Jan-Man Desk, Patna : बिहार में राज्यसभा की पांचवीं सीट को लेकर सियासी तापमान होली के मौसम में भी ठंडा नहीं पड़ा है। सत्ताधारी गठबंधन और विपक्ष—दोनों खेमों में बंद कमरों की बैठकों का दौर जारी है। पांच सीटों के चुनाव में जदयू और भाजपा की दो-दो सीटें लगभग तय मानी जा रही हैं, लेकिन पांचवीं सीट ने राजनीतिक समीकरणों को अस्थिर कर दिया है। यही सीट अब जोड़-तोड़, रणनीति और संभावित टूट-फूट की धुरी बन गई है।
दस्तखत बनाम शपथपत्र: टूट रोकने की कवायद
संभावित ‘खरीद–फरोख्त’ और क्रॉस-वोटिंग की आशंका को देखते हुए एनडीए और महागठबंधन दोनों ने अपने-अपने विधायकों को औपचारिक दायरे में बांधना शुरू कर दिया है।
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एनडीए की रणनीति: विधायक ही प्रस्तावक
एनडीए ने अपने सभी 202 विधायकों को राज्यसभा उम्मीदवारों का प्रस्तावक बनाने का निर्णय लिया है।
- 10-10 विधायकों के सेट में प्रस्तावक सूची तैयार की जा रही है।
- प्रत्येक विधायक से लिखित समर्थन और दो-दो पन्नों पर हस्ताक्षर कराए गए हैं।
इस रणनीति का मकसद स्पष्ट है—कोई भी विधायक बाद में समर्थन से मुकर न सके। यह कदम राजनीतिक ‘चेक एंड बैलेंस’ की तरह काम करेगा।
राजद की घेराबंदी: लालू-तेजस्वी को पूर्ण अधिकार
लालू प्रसाद ने संसदीय दल की बैठक बुलाकर राज्यसभा चुनाव के फैसले के लिए स्वयं और तेजस्वी यादव को अधिकृत करा लिया है।
महागठबंधन (राजद-25, कांग्रेस-6, भाकपा माले-3, एक निर्दलीय) के समर्थन के बावजूद यदि विपक्ष उम्मीदवार उतारता है तो बहुजन समाज पार्टी के एक और एआईएमआईएम के पांच विधायकों की जरूरत पड़ेगी। ऐसे में चुनाव होने की स्थिति में क्रॉस-वोटिंग और राजनीतिक सौदेबाजी की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
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उपेंद्र कुशवाहा की बढ़ती मुश्किलें
पांचवीं सीट फिलहाल उपेंद्र कुशवाहा के पास है। वे दोबारा राज्यसभा जाना चाहते हैं। उनका दावा है कि विधानसभा चुनाव के दौरान उन्हें एक एमएलसी और एक राज्यसभा सीट का भरोसा दिया गया था।
हालांकि उनके बेटे को बिना किसी सदन की सदस्यता के मंत्री बनाए जाने के बाद राज्यसभा पर उनका दावा राजनीतिक रूप से कमजोर पड़ता दिख रहा है। सियासी गलियारों में चर्चा है कि भाजपा ने सीट बरकरार रखने के बदले पार्टी विलय का संकेत दिया है, लेकिन कुशवाहा इसके लिए तैयार नहीं हैं। यही वजह है कि वे पटना से दिल्ली तक सक्रिय संपर्क साध रहे हैं।
चिराग की निश्चिंतता, मांझी का दबाव
चिराग पासवान की पार्टी लोजपा (आर) के पास एनडीए में 19 विधायक हैं। वे इस संख्या के आधार पर राज्यसभा की एक सीट पर अपना दावा मजबूत मानते हैं। उन्होंने अपनी मां के राज्यसभा जाने की अटकलों से इनकार किया है, लेकिन पार्टी के भीतर सीट को लेकर आक्रामक रुख कायम है।
1 मार्च को चिराग ने पटना में विधायकों और नेताओं के साथ बैठक की, जिसमें राज्यसभा चुनाव और आगामी रणनीति पर चर्चा हुई।
दूसरी ओर जीतन राम मांझी भी राज्यसभा जाने की इच्छा जता कर दबाव की राजनीति कर रहे हैं। दलित नेतृत्व की अनदेखी को वे राजनीतिक जोखिम के तौर पर पेश कर रहे हैं।
संभावित चेहरे: किसे मिल सकता है मौका?

पवन सिंह : भोजपुरी अभिनेता पवन सिंह 2024 लोकसभा चुनाव में काराकाट से निर्दलीय लड़कर दूसरे स्थान पर रहे थे। बाद में भाजपा में वापसी के बाद वे विधानसभा चुनाव में स्टार प्रचारक बने। राजपूत समाज और भोजपुरी बेल्ट में उनकी लोकप्रियता, साथ ही ‘वाई’ श्रेणी की सुरक्षा, उनके नाम को मजबूती देती है।
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रामनाथ ठाकुर : केंद्र सरकार में मंत्री हैं और भारत रत्न कर्पूरी ठाकुर के पुत्र हैं। जेडीयू के ‘अति पिछड़ा’ चेहरे के तौर पर उनका नाम कटना मुश्किल माना जा रहा है।
हरिवंश नारायण सिंह : दो कार्यकाल से राज्यसभा सदस्य हैं और उपसभापति के पद पर आसीन हैं। तीसरी बार मौका मिलने पर संशय है, क्योंकि Nitish Kumar ने अब तक सीमित नेताओं को ही दो से अधिक बार भेजा है।
मनीष वर्मा : पूर्व आईएएस अधिकारी और जेडीयू के राष्ट्रीय महासचिव हैं। संगठन विस्तार और रणनीतिक भूमिका को देखते हुए वे मजबूत दावेदार माने जा रहे हैं।
निशांत कुमार : निशांत के नाम की चर्चा ने सियासी हलचल बढ़ा दी है। सूत्रों के मुताबिक पार्टी के वरिष्ठ नेता उनसे संपर्क में हैं और अंतिम निर्णय नीतीश कुमार को लेना है।
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आगे की तस्वीर
नामांकन की अंतिम तिथि 5 मार्च की सुबह है। यदि तब तक सर्वसम्मति नहीं बनती और विपक्ष उम्मीदवार उतार देता है, तो राज्यसभा की यह सीट सीधे मुकाबले में बदल सकती है।
यह चुनाव केवल एक संसदीय सीट का मामला नहीं है। यह गठबंधन की एकजुटता, नेतृत्व की विश्वसनीयता और विधायकों की निष्ठा की परीक्षा भी है। पांचवीं सीट पर जो बढ़त हासिल करेगा, उसे 2025 के विधानसभा चुनाव से पहले मनोवैज्ञानिक और राजनीतिक दोनों स्तर पर फायदा मिलेगा।