2029 की लड़ाई शुरू: JMM के सामने BJP से बड़ा सवाल है Congress की बढ़ती दावेदारी?

Anand Kumar

आनंद कुमार

रांची। झारखंड विधानसभा चुनाव 2029 अभी करीब तीन साल दूर है, लेकिन राज्य की राजनीति में इसकी जमीन तैयार होने लगी है। फिलहाल सवाल यह नहीं है कि 2029 में कौन जीतेगा। असली सवाल यह है कि अगले तीन वर्षों में कौन अपनी राजनीतिक जमीन सबसे ज्यादा मजबूत कर पाएगा?

अगर इस सवाल को झारखंड मुक्ति मोर्चा यानी JMM के संदर्भ में देखें, तो तस्वीर कुछ ज्यादा दिलचस्प हो जाती है। पहली नजर में JMM की सबसे बड़ी चुनौती BJP दिखाई देती है। लेकिन गहराई से देखें तो JMM के सामने एक और महत्वपूर्ण सवाल खड़ा हो रहा है—क्या वह अपने पारंपरिक आदिवासी आधार को मजबूत रखते हुए Congress की बढ़ती राजनीतिक दावेदारी को भी संभाल पाएगा?

यही 2029 के झारखंड चुनाव का एक महत्वपूर्ण राजनीतिक प्रश्न हो सकता है।

JMM की सबसे बड़ी ताकत उसकी आदिवासी राजनीति

JMM की राजनीति की जड़ें झारखंड आंदोलन में हैं। जल, जंगल, जमीन, आदिवासी अस्मिता और झारखंडी पहचान उसकी राजनीति की मूल पूंजी रही है। हेमंत सोरेन इस राजनीति के सबसे बड़े चेहरे हैं।

लेकिन आने वाले चुनाव में केवल पारंपरिक पहचान की राजनीति पर्याप्त होगी, यह मान लेना जोखिम भरा होगा।

आदिवासी समाज के भीतर भी राजनीतिक प्राथमिकताएं एक जैसी नहीं हैं। सरना कोड, धर्मांतरण, डीलिस्टिंग, परिसीमन और अलग-अलग आदिवासी समुदायों के हित जैसे मुद्दे लगातार राजनीतिक विमर्श को प्रभावित कर रहे हैं।

इसलिए JMM के सामने चुनौती केवल आदिवासी वोट हासिल करने की नहीं है। चुनौती यह भी है कि आदिवासी राजनीति के भीतर कोई दूसरा मजबूत राजनीतिक विकल्प उसकी जगह न बना पाए।

Congress की सक्रियता क्यों महत्वपूर्ण है?

यहीं Congress की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।

30 अगस्त को रांची के मोरहाबादी मैदान में हुई आदिवासी एकता महाजुटान रैली को इसी व्यापक राजनीतिक संदर्भ में देखा जा सकता है। परिसीमन को आदिवासी राजनीतिक प्रतिनिधित्व से जोड़ते हुए Congress और आदिवासी संगठनों की सक्रियता ने यह संकेत दिया कि Congress झारखंड की आदिवासी राजनीति में अपनी जगह को और मजबूत करना चाहती है।

इसका अर्थ यह नहीं है कि JMM-Congress गठबंधन टूटने वाला है। बल्कि इसके उलट, गठबंधन के भीतर सहयोग और प्रतिस्पर्धा दोनों साथ-साथ चल सकते हैं।

यही आने वाले वर्षों में सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक समीकरण होगा।

JMM और Congress: साथी भी, वोट के लिए प्रतिद्वंद्वी भी

JMM और Congress का वोट बैंक पूरी तरह अलग-अलग नहीं है। दोनों दलों की पहुंच आदिवासी और मुस्लिम मतदाताओं के बीच है। Christian tribal communities के बीच भी दोनों दलों का राजनीतिक प्रभाव मौजूद है।

इसलिए विधानसभा चुनाव में दोनों पार्टियां एक-दूसरे की सहयोगी हैं, लेकिन जमीन पर उनके राजनीतिक हित हमेशा एक जैसे नहीं होते।

यही वजह है कि 2029 के पहले seat-sharing सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक बातचीत में से एक बन सकती है।

आज यदि BJP के खिलाफ anti-BJP वोट का बड़ा हिस्सा गठबंधन के उम्मीदवार के पीछे एकजुट होता है, तो गठबंधन की ताकत बढ़ती है। लेकिन यदि अगले तीन वर्षों में Congress अपना संगठन और जनाधार तेजी से बढ़ाती है, तो वह अधिक सीटों की मांग करने की स्थिति में आ सकती है।

यानी सवाल केवल गठबंधन बचाने का नहीं होगा। सवाल होगा—गठबंधन में किसकी bargaining power कितनी होगी?

