धारा 3C को लेकर देशभर में बवाल, शीर्ष अदालत ने कहा- नए सिरे से रेगुलेशन बनें, तब तक लागू नहीं होंगे नियम
New Delhi : सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी के नए इक्विटी नियमों पर रोक लगा दी है। अदालत ने कहा कि प्रथम दृष्टया इन नियमों की भाषा में स्पष्टता नहीं है और इनके दुरुपयोग की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि नियमों की दोबारा समीक्षा की जाए और इसके लिए एक समिति गठित की जाए। तब तक इन नियमों के संचालन पर रोक रहेगी।
धारा 3C को लेकर PIL, संवैधानिक अधिकारों के उल्लंघन का आरोप
यूजीसी के नए इक्विटी नियमों को लेकर देशभर में विरोध देखा जा रहा है। इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दायर की गई है, जिसमें नियमों की धारा 3C को चुनौती दी गई है। याचिका में कहा गया है कि यह प्रावधान जातिगत भेदभाव को बढ़ावा देता है और संविधान के अनुच्छेद 14 व 19 का उल्लंघन करता है। साथ ही सामान्य वर्ग के छात्रों के अधिकारों के हनन पर भी गंभीर चिंता जताई गई है।
केंद्र से जवाब तलब, समिति गठन का निर्देश
गुरुवार को न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अगुवाई वाली सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने UGC प्रमोशन ऑफ इक्विटी रेगुलेशन 2026 को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई की। सुनवाई के बाद कोर्ट ने केंद्र सरकार से जवाब तलब करते हुए सॉलिसिटर जनरल (SG) से कहा कि वे इस मामले में उत्तर दें और विशेषज्ञों की एक समिति गठित करने पर विचार करें।
‘नियमों की भाषा अस्पष्ट, दुरुपयोग संभव’
मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी की,“प्रथम दृष्टया हम कह सकते हैं कि विनियमन की भाषा अस्पष्ट है। विशेषज्ञों को इसकी भाषा संशोधित करने के लिए जांच करने की आवश्यकता है, ताकि इसका दुरुपयोग न हो।”
2012 बनाम 2026 रेगुलेशन पर बहस
वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने अदालत को बताया कि 2019 से एक याचिका लंबित है, जिसमें 2012 के विनियमों को चुनौती दी गई थी, जिन्हें अब 2026 के विनियमों द्वारा प्रतिस्थापित कर दिया गया है। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि 2012 के विनियमों की जांच करते समय अदालत इससे अधिक पीछे नहीं जा सकती।
समानता बनाम भेदभाव का सवाल
न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि अनुच्छेद 15(4) राज्यों को अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए विशेष कानून बनाने का अधिकार देता है, लेकिन सवाल यह है कि प्रगतिशील कानून में प्रतिगामी रुख क्यों अपनाया जाए।उन्होंने आगे कहा कि उन्हें उम्मीद है कि भारत अमेरिका जैसे उस दौर की ओर नहीं जाएगा, जहां अश्वेत और श्वेत छात्रों के लिए अलग-अलग स्कूल हुआ करते थे। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि ठीक ऐसी ही स्थिति का फायदा उठाया जा सकता है।
सामान्य वर्ग के छात्रों को लेकर चिंता
सुनवाई के दौरान एक वकील ने कहा कि यदि कोई छात्र सामान्य वर्ग से है और किसी कॉलेज में रैगिंग या भेदभाव का शिकार होता है, तो उसके लिए कोई प्रभावी उपचार उपलब्ध नहीं है। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने आश्चर्य जताते हुए पूछा कि क्या सामान्य वर्ग को कवर नहीं किया गया है। वकील ने जवाब दिया- “बिलकुल नहीं।”
अनुच्छेद 14 और 19 के उल्लंघन का आरोप
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने कहा कि नियमों की धारा 3C में जाति आधारित भेदभाव किया गया है, जो संविधान के अनुच्छेद 14 और 19 के खिलाफ है। उन्होंने दलील दी कि शिक्षा के क्षेत्र में इस तरह का भेदभाव समाज में खाई को और गहरा करेगा।इस पर मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि अदालत समानता के अधिकार के संदर्भ में यह परख रही है कि क्या ये नियम संवैधानिक कसौटी पर खरे उतरते हैं या नहीं।