आनंद कुमार
- पहले समझिए मौजूदा स्थिति
- असली खाली जगह कहां बनी है?
- क्या सोमेश सोरेन को अब मिलेगा मौका?
- मंगल कालिंदी क्यों महत्वपूर्ण हो जाते हैं?
- और यहीं से उमाकांत रजक की एंट्री होती है
- श्वेता शर्मा के सामने सहानुभूति का सबसे बड़ा कार्ड
- सबसे बड़ा नाम—कल्पना सोरेन
- क्या हेमंत सोरेन दोनों पद भरेंगे भी?
- पांच नाम, लेकिन पांच अलग राजनीतिक संदेश
- असली फैसला कुर्सियों का नहीं, प्राथमिकता का है
सुदिव्य कुमार सोनू के निधन के बाद झारखंड की हेमंत सोरेन सरकार में दो मंत्री पद खाली हैं। पहली नजर में यह सामान्य कैबिनेट विस्तार का मामला दिखाई देता है, लेकिन इसके पीछे का राजनीतिक गणित इससे कहीं ज्यादा जटिल है।
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के सामने सवाल सिर्फ यह नहीं है कि इन दो खाली कुर्सियों पर कौन बैठेगा। असली सवाल यह है कि क्या वे केवल क्षेत्रीय और सामाजिक संतुलन साधेंगे, गिरिडीह के संभावित उपचुनाव को ध्यान में रखेंगे या सरकार के भीतर अपना राजनीतिक बोझ बांटने के लिए किसी बेहद भरोसेमंद चेहरे को आगे बढ़ाएंगे?
मेरी नजर में इस दौड़ में पांच नाम सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हैं—कल्पना सोरेन, श्वेता शर्मा, सोमेश सोरेन, मंगल कालिंदी और उमाकांत रजक।
लेकिन इन पांच नामों का दावा एक जैसा नहीं है। हर नाम के पीछे अलग राजनीतिक गणित है।
पहले समझिए मौजूदा स्थिति
हेमंत सोरेन ने 2024 में सरकार बनाई तो मुख्यमंत्री समेत मंत्रिपरिषद में कुल 12 सदस्य थे। संथाल परगना से खुद हेमंत सोरेन और हफीजुल हसन मंत्री बने, जबकि रवींद्रनाथ महतो विधानसभा अध्यक्ष हैं।
संथाल परगना की 18 विधानसभा सीटों में 11 विधायक झामुमो के हैं। कांग्रेस के भी चार मंत्रियों में से दो—दीपिका पांडेय सिंह और इरफान अंसारी—इसी क्षेत्र से आते हैं।
इस लिहाज से संथाल परगना को पहले ही सरकार में मजबूत प्रतिनिधित्व मिला हुआ है। विधानसभा अध्यक्ष रवींद्रनाथ महतो और कांग्रेस विधायक दल के नेता प्रदीप यादव भी इसी क्षेत्र से आते हैं।
यानी अगर सिर्फ क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व देखा जाए तो संथाल से नया मंत्री बनाए जाने की संभावना फिलहाल कमजोर दिखाई देती है।
असली खाली जगह कहां बनी है?
सुदिव्य कुमार सोनू उत्तरी छोटानागपुर से आते थे और उनके पास एक नहीं, बल्कि चार महत्वपूर्ण विभाग थे—उच्च एवं तकनीकी शिक्षा, नगर विकास एवं आवास, पर्यटन तथा खेलकूद एवं युवा कार्य और कला-संस्कृति।
उनके निधन से सिर्फ एक मंत्री की कुर्सी खाली नहीं हुई है, बल्कि सरकार के भीतर कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां भी फिर से बांटने का सवाल खड़ा हुआ है।
दूसरी खाली जगह कोल्हान में बनी थी। रामदास सोरेन के निधन के बाद उनके बेटे सोमेश सोरेन विधायक बने, लेकिन उन्हें मंत्री नहीं बनाया गया और उनका विभाग मुख्यमंत्री ने अपने पास रख लिया।
यहीं से वर्तमान राजनीतिक पहेली शुरू होती है।
क्या सोमेश सोरेन को अब मिलेगा मौका?
रामदास सोरेन के निधन के बाद सबसे स्वाभाविक राजनीतिक अपेक्षा यही थी कि उनके बेटे सोमेश सोरेन को मंत्री बनाया जाएगा। अतीत में हाजी हुसैन अंसारी के निधन के बाद उनके बेटे हफीजुल हसन और जगरनाथ महतो के निधन के बाद उनकी पत्नी बेबी देवी को मंत्री बनाया जा चुका है।
लेकिन रामदास सोरेन के मामले में ऐसा नहीं हुआ। सोमेश सोरेन को उपचुनाव से पहले मंत्री पद नहीं मिला।
अब सवाल है—क्या हेमंत सोरेन ने उस फैसले को स्थगित किया था या विकल्प खुला रखा था?
