झारखंड भाजपा : 14 आदिवासी सीटों से 1 तक का सफर, 2029 में क्या भरोसा लौट पाएगा?

Anand Kumar
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आनंद कुमार

रांची : साल 2000 में झारखंड क्षेत्र की 28 आदिवासी विधानसभा सीटों में भाजपा के पास 14 विधायक थे। 2024 में यह संख्या घटकर सिर्फ एक रह गई। लेकिन इसी अवधि में भाजपा का राज्यव्यापी वोट शेयर पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। 2024 में भाजपा को 33.18 प्रतिशत वोट मिले और वह 21 सीटें जीतने में सफल रही। फिर आदिवासी सीटों पर यह भारी गिरावट क्यों आई? 2029 से पहले भाजपा के सामने यही सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल है।

झारखंड भाजपा की मौजूदा राजनीति को समझने के लिए शायद इससे बेहतर आंकड़ा नहीं हो सकता –

2000 — 14 आदिवासी सीटें
2014 — 11 सीटें
2019 — 2 सीटें
2024 — सिर्फ 1 सीट

28 अनुसूचित जनजाति आरक्षित विधानसभा सीटों वाले झारखंड में भाजपा का यह सफर केवल चुनावी आंकड़ों का उतार-चढ़ाव नहीं है। यह उस राजनीतिक आधार में आए बदलाव की कहानी है, जिसने कभी भाजपा को राज्य की आदिवासी राजनीति में एक बड़ी ताकत बनाया था।

2024 में भाजपा को 28 ST सीटों में सिर्फ सरायकेला से जीत मिली और वह सीट भी पूर्व मुख्यमंत्री चंपई सोरेन के भाजपा में आने के बाद मिली। बाकी 27 ST सीटें विपक्षी गठबंधन के खाते में चली गईं।

यही वजह है कि 2029 के लिए भाजपा की रणनीति का सबसे महत्वपूर्ण सवाल सिर्फ यह नहीं है कि वह कुल कितनी विधानसभा सीटें जीतेगी।

सवाल इससे पहले का है—

क्या भाजपा झारखंड की आदिवासी राजनीति में अपना खोया हुआ राजनीतिक आधार वापस बना पाएगी?

2000 से 2024 तक क्या बदला?

झारखंड की पहली विधानसभा 2000 में अस्तित्व में आई, लेकिन उसका गठन उस साल हुए अविभाजित बिहार विधानसभा चुनाव के परिणामों के आधार पर हुआ था। उस समय झारखंड क्षेत्र की 28 ST सीटों में भाजपा ने 14 सीटें जीती थीं।

यानी आधी आदिवासी आरक्षित सीटें भाजपा के पास थीं।

इसके बाद तस्वीर लगातार बदलती गई।

2005 में भाजपा की ST सीटों की संख्या घटकर लगभग आठ रह गई। 2009 में यह संख्या लगभग सात रही। फिर 2014 में भाजपा ने बड़ी वापसी की और 11 ST सीटें जीतीं। इसी चुनाव में भाजपा ने राज्य में 37 विधानसभा सीटें जीतकर सरकार बनाई। ST सीटों पर उसका प्रदर्शन उस दौर में पार्टी की सबसे बड़ी ताकतों में था।

लेकिन 2019 ने तस्वीर पूरी तरह बदल दी।

भाजपा 28 ST सीटों में सिर्फ दो पर जीत दर्ज कर सकी। दूसरी तरफ JMM ने आदिवासी सीटों पर अपनी पकड़ मजबूत की और विपक्षी गठबंधन ने ST सीटों पर भारी बढ़त हासिल की।

2024 में भाजपा की स्थिति और कमजोर हुई।

28 ST सीटों में सिर्फ एक।

और वह भी चंपई सोरेन के कारण।

इसलिए 14 से 1 तक का आंकड़ा भाजपा के लिए केवल एक चुनावी गिरावट नहीं, बल्कि दो दशक में आदिवासी राजनीति के बदलते समीकरण का संकेत है।

क्या भाजपा का पूरा वोट बैंक खत्म हो गया?

