कितना चल पायेगा झारखंड BJP का आदिवासी कार्ड

Anand Kumar
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जन-मन विशेष

राजनीति में फैसले दूरदर्शिता से लिए जाते हैं या फिर जमीनी हकीकत से आंखें मूंदकर?

झारखंड भाजपा के हालिया सांगठनिक फेरबदल को देखकर यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है।

2024 के लोकसभा और विधानसभा चुनावों में आदिवासी बहुल सीटों पर भाजपा के प्रदर्शन ने पार्टी के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी कर दी थी। लोकसभा चुनाव में राज्य की पांचों एसटी आरक्षित सीटें भाजपा हार गई। विधानसभा चुनाव में 28 एसटी आरक्षित सीटों में भाजपा सिर्फ एक सीट जीत सकी। 2019 में उसके पास दो सीटें थीं, जबकि 2014 में भाजपा ने 11 एसटी आरक्षित सीटें जीती थीं।

यानी आंकड़े साफ हैं।

आदिवासी राजनीति में भाजपा का वह प्रभाव, जो 2014 में दिखाई देता था, पिछले दो विधानसभा चुनावों में लगातार कमजोर हुआ है।

ऐसे में उम्मीद यही थी कि 2024 के झटके के बाद भाजपा झारखंड की अपनी रणनीति पर गंभीरता से विचार करेगी।

लेकिन अब पार्टी आलाकमान ने जो नया दांव खेला है, उसने राजनीतिक गलियारों में कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

झारखंड में संगठन की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी छत्तीसगढ़ के आदिवासी नेता पवन साय को दी गई है। वहीं मध्य प्रदेश के सांसद और भाजपा के राष्ट्रीय महामंत्री गजेंद्र सिंह पटेल को झारखंड का प्रभारी बनाया गया है।

दोनों नेता अपने-अपने राज्यों में संगठनात्मक अनुभव रखते हैं।

लेकिन सवाल यह नहीं है कि वे कद्दावर नेता हैं या नहीं।

सवाल यह है कि…

क्या झारखंड की आदिवासी राजनीति को समझने के लिए सिर्फ आदिवासी चेहरा होना पर्याप्त है?

और क्या भाजपा ने इस सवाल का जवाब तलाशने की कोशिश की है?

झारखंड में आदिवासी राजनीति ही सत्ता की चाबी है

झारखंड की राजनीति में आदिवासी समाज की भूमिका सिर्फ महत्वपूर्ण नहीं है…

बल्कि कई इलाकों में सत्ता की चाबी इसी समाज के हाथ में है।

राज्य विधानसभा की 81 सीटों में 28 सीटें अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित हैं।

और पिछले चुनावों का आंकड़ा बताता है कि इन 28 सीटों पर भाजपा का प्रदर्शन किस तरह बदला है।

2014 में भाजपा ने 11 सीटें जीती थीं।

2019 में यह संख्या घटकर सिर्फ 2 रह गई।

और 2024 में भाजपा महज एक सीट तक सिमट गई।

इसके उलट 2024 में झामुमो ने 20 और कांग्रेस ने 7 एसटी आरक्षित सीटें जीतीं।

अब जरा लोकसभा का आंकड़ा देखिए।

2024 में झारखंड की पांचों एसटी आरक्षित लोकसभा सीटें भाजपा के हाथ से निकल गईं।

खूंटी…

लोहरदगा…

चाईबासा…

राजमहल…

और दुमका।

इन पांचों सीटों पर भाजपा को हार मिली।

तो क्या यह सिर्फ एक चुनावी संयोग था?

या फिर यह उस बड़े राजनीतिक बदलाव का संकेत है, जिसे भाजपा अब गंभीरता से समझने की कोशिश कर रही है?