अगर कोल्हान में आदिवासी प्रतिनिधित्व को मजबूत करने की जरूरत महसूस हुई तो सोमेश सोरेन का नाम सबसे पहले सामने आ सकता है।
लेकिन यहां भी एक पेच है।
कोल्हान में पहले से ही झामुमो के मजबूत आदिवासी चेहरे सरकार में हैं। पश्चिमी सिंहभूम से दीपक बिरुवा मंत्री हैं। ऐसे में हेमंत सोरेन के लिए कोल्हान से दूसरा मंत्री बनाना राजनीतिक रूप से अनिवार्य नहीं है।
मंगल कालिंदी क्यों महत्वपूर्ण हो जाते हैं?
पूर्वी सिंहभूम से मंगल कालिंदी का नाम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वे अनुसूचित जाति समुदाय से आते हैं।
झारखंड की राजनीति में दलित प्रतिनिधित्व हमेशा एक महत्वपूर्ण सवाल रहा है। अगर हेमंत सोरेन क्षेत्रीय समीकरण से थोड़ा आगे जाकर सामाजिक प्रतिनिधित्व का नया संतुलन बनाना चाहें तो मंगल कालिंदी एक विकल्प हो सकते हैं।
लेकिन यहां फिर क्षेत्रीय गणित आड़े आता है।
झामुमो की ताकत का बड़ा हिस्सा संथाल और कोल्हान से आता है। पार्टी के 34 विधायकों में 11 संथाल परगना और 10 कोल्हान से हैं। यानी करीब 62 फीसदी विधायक इन दोनों क्षेत्रों से आते हैं।
इसलिए यह भी संभव है कि हेमंत सोरेन कोल्हान में नया मंत्री बनाने की बजाय उत्तरी छोटानागपुर पर राजनीतिक फोकस बढ़ाएं।
और यहीं से उमाकांत रजक की एंट्री होती है
उत्तरी छोटानागपुर में झामुमो के पास पहले से सीमित संख्या में विधायक हैं। इस क्षेत्र की 25 विधानसभा सीटों में पार्टी के पांच विधायक हैं—उमाकांत रजक, कल्पना सोरेन, सुदिव्य कुमार सोनू, योगेंद्र प्रसाद और मथुरा प्रसाद महतो।
उमाकांत रजक इस लिहाज से दिलचस्प विकल्प हैं।
वे अनुभवी हैं, पहले मंत्री रह चुके हैं और उत्तरी छोटानागपुर की राजनीति में उनकी अपनी पहचान है। 2024 में झामुमो में आने के बाद वे पार्टी के लिए इस इलाके में एक महत्वपूर्ण चेहरा बन सकते हैं।
हालांकि उनकी सबसे बड़ी कमजोरी यही है कि वे पार्टी में अपेक्षाकृत नए हैं। मुख्यमंत्री और पार्टी नेतृत्व का पूरा भरोसा हासिल करना किसी भी नए नेता के लिए समय लेता है।
लेकिन अगर हेमंत सोरेन का लक्ष्य उत्तरी छोटानागपुर में झामुमो को मजबूत करना है, तो उमाकांत रजक का नाम अचानक महत्वपूर्ण हो सकता है।
श्वेता शर्मा के सामने सहानुभूति का सबसे बड़ा कार्ड
अब आते हैं सबसे संवेदनशील विकल्प पर—सुदिव्य कुमार सोनू की पत्नी श्वेता शर्मा।
अगर हेमंत सोरेन गिरिडीह सीट को लेकर गंभीर रणनीति बनाते हैं, तो श्वेता शर्मा सबसे महत्वपूर्ण विकल्प बन सकती हैं।
2024 के विधानसभा चुनाव में सुदिव्य कुमार सोनू केवल 3,838 वोटों से जीते थे। वह भी ऐसे चुनाव में जब झामुमो के पक्ष में हेमंत सोरेन की लहर, कल्पना सोरेन की सक्रियता और मंइयां योजना जैसे कई कारक काम कर रहे थे।
यही वह बिंदु है जहां गिरिडीह का संभावित उपचुनाव पूरी कहानी बदल सकता है।
अगर श्वेता शर्मा को मंत्री बनाकर उपचुनाव में उतारा जाता है तो पार्टी के पास स्वाभाविक सहानुभूति वोट का राजनीतिक लाभ लेने का मौका होगा।
लेकिन यह तभी होगा जब हेमंत सोरेन इस रास्ते को चुनते हैं।
सबसे बड़ा नाम—कल्पना सोरेन
और अब उस नाम पर आते हैं जो इस पूरे समीकरण को सबसे ज्यादा बदल सकता है—कल्पना सोरेन।
कल्पना सोरेन को केवल एक क्षेत्र या समुदाय के प्रतिनिधि के रूप में देखना शायद इस राजनीतिक समीकरण को छोटा करके देखना होगा।
सवाल यह है कि सुदिव्य कुमार सोनू की जगह क्या हेमंत सोरेन को केवल एक मंत्री चाहिए?