यहीं से तस्वीर थोड़ी जटिल हो जाती है।

2024 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने 21 सीटें जीतीं और उसका वोट शेयर 33.18 प्रतिशत रहा। 2019 में भाजपा को करीब 33.37 प्रतिशत वोट मिले थे।

अर्थात दोनों चुनावों के बीच भाजपा के कुल वोट शेयर में बहुत बड़ा बदलाव नहीं आया।

लेकिन सीटें 25 से घटकर 21 हो गईं।

और ST सीटों में पार्टी दो से घटकर एक पर आ गई।

इसका मतलब यह है कि समस्या को सिर्फ “भाजपा का वोट खत्म हो गया” कहकर समझना पर्याप्त नहीं होगा।

असल सवाल है –

भाजपा का वोट कहां है?

किन सामाजिक समूहों में है?

किन क्षेत्रों में है?

और किन सीटों पर वह वोट जीत में बदल नहीं पा रहा है?

यही 2029 की रणनीति का मूल प्रश्न हो सकता है।

लोकसभा और विधानसभा में इतना बड़ा अंतर क्यों?

2024 का लोकसभा चुनाव इस अंतर को और दिलचस्प बनाता है।

झारखंड की 14 लोकसभा सीटों में भाजपा ने आठ सीटें जीतीं। लेकिन राज्य की पांचों ST लोकसभा सीटों पर भाजपा को जीत नहीं मिली।

इससे एक महत्वपूर्ण राजनीतिक सवाल सामने आता है—

क्या झारखंड का मतदाता लोकसभा और विधानसभा चुनाव में अलग-अलग राजनीतिक प्राथमिकताएं तय करता है?

क्या राष्ट्रीय नेतृत्व और स्थानीय नेतृत्व के प्रति मतदाता का आकलन अलग है?

क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राष्ट्रीय लोकप्रियता का असर आदिवासी बहुल विधानसभा क्षेत्रों में उसी तरह नहीं पड़ता, जैसा राज्य के दूसरे हिस्सों में पड़ता है?

या फिर स्थानीय मुद्दे—जमीन, जंगल, रोजगार, विस्थापन, स्थानीय अधिकार और आदिवासी पहचान—विधानसभा चुनाव में अधिक प्रभावी हो जाते हैं?

इन सवालों का कोई एक उत्तर नहीं है। लेकिन 2024 के नतीजे भाजपा के लिए इन्हें गंभीरता से समझने की जरूरत जरूर दिखाते हैं।

भाजपा ने नई शुरुआत उलिहातु से क्यों की?

इसी पृष्ठभूमि में भाजपा की नई झारखंड टीम का गठन महत्वपूर्ण हो जाता है।

सितंबर 2026 में भाजपा ने गजेंद्र सिंह पटेल को झारखंड का प्रभारी बनाया। सौरभ सिंह और निवेदिता सिंह को सह-प्रभारी की जिम्मेदारी दी गई।

और नई टीम के झारखंड दौरे की शुरुआत हुई- उलिहातु से।

बिरसा मुंडा की जन्मभूमि पहुंचकर गजेंद्र पटेल ने उनके वंशजों से मुलाकात की और आदिवासी समाज के बीच संवाद तथा गांवों तक संगठन की पहुंच बढ़ाने की बात कही। उन्होंने आदिवासी समुदायों के अधिकार, सम्मान, विकास और कल्याण को प्राथमिकता देने की बात भी कही।

राजनीतिक संदेश बिल्कुल स्पष्ट है –

भाजपा 2029 से पहले आदिवासी समाज के साथ अपना संवाद फिर से मजबूत करना चाहती है।

लेकिन यहीं एक बड़ा सवाल खड़ा होता है।

क्या उलिहातु जाने भर से भरोसा लौट आएगा?

