Ranchi: झारखंड की राजधानी रांची में 30 अगस्त को प्रस्तावित आदिवासी एकता महाजुटान को लेकर सियासी विवाद गहरा गया है. रैली के स्वरूप और आयोजन को लेकर आदिवासी संगठनों ने सवाल उठाए हैं, वहीं भाजपा ने आरोप लगाया है कि आदिवासी एकता के नाम पर आयोजित कार्यक्रम को अंततः कांग्रेस गठबंधन की राजनीतिक रैली में तब्दील कर दिया गया. आदिवासी संगठनों ने चर्च की कथित भूमिका पर भी आपत्ति जताते हुए कहा है कि आदिवासियों के नाम पर किसी धार्मिक संस्था या राजनीतिक दल द्वारा आंदोलन चलाने का वे विरोध करेंगे. दूसरी ओर भाजपा नेताओं ने कांग्रेस पर आदिवासी समाज को गुमराह कर राजनीतिक लाभ लेने का आरोप लगाया है. नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने इस पूरे विवाद को झारखंड की बदलती डेमोग्राफी और आदिवासी आबादी में गिरावट के मुद्दे से जोड़ते हुए कांग्रेस, मिशनरियों और हेमंत सोरेन सरकार पर निशाना साधा है.
- आदिवासी एकता महाजुटान से कांग्रेस की रैली तक पहुंचा विवाद
- ‘चर्च अपने नाम से आंदोलन करे, आदिवासियों के नाम पर नहीं’
- समीर उरांव का आरोप- कांग्रेस ने आदिवासियों को धोखे में रखकर बुलाया
- ‘रैली कांग्रेस की थी, पीछे से चर्च की मशीनरी लगी’
- बाबूलाल मरांडी ने उठाया आदिवासी आबादी और डेमोग्राफी का मुद्दा
- ‘आदिवासी आबादी 35.38 से घटकर 26.20 प्रतिशत हुई’
- संथाल परगना की डेमोग्राफी पर भी चिंता
- आदिवासी जमीन पर कब्जे का भी आरोप
- ‘मिशनरियों की भूमिका पर कार्रवाई हो’
- ‘आदिवासी अधिकार नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सुरक्षित’
आदिवासी एकता महाजुटान से कांग्रेस की रैली तक पहुंचा विवाद
आदिवासी संगठनों की ओर से जारी संयुक्त प्रेस बयान में दावा किया गया है कि शुरुआत में कार्यक्रम को आदिवासी एकता महाजुटान रैली के नाम से प्रचारित किया गया था. बाद में चर्च की कथित एंट्री और इसे लेकर आदिवासी संगठनों के विरोध के बीच कार्यक्रम के स्वरूप में बदलाव आया और इसे कांग्रेस गठबंधन सरकार की रैली के रूप में पेश किया जाने लगा.
आदिवासी संगठनों ने आरोप लगाया कि महज कुछ घंटों के भीतर रैली के स्वरूप में ऐसा बदलाव हुआ कि अंततः चर्च द्वारा आयोजित कार्यक्रम पर कांग्रेस गठबंधन की राजनीतिक मोहर लग गई. संगठनों ने पूर्व मंत्री बंधु तिर्की पर भी गंभीर आरोप लगाए हैं.
संयुक्त बयान में कहा गया कि बंधु तिर्की चर्च का प्रमुख चेहरा हैं और इस पूरे मामले के मास्टरमाइंड हैं. संगठनों का आरोप है कि बंधु तिर्की चाहते हैं कि आदिवासी समाज का नेतृत्व और अगुवाई उनके तथा चर्च के माध्यम से हो. संगठनों ने कहा कि आदिवासी समाज को इस कथित राजनीतिक चाल को समझना होगा.
‘चर्च अपने नाम से आंदोलन करे, आदिवासियों के नाम पर नहीं’
आदिवासी संगठनों ने कहा कि यदि चर्च ईसाई, मसीही, क्रिस्तान, विश्वासी या ख्रीस्तीय समुदाय के नाम से अपना आंदोलन करता है तो उन्हें इससे कोई आपत्ति नहीं है. लेकिन आदिवासियों के नाम पर किसी तरह का आंदोलन या कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा तो उसका पुरजोर विरोध किया जाएगा.
संगठनों ने रैली को पूरी तरह विफल करार देते हुए कहा कि आदिवासी समाज को किसी राजनीतिक या धार्मिक संस्था के राजनीतिक एजेंडे का हिस्सा नहीं बनाया जाना चाहिए.
