आनंद कुमार
“समरथ को नहीं दोष गोसाईं” – राज्यसभा चुनाव के बाद झारखंड की राजनीति में यही कहावत सबसे अधिक प्रासंगिक दिखाई देती है। चुनाव परिणाम आने के बाद महागठबंधन के भीतर आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हुआ, लेकिन जिस व्यक्ति और जिस दल की भूमिका सबसे अधिक चर्चा में है, उसके खिलाफ कांग्रेस खुलकर कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं दिख रही।
कांग्रेस प्रभारी के. राजू द्वारा यह आरोप लगाए जाने के बाद कि राजद और वाम दलों के विधायकों ने कांग्रेस प्रत्याशी प्रणव झा का साथ नहीं दिया, सहयोगी दलों ने भी पलटवार किया। इसके बाद कांग्रेस ने प्रदेश अध्यक्ष और लगभग एक दर्जन विधायकों के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस कर डैमेज कंट्रोल की कोशिश की। वरिष्ठ मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने यहां तक कहा कि “जो हुआ सो हुआ, हम विष पीने को तैयार हैं।”
सवाल यह है कि कांग्रेस विष पीने को क्यों तैयार है? और आखिर वह किसके खिलाफ बोलने से बच रही है?
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राजनीतिक घटनाक्रमों पर नजर डालें तो राज्यसभा चुनाव की पूरी रणनीति मतदान के दिन नहीं बनी थी। मतदान से पहले मुख्यमंत्री आवास में महागठबंधन विधायकों का मॉक पोल कराया गया। उस दौरान झामुमो उम्मीदवार बैद्यनाथ राम को लगातार 28 वोट मिलते रहे। लेकिन मतदान के दिन उन्हें 30 वोट मिल गए।
यहीं से राजनीतिक गणित बदल गया। यदि झामुमो उम्मीदवार को 30 वोट मिलते हैं तो कांग्रेस उम्मीदवार के लिए जीत का रास्ता बेहद कठिन हो जाता है। इसके बाद सहयोगी दलों के कुछ वोट भी कांग्रेस को मिल जाते तो भी आवश्यक संख्या तक पहुंचना मुश्किल था।
यही कारण है कि कई राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि परिमल नाथवानी की जीत का रास्ता मतदान के दिन नहीं, बल्कि उससे पहले तैयार हो चुका था। परिस्थितियां संकेत देती हैं कि महागठबंधन के भीतर कुछ ऐसी रणनीति बनी, जिसने कांग्रेस उम्मीदवार की संभावनाओं को सीमित कर दिया।
इसके बावजूद कांग्रेस की ओर से मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन या झामुमो के खिलाफ कोई सीधा आरोप नहीं लगाया जा रहा। यही सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश है। कांग्रेस जानती है कि झारखंड में उसकी सरकार में भागीदारी झामुमो के सहयोग पर निर्भर है। ऐसे में वह टकराव का जोखिम लेने की स्थिति में नहीं है।
लेकिन यह रणनीति कांग्रेस के लिए दीर्घकालिक रूप से खतरनाक साबित हो सकती है। देश के कई राज्यों में कांग्रेस पहले ही क्षेत्रीय दलों के सामने अपना राजनीतिक आधार खो चुकी है। ओडिशा में बीजद, पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस, बिहार में राजद और उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के उभार के बाद कांग्रेस लगातार कमजोर हुई है।
विडंबना यह है कि झारखंड उन राज्यों में है जहां कांग्रेस अभी भी अपेक्षाकृत मजबूत स्थिति में है। लेकिन यदि वह लगातार समझौते और समर्पण की राजनीति करती रही तो भविष्य में यहां भी उसकी स्थिति अन्य राज्यों जैसी हो सकती है।
राज्यसभा चुनाव केवल एक सीट का चुनाव नहीं था। इसने महागठबंधन के भीतर शक्ति संतुलन, कांग्रेस की राजनीतिक मजबूरियों और झामुमो की निर्णायक भूमिका को उजागर कर दिया है। आने वाले विधानसभा चुनाव में यह मुद्दा बार-बार उठेगा कि आखिर कांग्रेस अपने सहयोगी दल के सामने इतनी असहाय क्यों दिखाई दी।
राजनीति में कहा जाता है कि समय रहते चेत जाने वाला दल ही भविष्य बचा पाता है। यदि कांग्रेस इस चुनाव से कोई सबक नहीं लेती, तो झारखंड में उसका भविष्य भी उन राज्यों जैसा हो सकता है जहां वह कभी सत्ता में थी और आज हाशिये पर खड़ी है।
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