जवाब न तो सिर्फ हां है और न सिर्फ ना।

क्योंकि राजनीतिक प्रतीक महत्वपूर्ण होते हैं, लेकिन चुनावी राजनीति में प्रतीक तभी प्रभावी होते हैं जब उनके साथ लगातार राजनीतिक संवाद और जमीन पर संगठनात्मक उपस्थिति भी हो।

चुनौती 1 : आदिवासी भरोसा

झारखंड की आदिवासी राजनीति में केवल प्रतीकों की भूमिका नहीं है।

यहां सवाल हैं—

जल, जंगल और जमीन के।

स्थानीय अधिकारों के।

विस्थापन के।

रोजगार के।

PESA के।

वनाधिकार के।

स्थानीय नेतृत्व के।

और आदिवासी पहचान के।

इसलिए भाजपा के सामने चुनौती केवल यह नहीं है कि वह बिरसा मुंडा की विरासत को राजनीतिक रूप से कितना प्रमुखता देती है।

चुनौती यह है कि वह इन मुद्दों पर लगातार राजनीतिक संवाद कैसे स्थापित करती है।

उलिहातु में जाना एक शुरुआत हो सकती है।

लेकिन भरोसा गांवों में बनता है।

चुनौती 2 : क्या भाजपा को नया आदिवासी चेहरा चाहिए?

भाजपा के पास झारखंड में आदिवासी नेताओं की कमी नहीं रही है।

अर्जुन मुंडा से लेकर कई अन्य नेताओं तक पार्टी ने आदिवासी राजनीति में महत्वपूर्ण चेहरे दिए हैं।

लेकिन 2024 के नतीजे एक अलग सवाल खड़ा करते हैं—

क्या भाजपा के पास ऐसा वर्तमान आदिवासी चेहरा है, जिसकी राजनीतिक स्वीकार्यता राज्य के अलग-अलग आदिवासी क्षेत्रों में व्यापक हो?

यहां एक फर्क समझना जरूरी है।

आदिवासी चेहरा होना और आदिवासी समाज में राजनीतिक भरोसा होना—एक ही बात नहीं है।

भाजपा के लिए 2029 की तैयारी में यही अंतर महत्वपूर्ण हो सकता है।

चुनौती 3 : कुड़मी और आदिवासी समीकरण

झारखंड की अगली राजनीति में कुड़मी समाज भी एक महत्वपूर्ण कारक रहेगा।

कुड़मी समाज की ST दर्जे की मांग लंबे समय से राजनीतिक विमर्श में है।

यह भाजपा सहित सभी प्रमुख दलों के सामने एक जटिल सामाजिक-राजनीतिक समीकरण रखता है।

एक तरफ कुड़मी समाज को राजनीतिक रूप से साथ जोड़ने की कोशिश।

दूसरी तरफ आदिवासी समाज की अपनी राजनीतिक और संवैधानिक पहचान।

इसलिए यह सिर्फ आरक्षण का सवाल नहीं है।

यह सवाल है कि 2029 से पहले झारखंड में सामाजिक गठबंधनों की नई संरचना कैसी बनती है।

भाजपा के लिए चुनौती होगी कि वह अलग-अलग सामाजिक समूहों को साथ लाने की कोशिश में आदिवासी राजनीति के भीतर पैदा होने वाली आशंकाओं को कैसे संबोधित करती है।

चुनौती 4 : संगठन और नेतृत्व के बीच तालमेल

भाजपा के सामने एक और चुनौती पार्टी के भीतर की राजनीतिक संरचना है।

झारखंड में पार्टी के पास कई बड़े नेता हैं।

लेकिन 2029 का चुनाव केवल बड़े चेहरों से नहीं लड़ा जाएगा।

सवाल होगा—

क्या पार्टी एक साझा राजनीतिक संदेश दे पाएगी?

क्या राज्य के अलग-अलग क्षेत्रों के नेताओं के बीच समन्वय होगा?