संयुक्त प्रेस बयान में मुख्य पाहन जगलाल पाहन, केंद्रीय सरना समिति के अध्यक्ष बबलू मुंडा, प्रधान महासचिव अशोक मुंडा, जनजाति सुरक्षा मंच के क्षेत्रीय संयोजक संदीप उरांव, झारखंड आदिवासी विकास समिति धुर्वा के अध्यक्ष मेघा उरांव, मुखिया संघ के अध्यक्ष सोमा उरांव और सन्नी टोप्पो शामिल थे.
समीर उरांव का आरोप- कांग्रेस ने आदिवासियों को धोखे में रखकर बुलाया
भाजपा के एसटी मोर्चा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व राज्यसभा सांसद समीर उरांव ने भी रैली को लेकर कांग्रेस पर हमला बोला. उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस ने आदिवासियों को धोखे में रखकर रैली में बुलाने का काम किया.
समीर उरांव ने कहा कि कांग्रेस को अच्छी तरह पता है कि यदि पार्टी अपने नाम पर रैली आयोजित करती तो 500 लोगों का आंकड़ा पार करना भी मुश्किल होता. इसलिए आदिवासी समाज के नाम पर रैली आयोजित कर उन्हें गुमराह करने की कोशिश की गई.
उन्होंने आरोप लगाया कि कांग्रेस ने आदिवासी समाज को राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया है. उनके मुताबिक परिसीमन जैसे संवेदनशील मुद्दे पर कांग्रेस को भय और भ्रम फैलाने के बजाय तथ्य सामने रखने चाहिए.
समीर उरांव ने कहा कि इस कथित धोखाधड़ी की राजनीतिक कीमत कांग्रेस को चुकानी होगी और कांग्रेस को आदिवासी समाज को सिर्फ वोट बैंक समझना बंद करना चाहिए.
‘रैली कांग्रेस की थी, पीछे से चर्च की मशीनरी लगी’
समीर उरांव ने दावा किया कि रैली पूरी तरह कांग्रेस की थी. उन्होंने कहा कि रैली में कांग्रेस के प्रभारी, प्रदेश अध्यक्ष और पार्टी के तमाम प्रमुख नेता मौजूद थे. उन्होंने बंधु तिर्की का नाम लेते हुए कहा कि वे कार्यक्रम में आगे रहकर सक्रिय थे.
समीर उरांव का आरोप है कि कांग्रेस के नाम से रैली आयोजित करने पर अपेक्षित भीड़ नहीं जुटती, इसलिए आदिवासियों के नाम पर कार्यक्रम आयोजित किया गया और इसके लिए चर्च की मशीनरी का इस्तेमाल किया गया.
उन्होंने दावा किया कि चर्च की ओर से लोगों को रैली में शामिल होने के लिए पत्र भेजे गए और नहीं आने पर कथित तौर पर जुर्माने की धमकी दी गई.

बाबूलाल मरांडी ने उठाया आदिवासी आबादी और डेमोग्राफी का मुद्दा
इसी विवाद के बीच भाजपा प्रदेश कार्यालय में आयोजित प्रेस वार्ता में नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने झारखंड की बदलती डेमोग्राफी को लेकर कांग्रेस, मिशनरियों और हेमंत सोरेन सरकार पर निशाना साधा.
बाबूलाल मरांडी ने आरोप लगाया कि कांग्रेस ने हमेशा आदिवासियों के साथ छल और धोखा किया है तथा आदिवासी समाज को बरगलाने के लिए मिशनरियों का इस्तेमाल किया गया. उन्होंने झारखंड आंदोलन के इतिहास का उल्लेख करते हुए जयपाल सिंह मुंडा, कार्तिक उरांव और शिबू सोरेन के आंदोलनों का भी जिक्र किया.
उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज को अपने अधिकारों और भविष्य को लेकर गंभीरता से विचार करना होगा.
‘आदिवासी आबादी 35.38 से घटकर 26.20 प्रतिशत हुई’
बाबूलाल मरांडी ने आदिवासी आबादी के आंकड़े पेश करते हुए कहा कि वर्ष 1951 में झारखंड में आदिवासियों की आबादी 35.38 प्रतिशत थी, जो 2011 में घटकर 26.20 प्रतिशत रह गई.
उन्होंने कहा कि इसी अवधि में मुस्लिम आबादी 8.9 प्रतिशत से बढ़कर 14.53 प्रतिशत हो गई. उनके मुताबिक 1951 में सनातनी आबादी 87.79 प्रतिशत थी, जो 2011 में घटकर 81.17 प्रतिशत रह गई.
