ANAND KUMAR
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन इस समय दावोस में हैं। वे वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (World Economic Forum) की बैठकों में हिस्सा ले रहे हैं। देशी-विदेशी कंपनियों से निवेश पर बातचीत हो रही है, समझौते किए जा रहे हैं और झारखंड की एक सकारात्मक, मजबूत छवि वैश्विक मंच पर प्रस्तुत की जा रही है।
लेकिन इसी बीच झारखंड में जो घटनाएं घट रही हैं, वे एक गंभीर सवाल खड़ा कर रही हैं—
दावोस जाकर निवेश बुलाने का क्या अर्थ है, जब राज्य के भीतर ही कंपनियों को सुरक्षित और स्थिर माहौल नहीं मिल पा रहा?
यह सवाल अनुमान या किसी पूर्वाग्रह के आधार पर नहीं, बल्कि ठोस घटनाओं की पृष्ठभूमि में उठ रहा है। बीते महज एक सप्ताह में कम से कम चार ऐसी घटनाएं सामने आई हैं, जिन्होंने निवेशकों के भरोसे और राज्य की औद्योगिक छवि पर गहरा प्रश्नचिह्न लगा दिया है। हालात ऐसे बनते दिख रहे हैं कि उद्योगों को भगाने में अपराधी ही नहीं, बल्कि राजनीतिक नेतृत्व और स्थानीय विरोध भी बड़ी भूमिका निभा रहे हैं।
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पहला मामला: बड़कागांव में एनटीपीसी-अदाणी के खिलाफ खुला टकराव
हजारीबाग के बड़कागांव में कांग्रेस नेता और पूर्व मंत्री योगेंद्र साव एनटीपीसी और अदाणी के खिलाफ आंदोलन चला रहे हैं। रोज़ गाली-गलौज, धक्का-मुक्की और सरकारी अधिकारियों के साथ बदसलूकी की घटनाएं सामने आ रही हैं।
कुछ दिन पहले योगेंद्र साव ने एनटीपीसी की कोल ट्रांसपोर्टिंग सड़क पर दीवार बनाकर कुर्सी लगा दी और रास्ता जाम कर दिया। वजह बताई गई, 30 साल पुरानी फैक्ट्री के ध्वस्त होने और जमीन के मुआवजे के बदले एक करोड़ रुपये प्रति एकड़ की मांग। बाद में पुलिस ने हस्तक्षेप कर उन्हें हटाया और अवैध निर्माण तोड़ा, लेकिन यह दृश्य निवेशकों के लिए बेहद नकारात्मक संदेश छोड़ गया।
दूसरा मामला: जमशेदपुर में उद्योगपति के बेटे का अपहरण
14 जनवरी को जमशेदपुर के प्रसिद्ध उद्योगपति देवांग गांधी के 24 वर्षीय बेटे कैरव गांधी का अपहरण कर लिया गया। घटना को एक सप्ताह से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन अब तक उसका कोई ठोस सुराग नहीं मिला है।
अपहरणकर्ताओं ने व्हाट्सएप के जरिए 5 करोड़ रुपये की फिरौती मांगी है। पुलिस ने एसआईटी गठित कर झारखंड, बिहार और ओडिशा में छापेमारी शुरू की है, लेकिन नतीजा शून्य है। व्यापारी संगठनों में आक्रोश और डर दोनों है।
तीसरा मामला: जनसुनवाई में हथियारों के साथ उत्पात
20 जनवरी को हजारीबाग के बड़कागांव प्रखंड स्थित गोंदुलपारा में अदाणी की खनन परियोजना को लेकर प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा जनसुनवाई आयोजित की गई थी। इस दौरान बड़ी संख्या में लोग पारंपरिक हथियार लहराते हुए कार्यक्रम स्थल में घुस आए और जमकर तोड़फोड़ की। यह सब पुलिस की मौजूदगी में हुआ, लेकिन प्रशासन मूकदर्शक बना रहा। निवेश प्रक्रिया से जुड़े ऐसे दृश्य किसी भी कंपनी के लिए गंभीर चेतावनी होते हैं।
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चौथा मामला: लातेहार में कंपनी कर्मियों को बंधक बनाना
20 जनवरी को ही लातेहार जिले के बालूमाथ थाना क्षेत्र अंतर्गत भैंसादोन गांव में एलएलसी कंपनी के अधिकारी और कर्मचारी पहुंचे, जिन्हें ग्रामीणों ने बंधक बना लिया। करीब दो घंटे बाद पुलिस के हस्तक्षेप से कंपनी के लोग सुरक्षित बाहर निकल सके। ग्रामीणों का कहना था कि यदि बिना अनुमति के दोबारा कंपनी के लोग गांव में आए, तो वे इसे बर्दाश्त नहीं करेंगे। उल्लेखनीय है कि एएससी कंपनी को यहां कोयला खनन के लिए भारत सरकार से अनुमति मिली है, लेकिन जमीन देने को लेकर स्थानीय विरोध बना हुआ है।