या उन्हें सरकार और विधानसभा के भीतर ऐसा राजनीतिक सहयोगी चाहिए जो उनके साथ लगातार खड़ा रह सके?
सुदिव्य के पास कई महत्वपूर्ण विभाग थे और वे मुख्यमंत्री के भरोसेमंद राजनीतिक सहयोगियों में गिने जाते थे। उनके निधन के बाद मुख्यमंत्री पर सरकार और सदन से जुड़ी अतिरिक्त जिम्मेदारियां आना स्वाभाविक है।
ऐसे में कल्पना सोरेन का विकल्प अलग दिखाई देता है।
उनके पास चुनावी राजनीति का अनुभव है, विधानसभा में सक्रिय भूमिका है और पार्टी के भीतर उनकी राजनीतिक स्वीकार्यता लगातार बढ़ी है।
अगर हेमंत सोरेन केवल जातीय और क्षेत्रीय संतुलन देखेंगे तो शायद दूसरे नाम आगे निकल सकते हैं।
लेकिन अगर वे सरकार का राजनीतिक बोझ बांटने वाला सबसे भरोसेमंद चेहरा तलाश रहे हैं, तो कल्पना सोरेन का दावा सबसे मजबूत दिखाई देता है।
क्या हेमंत सोरेन दोनों पद भरेंगे भी?
इस पूरी कहानी का एक और महत्वपूर्ण पहलू है, जिस पर अभी ज्यादा चर्चा नहीं हो रही।
यह जरूरी नहीं कि हेमंत सोरेन दोनों खाली पद तुरंत भरें।
रामदास सोरेन के निधन के बाद भी सरकार ने 11 मंत्रियों के साथ काम किया था। इसलिए यह संभावना भी पूरी तरह खारिज नहीं की जा सकती कि मुख्यमंत्री सीमित मंत्रिपरिषद के साथ आगे बढ़ें और कुछ समय तक एक या दोनों पद खाली रखें।
ऐसी स्थिति में यह सिर्फ कैबिनेट विस्तार का मामला नहीं रहेगा, बल्कि यह मुख्यमंत्री की राजनीतिक प्राथमिकताओं का संकेत भी होगा।
पांच नाम, लेकिन पांच अलग राजनीतिक संदेश
अगर इन पांच नामों को राजनीतिक संदेश के हिसाब से देखें तो तस्वीर कुछ इस तरह बनती है—
श्वेता शर्मा को आगे बढ़ाने का अर्थ होगा सुदिव्य सोनू की राजनीतिक विरासत और गिरिडीह उपचुनाव को प्राथमिकता देना।
सोमेश सोरेन को मंत्री बनाने का अर्थ होगा रामदास सोरेन की राजनीतिक विरासत को सम्मान देना और कोल्हान के आदिवासी समीकरण को साधना।
मंगल कालिंदी को मौका देने का अर्थ होगा दलित प्रतिनिधित्व को मजबूत करना।
उमाकांत रजक को मंत्री बनाने का अर्थ होगा उत्तरी छोटानागपुर में झामुमो के राजनीतिक विस्तार को प्राथमिकता देना।
और कल्पना सोरेन को बड़ी जिम्मेदारी देने का अर्थ होगा मुख्यमंत्री के साथ सरकार और संगठन के स्तर पर एक बेहद भरोसेमंद राजनीतिक सहयोगी को और मजबूत करना।
असली फैसला कुर्सियों का नहीं, प्राथमिकता का है
इसलिए हेमंत सोरेन के सामने सवाल केवल दो मंत्री चुनने का नहीं है।
यह फैसला बताएगा कि अगले चरण में मुख्यमंत्री की प्राथमिकता क्या है।
गिरिडीह उपचुनाव?
कोल्हान का सामाजिक संतुलन?
उत्तरी छोटानागपुर में झामुमो का विस्तार?
दलित प्रतिनिधित्व?
या फिर सरकार के भीतर अपना राजनीतिक बोझ साझा करने वाला भरोसेमंद चेहरा?
मेरी नजर में सबसे दिलचस्प मुकाबला इसी आखिरी सवाल पर है।
क्योंकि सुदिव्य कुमार सोनू की जगह भरना केवल एक मंत्री नियुक्त करना नहीं है। उनके पास कई बड़े विभाग थे और मुख्यमंत्री के लिए वे एक भरोसेमंद राजनीतिक सहयोगी भी थे।
इसलिए अगर हेमंत सोरेन सिर्फ मंत्री खोज रहे हैं तो विकल्प कई हैं।
लेकिन अगर वे सुदिव्य जैसे राजनीतिक सहयोगी की तलाश कर रहे हैं, तो तस्वीर काफी बदल जाती है।
और यही वजह है कि आने वाला मंत्रिमंडल विस्तार झारखंड की राजनीति में महज दो खाली कुर्सियां भरने की कवायद नहीं होगा।
यह हेमंत सोरेन की अगली राजनीतिक रणनीति का संकेत भी हो सकता है।
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