मरांडी ने दावा किया कि यदि यही रफ्तार जारी रही तो 2051 तक आदिवासियों की आबादी 22.21 प्रतिशत और सनातनी आबादी 76.88 प्रतिशत रह सकती है, जबकि मुस्लिम आबादी 19 प्रतिशत तक पहुंच सकती है.
हालांकि, ये 2051 के आंकड़े मरांडी द्वारा प्रस्तुत अनुमान हैं, न कि 2051 की वास्तविक जनगणना के आंकड़े.
संथाल परगना की डेमोग्राफी पर भी चिंता
बाबूलाल मरांडी ने संथाल परगना में आदिवासी आबादी के घटते प्रतिशत और मुस्लिम आबादी में वृद्धि का मुद्दा भी उठाया. उन्होंने कहा कि संविधान में आदिवासी और दलित समुदायों को उनकी आबादी के अनुपात में कई अधिकार और प्रतिनिधित्व प्राप्त हैं, इसलिए जनसंख्या में होने वाला बदलाव गंभीर चिंता का विषय है.
उन्होंने राज्य सरकार पर वोट बैंक की राजनीति के कारण इस मुद्दे पर चुप रहने का आरोप लगाया.
मरांडी ने कहा कि झारखंड और विशेषकर संथाल परगना में जिस तरह डेमोग्राफी बदल रही है, वह चिंताजनक है. यदि सरकार और आदिवासी समाज इस विषय पर विचार नहीं करेंगे तो आने वाले समय में बड़ी चुनौती खड़ी हो सकती है.
आदिवासी जमीन पर कब्जे का भी आरोप
प्रेस वार्ता में बाबूलाल मरांडी ने आदिवासी कल्याण समिति, पाकुड़ की ओर से भेजे गए एक पत्र का भी उल्लेख किया. उन्होंने आरोप लगाया कि संथाल परगना में आदिवासियों की रैयती जमीनों पर कब्जा कर बहुमंजिला भवन, कारखाने, मस्जिद और मदरसे बनाए जाने की शिकायतें सामने आई हैं.
उन्होंने फर्जी दानपत्र के जरिए आदिवासी जमीन पर कब्जे और कुछ इलाकों में कथित तौर पर बांग्लादेशियों द्वारा जमीन पर कब्जा किए जाने की शिकायतों का भी जिक्र किया.
मरांडी ने राज्य सरकार से इन शिकायतों की जांच कराने और यह बताने की मांग की कि अब तक इस मामले में क्या कार्रवाई की गई है.
‘मिशनरियों की भूमिका पर कार्रवाई हो’
बाबूलाल मरांडी ने आरोप लगाया कि आदिवासियों को रैली में शामिल कराने के लिए रांची के आर्च बिशप की ओर से पत्र जारी किया गया. उन्होंने दावा किया कि रैली में नहीं जाने पर 100 से 500 रुपये तक जुर्माना वसूलने की धमकी दी गई.
मरांडी ने प्रेस वार्ता के दौरान इससे संबंधित एक ऑडियो क्लिप भी सुनाने की बात कही. उन्होंने कहा कि यदि इस तरह से आदिवासियों पर दबाव बनाया जाता है तो यह गंभीर विषय है.
उन्होंने कांग्रेस पर आदिवासी हितों और लोकतंत्र की बात करने के बावजूद मिशनरियों के माध्यम से राजनीतिक गतिविधियां संचालित करने का आरोप लगाया.
‘आदिवासी अधिकार नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में सुरक्षित’
बाबूलाल मरांडी ने कहा कि संविधान से मिले आदिवासी समाज के अधिकार नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पूरी तरह सुरक्षित हैं. उन्होंने कहा कि आदिवासियों के संवैधानिक अधिकारों के साथ किसी प्रकार की छेड़छाड़ नहीं होने दी जाएगी.
उन्होंने आदिवासी समाज से कांग्रेस और मिशनरियों के कथित झांसे में नहीं आने की अपील की.
भाजपा नेता ने कहा कि उनकी पार्टी आदिवासी समाज के विकास, सम्मान और संवैधानिक अधिकारों के लिए प्रतिबद्ध है.
प्रेस वार्ता के दौरान अशोक बड़ाइक, रामकुमार पाहन, सनी टोप्पो और पिंकी खोया भी मौजूद रहीं.
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