BJP की चुनौती सिर्फ आदिवासी राजनीति तक सीमित नहीं

दूसरी तरफ BJP भी झारखंड में अपनी रणनीति को नए सिरे से मजबूत करने की कोशिश करेगी।

आदिवासी राजनीति में वापसी के साथ-साथ घुसपैठ, धर्मांतरण, जनसांख्यिकीय बदलाव और आदिवासी पहचान जैसे मुद्दे BJP के राजनीतिक narrative का हिस्सा बने हुए हैं।

लेकिन BJP के सामने एक दूसरी चुनौती भी है—OBC और मूलवासी राजनीति।

झारखंड में OBC मतदाता चुनावी समीकरणों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। कुड़मी-मूलवासी राजनीति में पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह नए राजनीतिक विकल्प उभरे हैं, उसने BJP के लिए यह संदेश जरूर दिया है कि हर OBC वोट को स्वतः BJP का वोट मानना आसान नहीं होगा।

2019 में AJSU और 2024 में जयराम महतो की JLKM ने कई इलाकों में चुनावी समीकरणों को प्रभावित किया। इसका असर भविष्य की रणनीति पर भी पड़ सकता है।

जयराम महतो फैक्टर को नजरअंदाज करना मुश्किल

2029 की तस्वीर में जयराम महतो और JLKM को भी नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा।

खासकर कुड़मी और व्यापक मूलवासी राजनीति में यदि JLKM अपना संगठन विस्तार करने में सफल होती है, तो इसका असर केवल BJP पर नहीं, बल्कि JMM और Congress के चुनावी समीकरणों पर भी पड़ सकता है।

यानी 2029 का मुकाबला सिर्फ JMM बनाम BJP नहीं रह सकता।

यह मुकाबला कई सामाजिक समूहों और कई राजनीतिक दावेदारियों के बीच हो सकता है।

Urban Jharkhand भी निर्णायक होगा

रांची, जमशेदपुर, बोकारो, धनबाद जैसे शहरी क्षेत्र लंबे समय से BJP के मजबूत राजनीतिक क्षेत्रों में माने जाते रहे हैं। लेकिन विधानसभा चुनावों में इन इलाकों में भी मुकाबला पहले की तुलना में अधिक जटिल हुआ है।

2026 के नगर निकाय चुनावों ने भी एक मिश्रित तस्वीर पेश की। रांची में BJP समर्थित उम्मीदवार ने मेयर पद जीता, जबकि गिरिडीह और देवघर में JMM समर्थित उम्मीदवारों को सफलता मिली और मानगो में Congress समर्थित उम्मीदवार विजयी रहीं।

इससे संकेत मिलता है कि शहरी झारखंड को किसी एक पार्टी का स्थायी गढ़ मानना अब आसान नहीं है।

लेकिन JMM की सबसे बड़ी परीक्षा Governance होगी

यहीं आकर 2029 की लड़ाई का सबसे महत्वपूर्ण पहलू सामने आता है।

Identity politics कितनी भी मजबूत हो, अंततः सरकार को अपने काम का हिसाब देना होगा।

2029 में मतदाता पूछ सकते हैं—

  • रोजगार कितना आया?
  • निवेश कितना हुआ?
  • शिक्षा और स्वास्थ्य में क्या बदलाव आया?
  • सरकारी योजनाओं का लाभ कितना पहुंचा?
  • ग्रामीण अर्थव्यवस्था की स्थिति क्या रही?
  • शहरों में रोजगार और बुनियादी सुविधाओं की स्थिति कैसी रही?