अपराधी गिरोह भी निवेशकों के लिए बड़ा खतरा
स्थिति यहीं तक सीमित नहीं है। झारखंड में संगठित अपराधी गिरोह भी उद्योगों और ट्रांसपोर्टरों को निशाना बना रहे हैं।
- 28 सितंबर 2025: धनबाद में बीसीसीएल के मुनीडीह एरिया में काम कर रही इंदू आउटसोर्सिंग कंपनी के एसोसिएट वाइस प्रेसिडेंट गोपाल रेड्डी को गोली मारी गई।
- 7 मार्च 2025: रांची के पॉश इलाके में पैनएम कंपनी के मालिक और कोयला ट्रांसपोर्टर बिपिन मिश्रा को दिनदहाड़े गोली मारी गई।
- 8 मार्च 2025: हजारीबाग में एनटीपीसी के डीजीएम कुमार गौरव की हत्या।
- इससे पहले 2023-24 के दौरान रांची, धनबाद, रामगढ़ और लातेहार में कई कोयला कारोबारियों और कंपनी अधिकारियों पर जानलेवा हमले हुए।
अमन साहू, अमन श्रीवास्तव, विकास तिवारी, सुजीत सिन्हा और प्रिंस खान जैसे गिरोह अलग-अलग जिलों में सक्रिय रहे हैं। भले ही माओवादी गतिविधियां कमजोर पड़ी हों, लेकिन पीएलएफआई, जेजेएमपी और टीएसपीसी जैसे आपराधिक-नक्सली गुट अब भी खनन क्षेत्रों में उगाही कर रहे हैं।
उद्योग विरोधी माहौल और अधूरे एमओयू
पूरे झारखंड में “जान देंगे, जमीन नहीं देंगे” जैसे नारे आम हो चुके हैं। कई बार राजनीतिक स्वार्थ के चलते उद्योगों के खिलाफ नफरत का माहौल तैयार किया गया।
यह भी सच है कि कुछ मामलों में कंपनियों की अपनी गलतियां रही हैं, झूठे वादे कर रैयतों से धोखा किया गया है। लेकिन पिछले 25 वर्षों में अलग-अलग सरकारों द्वारा किए गए हजारों करोड़ रुपये के एमओयू अगर जमीन पर उतरते, तो आज झारखंड की तस्वीर अलग होती।
आर्सेलर मित्तल, वेदांता, जिंदल, भूषण, जेएसडब्ल्यू, टाटा स्टील का एक्सटेंशन प्रोजेक्ट, आधुनिक और अभिजीत ग्रुप जैसे नाम कागज़ों तक सिमटकर रह गए। अदाणी का गोड्डा पावर प्लांट जरूर लगा, लेकिन उसे खड़ा करने में आई बाधाएं और विरोध- जिनमें राजनीतिक विरोध भी शामिल है, किसी से छिपे नहीं हैं।
निवेश नहीं, छवि सबसे बड़ी चुनौती
हेमंत सोरेन की मंशा पर संदेह नहीं किया जा सकता। वे राज्य को देश के अग्रणी राज्यों की श्रेणी में खड़ा करने को आतुर दिखते हैं। प्रयास भी कर रहे हैं कि झारखंड से पलायन रुके। यहां के आदिवासी-मूलवासी सम्मान से सिर उठाकर चलें। जीवन स्तर बेहतर हो। लेकिन उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती निवेश लाने की नहीं, बल्कि राज्य की छवि सुधारने की है।
एक ऐसा झारखंड बनाना जरूरी है, जहां उद्योग भयमुक्त होकर काम कर सकें, सरकारी दफ्तरों में कागज़ों के लिए भटकना न पड़े, रास्तों को रोका न जाये, जनसुनवाई हिंसा का मंच न बने और किसी कारोबारी को यह डर न हो कि अगला फोन रंगदारी का होगा या अगली गोली उसका सीना छलनी कर देगी ।
यदि यह माहौल नहीं बनता, तो हेमंत का दावोस जाना हो या रघुवर का हाथी उडा़ना, इन्वेस्टर समित बुलाना और इंडोनेशिया-थाईलैंड जाना। कुछ काम नहीं आयेगा। दूर देश में बैठी कंपनियां और निवेशक एक क्लिक में जमीनी हकीकत जान लेंगे।
और अगर छवि सुधरी, माहौल बना, तो निवेश खुद चलकर दरवाजे पर आएगा। तब टाटा स्टील के टीवी नरेंद्रन को जमशेदपुर से चलकर दावोस नहीं जाना पडेगा, रांची में ही एमओयू हो जायेगा।
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