Ranchi : झारखंड में प्रशासनिक कार्यशैली को लेकर एक नया विवाद सामने आया है, जिसमें वरिष्ठ आईएएस अधिकारी राजीव रंजन चर्चा के केंद्र में हैं। आरोप है कि उन्होंने नियमों को दरकिनार करते हुए खुद को महज 24 घंटे के लिए परिवहन आयुक्त घोषित कर लिया और फिर अगले ही दिन उसी आदेश को वापस भी ले लिया। इस पूरे मामले को लेकर सियासत गरमा गई है।
BJP का आरोप: “24 घंटे का आयुक्त” बनना नियमों के खिलाफ
भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता अजय साह ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर इस मामले को गंभीर प्रशासनिक अनियमितता बताया। उनका कहना है कि परिवहन सचिव के पद पर रहते हुए राजीव रंजन ने 10 मार्च को एक कार्यालय आदेश जारी कर परिवहन आयुक्त के सभी अधिकार खुद के पास ले लिए।
इसके बाद 11 मार्च को उन्होंने एक और आदेश जारी कर पहले वाले निर्णय को निरस्त कर दिया। भाजपा का आरोप है कि इस तरह उन्होंने एक दिन के लिए खुद को परिवहन आयुक्त बना लिया, जो न केवल प्रक्रियात्मक रूप से गलत है बल्कि संवैधानिक मर्यादाओं के भी खिलाफ है।
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सुप्रीम कोर्ट निर्देश और गजट अधिसूचना का हवाला
भाजपा ने अपने आरोपों को मजबूत करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों और राज्य सरकार की अधिसूचनाओं का हवाला दिया है।
पार्टी के अनुसार, 2016 में जारी गजट अधिसूचना के तहत दो अहम समितियां गठित की गई थीं—
- राज्य सड़क सुरक्षा परिषद (अध्यक्ष: मुख्यमंत्री)
- कोष प्रबंधन समिति (अध्यक्ष: मुख्य सचिव)
इन समितियों में परिवहन आयुक्त को सदस्य सचिव की भूमिका दी गई है। ऐसे में बिना प्रक्रिया अपनाए खुद को इस पद पर स्थापित करना नियमों का उल्लंघन माना जा रहा है।
“24 घंटे के फैसलों की हो जांच”
भाजपा ने मांग की है कि उस 24 घंटे की अवधि में परिवहन विभाग में लिए गए सभी फैसलों की निष्पक्ष जांच कराई जाए।
अजय साह ने कहा कि इस दौरान पास की गई फाइलों, स्वीकृत और अस्वीकृत प्रस्तावों की गहन समीक्षा जरूरी है, ताकि यह पता चल सके कि कहीं किसी को अनुचित लाभ तो नहीं पहुंचाया गया।
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CM और मुख्य सचिव को क्यों नहीं दी गई जानकारी?
भाजपा ने यह भी सवाल उठाया है कि इतने महत्वपूर्ण आदेश की जानकारी मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव को क्यों नहीं दी गई, जबकि वे संबंधित समितियों के अध्यक्ष हैं।
पार्टी के अनुसार, “24 घंटे के इस फैसले” के पीछे की मंशा स्पष्ट होनी चाहिए और इसे सार्वजनिक किया जाना जरूरी है, ताकि प्रशासनिक जवाबदेही सुनिश्चित की जा सके।