किसी ने शपथ से पहले जान गंवाई, किसी ने इस्तीफा देकर मौका छोड़ा : झारखंड की राजनीति की सबसे दर्दनाक कहानियां

Anand Kumar
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आनंद कुमार 

ये कहानी झारखंड के उन अभागे विधायकों की है जो चुनाव तो जीते, लेकिन किसी ने त्याग किया और किसी ने बलिदान दिया। एक तो चुनाव जीतने के बाद भी विधायक नहीं बन सके, क्योंकि सदस्यता की शपथ लेने के पहले ही उनकी हत्या हो गयी। एक ने अलग झारखंड के सवाल पर इस्तीफा दे दिया और दूसरे ने इसलिए हंसते-हंसते पद छोड़ दिया क्योंकि एक मुख्यमंत्री को उसी सीट से विधायक बनना था।

इस्तीफा देनेवाले दोनों विधायक फिर कभी विधानसभा नहीं पहुंच सके। लेकिन एक ऐसा भी था, जिसे त्याग करने का ईनाम मिला। उसने मुख्यमंत्री की पत्नी के लिए विधायकी छोड़ी और बदले में पार्टी ने उसे सांसद बना दिया। आइये जानते हैं झारखंड की राजनीति की सबसे दर्दनाक कहानियों को।

चुनाव जीत कर भी विधायक नहीं बन पाये मंजरूल

12 नवंबर 1927 को झारखंड के चितरपुर जैसे छोटे कस्बे में जन्मे मंजरूल हसन ख़ान ज़मींदार परिवार से थे, लेकिन उनका दिल हमेशा ग़रीबों और मज़लूमों के लिए धड़कता था। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से पढ़ाई के दौरान वे कम्युनिस्ट विचारधारा से जुड़े और अन्याय के खिलाफ आवाज़ बुलंद करने लगे। यही आवाज़ उन्हें 1947 में बलराज साहनी और अनवर अजीन जैसे नामचीन साथियों के साथ विश्वविद्यालय से निष्कासन तक ले आई।

कोलकाता में उन्होंने दलितों और ग़रीबों के लिए सड़क से लेकर विधानसभा तक संघर्ष किया। जब 1967 में अकाल पड़ा, तो वे सिर्फ़ नेता नहीं, बल्कि “गरीबों का सहारा” बन गये। अपने खेत की उपज तक वे राहगीरों और ज़रूरतमंदों में बांट देते, भले ही इसके लिए अपने पिता की डांट सुननी पड़ी। यही नहीं, उन्होंने सस्ती रोटी की दुकानें खुलवाकर भूख से लड़ती भीड़ को उम्मीद दी। मंजरूल ने महाजनी प्रथा और सूदखोरी के ख़िलाफ़ जंग छेड़ी। इस लड़ाई में उन्हें जेल, कुर्की और आरोपों का सामना करना पड़ा। लेकिन उनका हौसला कभी टूटा नहीं।

1972 में जब वे रामगढ़ से भारी मतों से जीतकर विधानसभा पहुंचे, तो पूरे इलाके में जश्न मनाया गया। लोग मान बैठे थे कि अब उनका सच्चा प्रतिनिधि उनकी तक़दीर बदलेगा। लेकिन किस्मत ने साथ नहीं दिया।

19 मार्च 1972 की रात, शपथ ग्रहण से एक दिन पहले, पटना के विधायक निवास में गोलियों ने उस आवाज़ को हमेशा के लिए खामोश कर दिया। उस वक़्त वे सिर्फ़ विधायक नहीं, बल्कि जनता की उम्मीद बन चुके थे। चितरपुर में जब उनका पार्थिव शरीर पहुंचा, तो पूरा इलाका रो पड़ा। जनाज़े में उमड़ी भीड़ गवाही दे रही थी कि यह शख़्स सिर्फ़ खून का बेटा नहीं था, बल्कि जनता का अपना बेटा था। बाद में उनकी पत्नी सईदुन निशा उपचुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचीं, लेकिन मंजरूल की शहादत ने उनके परिवार को राजनीति से हमेशा के लिए दूर कर दिया।

