झारखंड में सिलेंडर पर ‘संग्राम’: जब समाधान की जगह मिट्टी का चूल्हा बना सियासी हथियार!

Anand Kumar
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Ranchi : राजनीति में जब तर्क खत्म हो जाते हैं, तो प्रतीक शुरू होते हैं। झारखंड विधानसभा के बजट सत्र में इन दिनों कुछ ऐसा ही नजारा है। राज्य में घरेलू गैस सिलेंडर के लिए मची त्राहि-त्राहि अब केवल जनता की रसोई का मुद्दा नहीं रही, बल्कि सत्ता और विपक्ष के बीच शक्ति प्रदर्शन का अखाड़ा बन गई है।

मंत्री का ‘मिट्टी प्रेम’ या व्यवस्था की लाचारी?

राज्य के खाद्य आपूर्ति सह स्वास्थ्य मंत्री डॉ. इरफान अंसारी का यह कहना कि ‘गैस नहीं मिली तो रिम्स में मरीजों के लिए मिट्टी का चूल्हा बनवाकर खाना बनवाएंगे’, सुनने में भले ही ‘देसी समाधान’ लगे, लेकिन यह एक गहरी प्रशासनिक विफलता की ओर इशारा करता है। 2026 के डिजिटल इंडिया में जब हम धुंआ मुक्त रसोई की बात कर रहे थे, तब एक मंत्री का कोयले और लकड़ी की ओर लौटने की बात करना यह बताता है कि संकट कितना गहरा है।

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बाबूलाल मरांडी का पलटवार: कालाबाजारी बनाम ग्लोबल क्राइसिस

नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने इस मुद्दे पर केंद्र का बचाव करते हुए गेंद वापस राज्य के पाले में डाल दी है। उनका तर्क सीधा है – अगर पश्चिम एशिया में युद्ध के कारण वैश्विक संकट है, तो राज्य सरकार कालाबाजारी रोकने में विफल क्यों है? मरांडी का सवाल वाजिब है: क्या राज्य सरकार के पास खपत और आपूर्ति का सटीक डेटा है, या केवल बयानों से ही चूल्हा जलाने की तैयारी है?

रसोई से रिम्स तक: ठंडी पड़ती व्यवस्था

ग्रामीण विकास मंत्री दीपिका पांडेय सिंह ने जिस तरह से अस्पतालों, होटलों और मंदिरों में प्रसाद बंद होने की बात कही, वह स्थिति की गंभीरता को दर्शाता है। लेकिन विडंबना देखिए, एक तरफ सरकारी महकमा कह रहा है कि ‘किल्लत नहीं है’, वहीं दूसरी ओर गैस गोदामों के बाहर अंधेरे से ही कतारें लग रही हैं।

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संपादकीय टिप्पणी: यह विवाद केवल सिलेंडर का नहीं, बल्कि ‘नैरेटिव’ की लड़ाई है। सत्ता पक्ष इसे केंद्र की नाकामी बताकर 2026 के राजनीतिक समीकरण साध रहा है, तो वहीं विपक्ष इसे राज्य की प्रशासनिक अक्षमता बता रहा है। लेकिन इन सबके बीच पिस रही है वो आम जनता, जिसके लिए न तो ‘ग्लोबल क्राइसिस’ मायने रखता है और न ही ‘मिट्टी के चूल्हे’ का सियासी विकल्प। उसे बस समय पर सिलेंडर चाहिए।


बुनियादी जरूरतों पर ऐसी ‘वैकल्पिक’ राजनीति खतरनाक है। मिट्टी का चूल्हा समाधान नहीं, बल्कि पलायन है। सरकार को कोल इंडिया से कोयला मांगने के बजाय पेट्रोलियम मंत्रालय के साथ बैठकर आपूर्ति बहाल करने पर जोर देना चाहिए।

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वरिष्ठ पत्रकार आनंद कुमार करीब 30 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। उन्होंने एम.ए. (इतिहास), बैचलर ऑफ जर्नलिज्म और एमबीए (मार्केटिंग) की शिक्षा प्राप्त की है। 1996 में 'प्रभात खबर', रांची से बतौर प्रशिक्षु पत्रकार करियर की शुरुआत करके 'हिन्दुस्तान' और 'अमर उजाला' जैसे राष्ट्रीय समाचार पत्रों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल चुके आनंद कुमार हिन्दुस्तान, जमशेदपुर के स्थानीय संपादक भी रहे हैं। इसके अलावा The Photon News अखबार सहित Lagatar.in तथा Newswing.com जैसे डिजिटल माध्यमों में संपादक पद का दायित्व संभाल चुके हैं। इसके अलावा आनंद कुमार कॉरपोरेट कम्यूनिकेशन/जनसंपर्क, प्रबंधन, सरकार/प्रशासन और मीडिया शिक्षण का भी गहन अनुभव रखते हैं। उन्होंने सरयू राय - एक नाम कई आयाम' नामक पुस्तक का संपादन भी किया है।
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