
  2. दोस्ताना संघर्ष – सीटों पर प्रतिस्पर्धा, लेकिन सरकार बरकरार
  3. गंभीर दरार – गठबंधन में अविश्वास और खुला टकराव

“सत्ता से ज्यादा हिस्सेदारी की लड़ाई”

झारखंड की मौजूदा सियासत यह संकेत दे रही है कि यह लड़ाई सरकार बचाने से ज्यादा “राजनीतिक हिस्सेदारी” तय करने की है। असम चुनाव के बीच झारखंड में जो बयानबाजी तेज हुई है, वह आने वाले राज्यसभा चुनाव का ट्रेलर मानी जा रही है।

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वरिष्ठ पत्रकार आनंद कुमार करीब 30 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। उन्होंने एम.ए. (इतिहास), बैचलर ऑफ जर्नलिज्म और एमबीए (मार्केटिंग) की शिक्षा प्राप्त की है। 1996 में 'प्रभात खबर', रांची से बतौर प्रशिक्षु पत्रकार करियर की शुरुआत करके 'हिन्दुस्तान' और 'अमर उजाला' जैसे राष्ट्रीय समाचार पत्रों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल चुके आनंद कुमार हिन्दुस्तान, जमशेदपुर के स्थानीय संपादक भी रहे हैं। इसके अलावा The Photon News अखबार सहित Lagatar.in तथा Newswing.com जैसे डिजिटल माध्यमों में संपादक पद का दायित्व संभाल चुके हैं। इसके अलावा आनंद कुमार कॉरपोरेट कम्यूनिकेशन/जनसंपर्क, प्रबंधन, सरकार/प्रशासन और मीडिया शिक्षण का भी गहन अनुभव रखते हैं। उन्होंने सरयू राय - एक नाम कई आयाम' नामक पुस्तक का संपादन भी किया है।
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