सूर्य सिंह बेसरा के त्याग को नहीं मिला सिला

झारखंड आंदोलन के लंबे इतिहास में छात्र राजनीति से निकले संगठनों ने अहम भूमिका निभाई। 22 जून 1986 को सूर्य सिंह बेसरा के नेतृत्व में झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन (आजसू) का गठन हुआ। इस संगठन ने 1989 में 72 घंटे का झारखंड बंद कराकर आंदोलन को नई धार और राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई।

आजसू के आह्वान पर हुए इस आंदोलन की गूंज दिल्ली तक पहुंची। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के कार्यकाल में पहली बार केंद्र सरकार और आजसू नेताओं के बीच वार्ता हुई। इसी दौर में आजसू ने “झारखंड नहीं तो चुनाव नहीं” का नारा दिया और 1989 के लोकसभा चुनाव का बहिष्कार किया।

हालांकि, आगे की रणनीति में बदलाव करते हुए चुनावी राजनीति में भागीदारी का निर्णय लिया गया। 1990 के बिहार और उड़ीसा विधानसभा चुनाव में आजसू ने प्रत्याशी खड़े किये। उड़ीसा से खेलाराम माहली और सुदामचरण मरांडी विधायक बने, जबकि बिहार की घाटशिला सीट से सूर्य सिंह बेसरा ने जीत दर्ज की। इसी बीच केंद्र सरकार ने झारखंड विषयक समिति का गठन किया और अलग राज्य की मांग पर चर्चा आगे बढ़ी।

बिहार में लालू प्रसाद यादव की सरकार बनने के बाद झामुमो ने भी केंद्र की राजनीति में सहयोग किया। इसी दौरान लालू प्रसाद ने झामुमो के समर्थन से “झारखंड क्षेत्र विकास परिषद” की घोषणा की। विधानसभा में इस परिषद का विरोध करते हुए सूर्य सिंह बेसरा ने अलग राज्य की मांग को ही समाधान बताया।

विवाद उस समय और गहरा गया, जब लालू प्रसाद यादव और सूर्य सिंह बेसरा के बीच सार्वजनिक रूप से तीखी बहस हुई। 12 अगस्त 1991 को सूर्य सिंह बेसरा ने बिहार विधानसभा से इस्तीफा देकर आंदोलन को नया मोड़ दिया। इसे झारखंड राज्य निर्माण की दिशा में महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जाता है। लेकिन उस इस्तीफे के बाद सूर्य सिंह बेसरा कई दलों से चुनाव लड़े लेकिन दोबारा कभी विधायक नहीं बन सके।  

खरसावां सीट से मंगल सिंह सोय का इस्तीफा

राजनीति में कई बार ऐसे क्षण आते हैं, जब किसी नेता को व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा और वफादारी दोनों के बीच किसी एक को चुनना होता है। यही कहानी है मंगल सिंह सोय की, जिन्होंने 2010  में तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा के चुनाव लड़ने के लिए इस्तीफा देकर अपनी जीती हुई खरसावां सीट छोड़ दी थी।

साल 2009 के लोकसभा चुनाव में अर्जुन मुंडा जमशेदपुर लोकसभा सीट से भाजपा के टिकट पर सांसद बने थे। उस समय वे खरसावां से विधायक भी थे। सांसद बनने के बाद उन्होंने विधायकी से इस्तीफा दे दिया। सीट खाली रह गयी, क्योंकि विधानसभा चुनाव में एक साल से कम समय बचा था। विधानसभा का चुनाव आया,तो अर्जुन मुंडा के करीबी मंगल सिंह सोय को बीजेपी ने टिकट दिया और वे चुनाव जीत कर विधानसभा पहुंचे।

गुरुजी के नेतृत्व में जेमएमएम, बीजेपी और आजसू की गठबंधन सरकार बनी। गुरुजी लोकसभा के सदस्य थे और लोकसभा में बजट पर भाजपा के एक कटौती प्रस्ताव पर उन्होंने मनमोहन सिंह सरकार के समर्थन में मतदान कर दिया। भाजपा भड़क गयी और शिबू सोरेन की सरकार से समर्थन वापस ले लिया। झारखंड में राष्ट्रपति शासन लग गया।

