Jan-Man Analysis : एक कहावत अक्सर सुनाई देती है कि राजनीति में समय का पहिया देर से सही, लेकिन घूमता जरूर है। और जब यह घूमता है, तो पुराने हिसाब भी नए अंदाज में चुकता होते हैं।
झारखंड और असम की राजनीति में इन दिनों जो घटनाक्रम सामने आ रहा है, उसे इसी नजरिए से देखा जा रहा है।
कुछ ही महीने पहले झारखंड विधानसभा चुनाव के दौरान असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने राज्य की राजनीति में आक्रामक भूमिका निभाई थी। भाजपा के सह-प्रभारी के तौर पर उन्होंने झारखंड में लंबे समय तक डेरा डाला, लगातार सभाएं कीं और हेमंत सोरेन सरकार को सत्ता से हटाने के लिए पूरी ताकत झोंक दी।
उनके भाषणों का केंद्रीय मुद्दा था—बांग्लादेशी घुसपैठ, आदिवासी अस्मिता और सुरक्षा का सवाल।
सरमा ने आरोप लगाया था कि झारखंड सरकार घुसपैठियों को संरक्षण दे रही है, जिससे राज्य की आदिवासी पहचान खतरे में पड़ रही है।
यह सिर्फ भाषणों तक सीमित नहीं रहा। झारखंड मुक्ति मोर्चा के मजबूत नेताओं—चंपई सोरेन और लोबिन हेंब्रम—को भाजपा में शामिल कराने की रणनीति भी इसी राजनीतिक अभियान का हिस्सा मानी गई।
लेकिन चुनाव परिणामों ने पूरी तस्वीर बदल दी।
हेमंत सोरेन न केवल सत्ता में लौटे, बल्कि पहले से भी अधिक मजबूत जनादेश के साथ लौटे। भाजपा की पूरी रणनीति, और हिमंता बिस्वा सरमा का आक्रामक अभियान—दोनों अपेक्षित परिणाम नहीं दे सके।
यहीं से एक नया राजनीतिक अध्याय शुरू होता दिख रहा है।
असम में हेमंत की एंट्री: प्रतीकात्मक दौरा या रणनीतिक चाल?
अब नजर असम पर है।
असम विधानसभा का कार्यकाल मई में समाप्त हो रहा है और राज्य में चुनावी माहौल बनने लगा है। इसी बीच झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का असम दौरा राजनीतिक हलकों में नई चर्चा का कारण बन गया है।
कुछ ही दिनों के भीतर सोरेन दो बार असम पहुंचे। बिस्वनाथ जिले के मिजिका चाय बागान में आयोजित रैली में उन्होंने खुलकर अपनी राजनीतिक मौजूदगी दर्ज कराई।
इस रैली में एक नया गठबंधन सामने आया—झारखंड मुक्ति मोर्चा और असम की जय भारत पार्टी का गठबंधन।
जय भारत पार्टी के अध्यक्ष तेहारू गौर ने मंच से घोषणा की कि दोनों दल मिलकर असम विधानसभा चुनाव लड़ेंगे।
पहली नजर में यह गठबंधन असामान्य लग सकता है। लेकिन जब इसके पीछे का राजनीतिक गणित देखा जाए, तो यह कहीं अधिक दिलचस्प हो जाता है।
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40 सीटों का फॉर्मूला: चाय बागान और आदिवासी राजनीति
गठबंधन की रणनीति के मुताबिक JMM और जय भारत पार्टी असम की 126 विधानसभा सीटों में से लगभग 40 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं।
ये सीटें सामान्य राजनीतिक क्षेत्र नहीं हैं।
ये वे इलाके हैं जहां चाय बागान के श्रमिक और आदिवासी समुदाय निर्णायक भूमिका निभाते हैं।
असम की राजनीति में चाय बागान श्रमिकों का वोट बैंक ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण रहा है।
यह वर्ग लंबे समय तक कांग्रेस के साथ रहा, लेकिन पिछले एक दशक में भाजपा ने इस क्षेत्र में मजबूत पैठ बनाई है।
यहीं हेमंत सोरेन की रणनीति दिखाई देती है।
वे चाय बागान के आदिवासी समुदाय को सीधे आर्थिक अधिकार, सामाजिक सम्मान और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के सवाल से जोड़ रहे हैं।
‘झारखंड मॉडल’ का राजनीतिक संदेश
रैली में हेमंत सोरेन ने भाजपा के राजनीतिक नैरेटिव पर सीधा हमला किया।
उन्होंने कहा कि भाजपा को यह भ्रम है कि राजनीति सिर्फ वही समझती है। अब समय बदल चुका है। दलित और आदिवासी समाज न केवल राजनीति को समझता है बल्कि सत्ता की दिशा बदलने की ताकत भी रखता है।
सोरेन ने असम के आदिवासियों को झारखंड के राजनीतिक संघर्ष की याद दिलाई और संकेत दिया कि अधिकार की लड़ाई केवल सड़कों पर नहीं, बल्कि वैचारिक और कानूनी स्तर पर भी लड़ी जा सकती है।
यह संदेश केवल भाषण नहीं था—यह एक राजनीतिक फ्रेमवर्क तैयार करने की कोशिश भी थी।
चाय उद्योग और आदिवासी अस्मिता
हेमंत सोरेन ने असम की अर्थव्यवस्था के सबसे संवेदनशील बिंदु—चाय उद्योग—को सीधे आदिवासी अस्मिता से जोड़ दिया।
उन्होंने कहा कि असम और भारत का चाय उद्योग आदिवासी श्रमिकों के खून-पसीने पर खड़ा है। यदि आदिवासी समुदाय ने अपना सहयोग वापस ले लिया, तो पूरा उद्योग संकट में आ सकता है।
इसके साथ ही उन्होंने असम के चाय बागान समुदाय को अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा दिलाने का वादा भी किया।
यह मांग दशकों से चली आ रही है और असम की राजनीति में बार-बार उठती रही है।
क्या यह भाजपा के खिलाफ हमला है… या विपक्ष की राजनीति में नई उलझन?