और इसी बीच आया पवन साय और गजेंद्र पटेल का दांव

यही वह पृष्ठभूमि है जिसमें पवन साय और गजेंद्र सिंह पटेल की नियुक्ति को देखना चाहिए।

पवन साय लंबे समय तक छत्तीसगढ़ भाजपा के संगठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा चुके हैं और अब उन्हें झारखंड का संगठन महामंत्री बनाया गया है।

गजेंद्र सिंह पटेल मध्य प्रदेश से आते हैं और उन्हें झारखंड का प्रदेश प्रभारी बनाया गया है। भाजपा ने उनके साथ सह-प्रभारियों की भी नियुक्ति की है।

यानी भाजपा ने झारखंड में संगठन की कमान ऐसे चेहरों को दी है, जिनका राजनीतिक अनुभव झारखंड के बाहर का है।

और यहीं से सवाल पैदा होता है।

क्या झारखंड के आदिवासी समाज के बीच भाजपा की खोई हुई जमीन दूसरे राज्यों के नेताओं के सहारे वापस हासिल की जा सकती है?

झारखंड का आदिवासी समाज कोई एक वोट बैंक नहीं

झारखंड को सिर्फ “Tribal State” कह देना आसान है।

लेकिन झारखंड की आदिवासी राजनीति को समझना इतना आसान नहीं है।

यहां संथाल हैं…

मुंडा हैं…

उरांव हैं…

हो हैं…

और इनके अलावा अनेक दूसरी जनजातियां हैं।

हर समाज की अपनी सामाजिक संरचना है।

अपनी भाषा है।

अपनी सांस्कृतिक पहचान है।

अपने त्योहार हैं।

और अपने राजनीतिक नायक हैं।

भारत की जनगणना के आधिकारिक आंकड़े भी झारखंड की जनजातीय संरचना की इस विविधता को अलग-अलग जनजातियों के स्तर पर दर्ज करते हैं।

इसलिए झारखंड की आदिवासी राजनीति को सिर्फ एक “Tribal Vote Bank” मान लेना सबसे बड़ी राजनीतिक भूल हो सकती है।

यहां संथाल की राजनीति और कोल्हान की राजनीति एक जैसी नहीं है।

मुंडा इलाके के मुद्दे अलग हो सकते हैं।

उरांव इलाके के राजनीतिक समीकरण अलग हो सकते हैं।

और हो समाज की अपनी अलग राजनीतिक संवेदनाएं हैं।

ऐसे में सवाल यह है कि दूसरे राज्यों से आए नेता इस जटिल सामाजिक ताने-बाने को कितनी गहराई से समझ पाएंगे?

पवन साय का कंवर समाज और झारखंड का सवाल

पवन साय कंवर समुदाय से आते हैं।

झारखंड की आधिकारिक अनुसूचित जनजाति सूची में कंवर समुदाय शामिल है और जनगणना के आंकड़ों में भी इसे अलग जनजातीय समूह के रूप में दर्ज किया गया है।

लेकिन झारखंड में कंवर समुदाय का सामाजिक आधार संथाल, मुंडा, उरांव या हो जैसी बड़ी जनजातियों के मुकाबले बेहद छोटा है।

यही बात इस नियुक्ति को दिलचस्प बनाती है।

जिस राज्य में आदिवासी राजनीति की धुरी बड़े और क्षेत्रीय रूप से प्रभावशाली जनजातीय समुदाय हैं…

वहां भाजपा ने संगठन की कमान ऐसे नेता को दी है, जिसकी अपनी जनजातीय सामाजिक पृष्ठभूमि झारखंड के मुख्य आदिवासी सामाजिक समीकरण से अलग है।

गजेंद्र पटेल के जरिए भी यही सवाल

गजेंद्र सिंह पटेल भी आदिवासी समाज से आते हैं और भाजपा ने उनकी पहचान को झारखंड में अपने Tribal Outreach के हिस्से के रूप में सामने रखा है।

लेकिन यहां भी वही सवाल है।

झारखंड की आदिवासी राजनीति को क्या सिर्फ “आदिवासी चेहरा” चाहिए?

या फिर उसे चाहिए ऐसा चेहरा जो झारखंड की जमीन, उसके सामाजिक संघर्ष और उसकी जनजातीय विविधता को भीतर से समझता हो?

यही वह सवाल है जिस पर भाजपा को सबसे ज्यादा गंभीरता से विचार करना होगा।

क्योंकि…

झारखंड की आदिवासी राजनीति दिल्ली, रायपुर या भोपाल के राजनीतिक फार्मूले से नहीं चलती।

यहां की राजनीति की अपनी जमीन है।

अपनी स्मृतियां हैं।

अपने संघर्ष हैं।

और अपनी राजनीतिक संवेदनाएं हैं।

2024 की हार के बाद क्या योजना थी?