क्या संगठन और जनप्रतिनिधियों के बीच बेहतर तालमेल बनेगा?

और सबसे महत्वपूर्ण—

क्या कार्यकर्ता चुनाव से बहुत पहले गांवों में सक्रिय होंगे?

क्योंकि चुनावी संगठन चुनाव के छह महीने पहले नहीं बनता।

उसे पांच साल तक काम करना पड़ता है।

चुनौती 5 : भाजपा बनाम JMM से आगे बढ़ता मुकाबला

2024 ने एक और संकेत दिया।

झारखंड की राजनीति में नए राजनीतिक प्लेटफॉर्म भी जगह बना रहे हैं।

जयराम महतो के झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा यानी JLKM को 2024 में लगभग 6.12 प्रतिशत वोट मिले और उसने एक विधानसभा सीट जीती।

इसका अर्थ यह नहीं कि उसका पूरा वोट किसी एक बड़े दल से आया।

लेकिन इतना जरूर है कि झारखंड की राजनीति को केवल दो दलों की सीधी लड़ाई मानना अब पर्याप्त नहीं होगा।

जयराम महतो जैसे लोकप्रिय नेता और छोटे लेकिन क्षेत्रीय प्रभाव वाले राजनीतिक प्लेटफॉर्म कई सीटों पर चुनावी समीकरण प्रभावित कर सकते हैं।

इसलिए 2029 का चुनावी गणित सिर्फ BJP बनाम JMM की कहानी नहीं होगा।

भाजपा के सामने सबसे बड़ी ताकत भी मौजूद है

यहां भाजपा की तस्वीर का दूसरा पहलू भी देखना जरूरी है।

2024 में 21 सीटें जीतने के बावजूद भाजपा को 33.18 प्रतिशत वोट मिले।

यानी पार्टी के पास एक बड़ा राज्यव्यापी वोट आधार अभी भी मौजूद है।

इसलिए भाजपा को 2029 में शून्य से शुरुआत नहीं करनी है।

उसके सामने चुनौती अपने मौजूदा वोट आधार को नए सामाजिक और क्षेत्रीय गठबंधनों में बदलने की है।

और उसमें सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होगा –

आदिवासी सीटों पर वापसी।

क्या 2029 में भाजपा का पहला लक्ष्य 41 सीट होना चाहिए?

राजनीतिक रूप से 41 सीट सत्ता की बहुमत सीमा है।

लेकिन भाजपा के लिए 2029 का वास्तविक शुरुआती सवाल शायद इससे पहले का है।

28 ST सीटों में पार्टी कितनी राजनीतिक जमीन वापस हासिल कर पाती है?

क्योंकि 2024 में भाजपा सिर्फ एक ST सीट जीत पाई।

यदि आदिवासी सीटों पर स्थिति नहीं बदलती, तो राज्य में बहुमत के लिए जरूरी संख्या तक पहुंचने का गणित कठिन बना रहेगा।

लेकिन यदि पार्टी ST सीटों में अपनी स्थिति सुधारती है, तो उसका कुल विधानसभा प्रदर्शन भी बदल सकता है।

इसलिए 2029 की भाजपा रणनीति में ST सीटें सिर्फ एक चुनावी श्रेणी नहीं, बल्कि सत्ता के गणित का केंद्रीय हिस्सा हैं।

असली परीक्षा उलिहातु के बाद शुरू होती है

उलिहातु की यात्रा का राजनीतिक संदेश महत्वपूर्ण है।

लेकिन असली परीक्षा उसके बाद है।

क्या भाजपा आदिवासी गांवों में लगातार मौजूद रहेगी?

क्या स्थानीय नेतृत्व को अधिक राजनीतिक भूमिका मिलेगी?

क्या युवाओं और पहली बार वोट देने वाले मतदाताओं के साथ संवाद बढ़ेगा?

क्या जमीन, जंगल, रोजगार और स्थानीय अधिकार जैसे मुद्दों पर पार्टी अपना स्पष्ट राजनीतिक एजेंडा बनाएगी?