यहां से राजनीतिक विश्लेषण का दूसरा पहलू शुरू होता है।
पहली नजर में यह पूरा अभियान भाजपा और हिमंता बिस्वा सरमा के खिलाफ एक राजनीतिक चुनौती जैसा दिखता है।
लेकिन कुछ राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि तस्वीर इससे अधिक जटिल हो सकती है।
यदि JMM और उसके सहयोगी उन क्षेत्रों में चुनाव लड़ते हैं जहां कांग्रेस और विपक्षी दलों का पारंपरिक आधार है, तो इसका असर भाजपा पर कम और विपक्षी वोट बैंक पर ज्यादा पड़ सकता है।
असम की राजनीति में मुस्लिम और आदिवासी वोट कई सीटों पर निर्णायक भूमिका निभाते हैं।
ऐसे में यदि इन वोटों का बंटवारा होता है, तो इससे भाजपा को अप्रत्यक्ष लाभ मिल सकता है।
असम से झारखंड तक जुड़ी राजनीतिक कड़ी
इस पूरे घटनाक्रम को केवल असम की राजनीति से जोड़कर देखना भी अधूरा विश्लेषण होगा।
झारखंड में जल्द ही राज्यसभा की सीटों के लिए चुनाव होने हैं।
राजनीतिक हलकों में यह चर्चा है कि असम में JMM की सक्रियता कहीं न कहीं कांग्रेस पर दबाव बनाने की रणनीति भी हो सकती है।
यदि JMM यह संकेत देता है कि वह राष्ट्रीय स्तर पर स्वतंत्र राजनीतिक रास्ता चुन सकता है, तो कांग्रेस पर झारखंड में उसके साथ समन्वय बनाए रखने का दबाव बढ़ सकता है।
कांग्रेस की चिंता क्यों बढ़ी?
हेमंत सोरेन के असम दौरे के तुरंत बाद असम कांग्रेस के अध्यक्ष गौरव गोगोई का रांची पहुंचना भी राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बना।
कांग्रेस चाहती है कि जिस तरह झारखंड में उसका JMM के साथ गठबंधन है, वैसा ही सहयोग असम में भी बना रहे।
लेकिन संकेत यह हैं कि हेमंत सोरेन फिलहाल इस रिश्ते को झारखंड तक सीमित रखना चाहते हैं।
यदि असम में JMM स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ता है, तो इससे कांग्रेस की चुनावी रणनीति प्रभावित हो सकती है।
असली सवाल: रणनीति, प्रयोग या दबाव की राजनीति?
अब सबसे बड़ा सवाल यही है—
क्या हेमंत सोरेन असम में वास्तव में एक नई राजनीतिक जमीन तलाश रहे हैं?
या यह केवल एक रणनीतिक दबाव की राजनीति है, जिसका लक्ष्य झारखंड की सत्ता संतुलन और राष्ट्रीय गठबंधन की राजनीति को प्रभावित करना है?
राजनीति में अक्सर दिखाई देने वाली चाल ही असली चाल नहीं होती।
असम विधानसभा का कार्यकाल 20 मई को समाप्त हो रहा है और जल्द ही चुनाव कार्यक्रम घोषित हो सकता है।
तब यह साफ होगा कि हेमंत सोरेन का यह अभियान वास्तव में राजनीतिक विस्तार है, रणनीतिक प्रयोग है या फिर बहुस्तरीय दबाव की राजनीति।
लेकिन इतना तय है कि झारखंड से असम तक फैली इस सियासी बिसात ने उत्तर-पूर्व की राजनीति में एक नया समीकरण जरूर खड़ा कर दिया है।
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