तीन-चार महीने बाद फिर से सरकार बनाने की कवायद शुरू हुई। तय हुआ कि मुख्यमंत्री भाजपा का होगा। लोकसभा के सदस्य रहे अर्जुन मुंडा को मुख्यमंत्री बनाया गया। उन्हें छह महीने के अंदर विधानसभा की सदस्यता लेनी थी। इसलिए अर्जुन मुंडा के प्रति वफादारी दिखाते हुए मंगल सिंह सोय ने खुद इस्तीफ़ा देकर खरसावां की सीट अर्जुन मुंडा के लिए खाली कर दी। यह बात अलग है कि सोय दोबारा विधायक नहीं बन सके। उन्हें भाजपा ने टिकट ही नहीं दिया।

गांडेय से इस्तीफा देकर फायदे में रहे सरफराज

झारखंड की राजनीति में दिसंबर 2023 का महीना एक बड़े मोड़ लेकर आया। गांडेय विधानसभा सीट के विधायक, डॉ. सरफराज अहमद ने वह कदम उठाया जिसने पूरे राजनीतिक माहौल को हिला दिया। इस्तीफा! यह सिर्फ एक शब्द नहीं था, बल्कि एक बड़ा राजनीतिक संकेत था।

जब उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दिया, तो कई तरह की अटकलें लगने लगीं। कई लोग सोचने लगे – आखिरकार क्यों छोड़ दिया उन्होंने इस सीट को? सरफराज ने खुद कहा कि यह उनका निजी फैसला है, लेकिन अंदरखाने की राजनीति कुछ और ही कहानी कह रही थी। दरअसल, यह इस्तीफा एक रणनीतिक चाल थी, ताकि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की पत्नी कल्पना सोरेन इस सुरक्षित मानी जाने वाली गांडेय सीट से चुनाव लड़ सकें। कल्पना सोरेन ने उपचुनाव जीता और पहली बार विधायक बनीं।

इस जीत के साथ ही उनका राजनीतिक सफर एक नए मुकाम पर पहुंचा। सरफराज अहमद का यह त्याग पार्टी हित में एक बड़े त्याग के रूप में देखा गया। इसके बदले में जेएमएम ने उन्हें 2024 में राज्यसभा का टिकट दिया।

तो इस तरह से देखें तो सूर्य सिंह बेसरा और मंगल सिंह सिंह सोय अभागे साबित हुए, जिन्हें इस्तीफा देने के बाद कभी दोबारा विधानसभा का मुंह देखने का मौका नहीं मिला। तो सरफराज अहमद ऐसे विधायक बने जिन्हें विधानसभा की मेंबरी छोड़ने के एवज में सांसद बनाया गया।  

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वरिष्ठ पत्रकार आनंद कुमार करीब 30 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। उन्होंने एम.ए. (इतिहास), बैचलर ऑफ जर्नलिज्म और एमबीए (मार्केटिंग) की शिक्षा प्राप्त की है। 1996 में 'प्रभात खबर', रांची से बतौर प्रशिक्षु पत्रकार करियर की शुरुआत करके 'हिन्दुस्तान' और 'अमर उजाला' जैसे राष्ट्रीय समाचार पत्रों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल चुके आनंद कुमार हिन्दुस्तान, जमशेदपुर के स्थानीय संपादक भी रहे हैं। इसके अलावा The Photon News अखबार सहित Lagatar.in तथा Newswing.com जैसे डिजिटल माध्यमों में संपादक पद का दायित्व संभाल चुके हैं। इसके अलावा आनंद कुमार कॉरपोरेट कम्यूनिकेशन/जनसंपर्क, प्रबंधन, सरकार/प्रशासन और मीडिया शिक्षण का भी गहन अनुभव रखते हैं। उन्होंने सरयू राय - एक नाम कई आयाम' नामक पुस्तक का संपादन भी किया है।
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