2024 के झटके के बाद भाजपा में यह चर्चा थी कि झारखंड के अलग-अलग आदिवासी क्षेत्रों में स्थानीय दिग्गज नेताओं को उनकी सामाजिक और क्षेत्रीय पकड़ के हिसाब से आगे किया जाए।

संथाल बहुल इलाके में बाबूलाल मरांडी और चंपाई सोरेन जैसे चेहरे…

मुंडा बहुल इलाकों में अर्जुन मुंडा और दूसरे स्थानीय नेता…

उरांव बहुल क्षेत्रों में समीर उरांव और सुदर्शन भगत…

और कोल्हान में मधु कोड़ा जैसे चेहरों की भूमिका…

यानी रणनीति का आधार था स्थानीय चेहरा और स्थानीय सामाजिक पकड़।

लेकिन राजनीति में रणनीति बनाना जितना आसान है…

उसे जमीन पर उतारना उतना ही मुश्किल।

प्रदेश भाजपा के भीतर की आपसी खींचतान और गुटबाजी ने इस पूरी कवायद को कमजोर कर दिया।

एकजुटता नहीं बन पाई।

स्थानीय नेताओं के बीच समन्वय नहीं बन पाया।

और आखिरकार आलाकमान ने शायद यह रास्ता चुना कि बाहर से ऐसे संगठनात्मक चेहरे लाए जाएं, जो स्थानीय गुटबाजी से ऊपर रहकर संगठन को संचालित कर सकें।

यही वजह है कि पवन साय और गजेंद्र पटेल की नियुक्ति को सिर्फ सामान्य संगठनात्मक फेरबदल मानना राजनीतिक रूप से अधूरा विश्लेषण होगा।

दो कड़वे सवाल

इस फैसले ने भाजपा के सामने दो बेहद महत्वपूर्ण सवाल खड़े कर दिए हैं।

पहला सवाल—क्या भाजपा आलाकमान को अब यह लगने लगा है कि झारखंड के उसके स्थानीय आदिवासी चेहरे अपना राजनीतिक प्रभाव खो चुके हैं?

अगर ऐसा नहीं है…

तो फिर संगठन की इतनी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों के लिए दूसरे राज्यों के नेताओं पर भरोसा क्यों?

और दूसरा सवाल उससे भी बड़ा है—

क्या झारखंड के जटिल और विविध जनजातीय समाज को बाहर से आए नेता उसी गहराई से समझ पाएंगे, जिस गहराई से स्थानीय नेता समझ सकता है?

यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि झारखंड का आदिवासी समाज सिर्फ चुनाव के समय दिखाई देने वाला वोट बैंक नहीं है।

यहां पहचान का सवाल है।

जल-जंगल-जमीन का सवाल है।

भाषा और संस्कृति का सवाल है।

स्थानीय नेतृत्व का सवाल है।

और राजनीतिक सम्मान का सवाल है।

सिर्फ संगठन की सख्ती से नहीं जीता जा सकता आदिवासी भरोसा

भाजपा के सामने चुनौती सिर्फ बूथ मजबूत करने की नहीं है।

सिर्फ कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने की नहीं है।

सिर्फ चुनावी मशीनरी को मजबूत करने की भी नहीं है।

सबसे बड़ी चुनौती है—आदिवासी समाज के बीच खोया हुआ भरोसा वापस हासिल करना।

और भरोसा सिर्फ संगठनात्मक आदेश से वापस नहीं आता।

उसके लिए सामाजिक जुड़ाव चाहिए।

स्थानीय संवाद चाहिए।

स्थानीय नेतृत्व चाहिए।

और यह भरोसा चाहिए कि दिल्ली में बैठकर झारखंड के लिए रणनीति बनाने वाले लोग झारखंड की जमीन को भी समझते हैं।

भाजपा ने OBC के लिए आदित्य साहू को चुना, Tribal के लिए बाहर का नेतृत्व क्यों?