क्या कुड़मी और आदिवासी समीकरण के बीच संतुलन कायम करने की कोशिश होगी?

क्या पार्टी के बड़े नेता एक साझा राजनीतिक रणनीति के तहत काम करेंगे?

और सबसे महत्वपूर्ण—

क्या 2024 में मिले करीब 33 प्रतिशत राज्यव्यापी वोट को ज्यादा विधानसभा सीटों में बदला जा सकेगा?

इन सवालों के जवाब 2029 से बहुत पहले तलाशने होंगे।

14 से 1 की कहानी का अगला अध्याय क्या होगा?

2000 में भाजपा के पास झारखंड क्षेत्र की 28 ST सीटों में 14 विधायक थे।

2014 में यह संख्या 11 हुई।

2019 में सिर्फ 2।

और 2024 में केवल 1।

यह गिरावट अपने आप में भाजपा की झारखंड राजनीति के लिए एक बड़ा संकेत है।

लेकिन इसे सिर्फ “आदिवासी वोट भाजपा से चला गया” कहना शायद पूरी तस्वीर नहीं बताता।

क्योंकि भाजपा का कुल वोट शेयर अभी भी लगभग एक-तिहाई है।

असल कहानी यह है कि भाजपा का राज्यव्यापी वोट आधार और आदिवासी सीटों पर उसकी चुनावी सफलता एक-दूसरे के अनुरूप नहीं चल रहे हैं।

यही वह राजनीतिक पहेली है जिसे 2029 से पहले भाजपा को हल करना होगा।

और शायद इसी वजह से नई भाजपा टीम की शुरुआत उलिहातु से हुई है।

लेकिन—

उलिहातु में बिरसा मुंडा को नमन करना एक प्रतीक है।

बिरसा की धरती के मतदाताओं का भरोसा हासिल करना एक लंबी राजनीतिक प्रक्रिया है।

2029 तक भाजपा के पास समय जरूर है।

लेकिन उस समय का इस्तेमाल केवल चुनावी तैयारी में होगा या संगठन, नेतृत्व और आदिवासी समाज के साथ नए राजनीतिक संबंध बनाने में—यही तय करेगा कि 14 से 1 तक पहुंची कहानी आगे किस दिशा में जाती है।

क्योंकि 2029 का असली सवाल केवल यह नहीं है कि भाजपा कितनी सीटें जीतेगी।

असली सवाल है—क्या भाजपा झारखंड की आदिवासी राजनीति में अपना खोया हुआ राजनीतिक आधार फिर से बना पाएगी?

और इसका जवाब उलिहातु की एक तस्वीर नहीं देगी।

इसका जवाब झारखंड के गांव देंगे।

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वरिष्ठ पत्रकार आनंद कुमार करीब 30 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। उन्होंने एम.ए. (इतिहास), बैचलर ऑफ जर्नलिज्म और एमबीए (मार्केटिंग) की शिक्षा प्राप्त की है। 1996 में 'प्रभात खबर', रांची से बतौर प्रशिक्षु पत्रकार करियर की शुरुआत करके 'हिन्दुस्तान' और 'अमर उजाला' जैसे राष्ट्रीय समाचार पत्रों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल चुके आनंद कुमार हिन्दुस्तान, जमशेदपुर के स्थानीय संपादक भी रहे हैं। इसके अलावा The Photon News अखबार सहित Lagatar.in तथा Newswing.com जैसे डिजिटल माध्यमों में संपादक पद का दायित्व संभाल चुके हैं। इसके अलावा आनंद कुमार कॉरपोरेट कम्यूनिकेशन/जनसंपर्क, प्रबंधन, सरकार/प्रशासन और मीडिया शिक्षण का भी गहन अनुभव रखते हैं। उन्होंने सरयू राय - एक नाम कई आयाम' नामक पुस्तक का संपादन भी किया है।
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