JMM के लिए यह साबित करना महत्वपूर्ण होगा कि उसकी राजनीति केवल आदिवासी अस्मिता तक सीमित नहीं है, बल्कि वह governance और development के मोर्चे पर भी मजबूत प्रदर्शन कर सकती है।

JMM-Congress रिश्ते की अपनी अलग राजनीति

गठबंधन के बावजूद JMM और Congress की राजनीतिक शैली में अंतर भी दिखाई देता है।

Congress की राष्ट्रीय राजनीति मुख्य रूप से BJP के खिलाफ व्यापक विपक्षी संघर्ष पर केंद्रित है। वहीं JMM एक क्षेत्रीय दल के रूप में राज्य के हितों और केंद्र के साथ व्यावहारिक संबंधों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश करता रहा है।

इसलिए दोनों पार्टियां एक मंच पर होते हुए भी हर मुद्दे पर बिल्कुल एक जैसी राजनीतिक positioning रखेंगी, यह जरूरी नहीं है।

और यही अंतर भविष्य में गठबंधन की राजनीति को प्रभावित कर सकता है।

तो JMM की असली चुनौती क्या है?

यदि पूरे राजनीतिक समीकरण को एक साथ देखें तो JMM के सामने तीन तरफ से दबाव दिखाई देता है।

पहला— BJP, जो आदिवासी और गैर-आदिवासी दोनों क्षेत्रों में अपना आधार बढ़ाने की कोशिश करेगी।

दूसरा— Congress, जो गठबंधन का हिस्सा होते हुए भी आदिवासी, मुस्लिम और Christian tribal वोटों में अपना स्वतंत्र राजनीतिक space बढ़ाना चाहती है।

तीसरा— Governance, जिसके आधार पर 2029 में JMM सरकार से उसके काम का हिसाब मांगा जाएगा।

इसलिए JMM की असली चुनौती BJP को हराना भर नहीं है।

असली चुनौती है—अपने core tribal base को बचाते हुए एक व्यापक सामाजिक गठबंधन को कायम रखना और Congress को ऐसा सहयोगी बनाए रखना जो बराबर का राजनीतिक दावेदार न बन जाए।

2029 का सबसे बड़ा सवाल

अगले तीन वर्षों में राजनीति किस दिशा में जाती है, यह कई चीजों पर निर्भर करेगा।

क्या JMM अपने आदिवासी आधार को और मजबूत करता है?

क्या Congress आदिवासी राजनीति में अपना स्वतंत्र जनाधार बढ़ा पाती है?

क्या BJP OBC और आदिवासी दोनों मोर्चों पर वापसी कर पाती है?

और क्या जयराम महतो की राजनीति तीसरे विकल्प के रूप में और मजबूत होती है?

इन सवालों के जवाब ही 2029 के झारखंड चुनाव की तस्वीर बनाएंगे।

इसलिए 2029 की असली लड़ाई चुनाव की तारीख घोषित होने के बाद नहीं, बल्कि अभी से शुरू हो चुकी है।

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वरिष्ठ पत्रकार आनंद कुमार करीब 30 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। उन्होंने एम.ए. (इतिहास), बैचलर ऑफ जर्नलिज्म और एमबीए (मार्केटिंग) की शिक्षा प्राप्त की है। 1996 में 'प्रभात खबर', रांची से बतौर प्रशिक्षु पत्रकार करियर की शुरुआत करके 'हिन्दुस्तान' और 'अमर उजाला' जैसे राष्ट्रीय समाचार पत्रों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल चुके आनंद कुमार हिन्दुस्तान, जमशेदपुर के स्थानीय संपादक भी रहे हैं। इसके अलावा The Photon News अखबार सहित Lagatar.in तथा Newswing.com जैसे डिजिटल माध्यमों में संपादक पद का दायित्व संभाल चुके हैं। इसके अलावा आनंद कुमार कॉरपोरेट कम्यूनिकेशन/जनसंपर्क, प्रबंधन, सरकार/प्रशासन और मीडिया शिक्षण का भी गहन अनुभव रखते हैं। उन्होंने सरयू राय - एक नाम कई आयाम' नामक पुस्तक का संपादन भी किया है।
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