झारखंड भाजपा ने ओबीसी मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए आदित्य साहू को प्रदेश अध्यक्ष बनाया है।

लेकिन आदिवासी वोट बैंक को वापस पाने के लिए पार्टी ने जो नया दांव खेला है, उसमें संगठन की सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां बाहर से आए आदिवासी चेहरों को दी गई हैं।

यही विरोधाभास राजनीतिक चर्चा का विषय बना हुआ है।

कागज पर यह रणनीति बेहद अनुशासित दिखाई दे सकती है।

लेकिन झारखंड की जमीन पर राजनीति सिर्फ कागज के समीकरणों से नहीं चलती।

यहां सामाजिक समीकरण चलते हैं।

और सामाजिक समीकरणों की अपनी स्मृति होती है।

क्या यह मास्टरस्ट्रोक है या राजनीतिक जोखिम?

भाजपा के रणनीतिकार निश्चित रूप से इस फैसले के पीछे कोई ठोस गणित देखकर ही आगे बढ़े होंगे।

लेकिन राजनीति में हर रणनीति का असली परीक्षण जमीन पर होता है।

पवन साय और गजेंद्र पटेल के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वे झारखंड भाजपा को सिर्फ संगठनात्मक रूप से नहीं…

बल्कि राजनीतिक और सामाजिक रूप से भी आदिवासी समाज के बीच फिर से स्थापित कर पाते हैं या नहीं।

2024 ने भाजपा को एक स्पष्ट संदेश दिया है।

लोकसभा में पांचों एसटी सीटें गईं।

विधानसभा में 28 एसटी सीटों में सिर्फ एक सीट मिली।

और 2014 से 2024 के बीच भाजपा का ग्राफ 11 से घटकर 1 तक पहुंच गया।

अब भाजपा ने इस गिरावट को रोकने के लिए नया प्रयोग किया है।

लेकिन सवाल यह है कि क्या रणनीति बदली है… या सिर्फ रणनीति बनाने वाले चेहरे बदले हैं?

2029 के लोकसभा और विधानसभा चुनाव अभी दूर हैं।

इसलिए अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि यह प्रयोग सफल होगा या असफल।

लेकिन एक बात साफ है…

झारखंड भाजपा के सामने अब सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती आदिवासी समाज के बीच अपनी खोई हुई जमीन वापस हासिल करना है।

और इस लड़ाई में सिर्फ संगठन की ताकत काफी नहीं होगी।

स्थानीय समझ भी चाहिए।

स्थानीय नेतृत्व भी चाहिए।

और सबसे बढ़कर…

आदिवासी समाज के भीतर फिर से भरोसा पैदा करना होगा।

पवन साय और गजेंद्र पटेल की नियुक्ति इसी कोशिश का हिस्सा है।

लेकिन क्या यह कोशिश भाजपा को उस पुराने मुकाम तक वापस ले जाएगी, जहां वह 2014 में खड़ी थी?

या फिर यह प्रयोग झारखंड की जटिल जनजातीय राजनीति को समझने में एक और चूक साबित होगा?

इसका जवाब 2029 देगा।

लेकिन भाजपा के लिए घड़ी अभी से चल चुकी है।

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वरिष्ठ पत्रकार आनंद कुमार करीब 30 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। उन्होंने एम.ए. (इतिहास), बैचलर ऑफ जर्नलिज्म और एमबीए (मार्केटिंग) की शिक्षा प्राप्त की है। 1996 में 'प्रभात खबर', रांची से बतौर प्रशिक्षु पत्रकार करियर की शुरुआत करके 'हिन्दुस्तान' और 'अमर उजाला' जैसे राष्ट्रीय समाचार पत्रों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल चुके आनंद कुमार हिन्दुस्तान, जमशेदपुर के स्थानीय संपादक भी रहे हैं। इसके अलावा The Photon News अखबार सहित Lagatar.in तथा Newswing.com जैसे डिजिटल माध्यमों में संपादक पद का दायित्व संभाल चुके हैं। इसके अलावा आनंद कुमार कॉरपोरेट कम्यूनिकेशन/जनसंपर्क, प्रबंधन, सरकार/प्रशासन और मीडिया शिक्षण का भी गहन अनुभव रखते हैं। उन्होंने सरयू राय - एक नाम कई आयाम' नामक पुस्तक का संपादन भी किया है।
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