सरकारी दावों और झारखंड के ग्रामीण स्वास्थ्य सिस्टम पर बड़ा सवाल
गुमला / रांची: कहते हैं कि अस्पताल जिंदगी बचाने का आखिरी आसरा होते हैं, लेकिन झारखंड के गुमला जिले से जो खबर आई है, उसने इस भरोसे को एक बार फिर तार-तार कर दिया है। सिरदर्द और उल्टी से तड़पती 9वीं कक्षा की छात्रा शिवानी कुमारी (15 वर्ष) की मौत केवल एक बीमारी से नहीं, बल्कि चैनपुर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) की प्रशासनिक संवेदनहीनता और बदहाली के कारण भी हुई है।
बिना प्राथमिक उपचार के गुमला सदर अस्पताल रेफर किए जाने के बाद घंटों तक एंबुलेंस का न मिलना और मजबूरी में किए गए निजी वाहन में ऑक्सीजन तक देने से मना कर देना, यह दर्शाता है कि कागजों पर चमकता हमारा स्वास्थ्य विभाग जमीनी स्तर पर कितना खोखला हो चुका है।
रेफरल का खेल : जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने की संस्कृति
चैनपुर सीएचसी के डॉक्टरों ने शिवानी की बिगड़ती हालत को देख उसे बेहतर इलाज के लिए रेफर तो कर दिया, लेकिन क्या एक डॉक्टर की जिम्मेदारी सिर्फ पर्चे पर ‘रेफर’ लिख देने से खत्म हो जाती है?
गंभीर रूप से बीमार मरीज को सुरक्षित रूप से उच्च चिकित्सा केंद्र तक पहुंचाना भी स्वास्थ्य प्रणाली का हिस्सा है। प्रबंधन ने यह कहकर हाथ खड़े कर दिए कि “एंबुलेंस खराब है और स्टार्ट नहीं हो रही।” एक आपातकालीन वाहन का इस तरह कबाड़ में तब्दील होना सीधे तौर पर नियमित मेंटेनेंस (Rethinking Fleet Management) की कमी को उजागर करता है।

पिकअप वैन की मजबूरी और वो दो घंटे का ‘सन्नाटा’
परिजनों के मुताबिक, वे करीब दो घंटे तक अस्पताल परिसर में मदद की गुहार लगाते रहे। हर बीतते मिनट के साथ शिवानी की जिंदगी की डोर कमजोर हो रही थी, लेकिन अस्पताल प्रशासन का दिल नहीं पसीजा।
अंततः एक बेबस पिता ने अपनी बेटी को बचाने के लिए माल ढोने वाली ‘पिकअप वैन’ का इंतजाम किया। त्रासदी का दूसरा अध्याय तब शुरू हुआ जब अस्पताल ने वैन में ऑक्सीजन सिलेंडर तक लगाने से मना कर दिया। बिना ऑक्सीजन के, शिवानी ने रास्ते में ही अपने माता-पिता की गोद में दम तोड़ दिया।
झारखंड के ग्रामीण स्वास्थ्य ढांचे पर 3 बड़े नीतिगत सवाल
यह घटना कोई इकलौती या पहली घटना नहीं है। यह ग्रामीण इलाकों में चल रहे एक बड़े संकट का हिस्सा है:
- 108 एंबुलेंस सेवा का मिसमैनेजमेंट: राज्य में आपातकालीन एंबुलेंस सेवाओं के लिए बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन ब्लॉक स्तर पर ये सेवाएं समय पर क्यों नहीं पहुंचतीं? क्या बैकअप वाहनों की कोई व्यवस्था नहीं है?
- रिसोर्स एलोकेशन (संसाधनों का वितरण): जब देश भर में ऑक्सीजन प्लांट और सिलेंडरों की उपलब्धता को लेकर बड़े-बड़े बजट पास किए जा रहे हैं, तब एक सीएचसी स्तर पर मरीज को रेफरल के दौरान ऑक्सीजन न मिलना सीधे तौर पर संसाधनों की कालाबाजारी या गंभीर प्रशासनिक लापरवाही की ओर इशारा करता है।
- प्रशासनिक जवाबदेही का अभाव: ऐसी घटनाओं के बाद अक्सर एक विभागीय ‘जांच कमेटी’ बना दी जाती है, जिसकी रिपोर्ट ठंडे बस्ते में चली जाती है। जब तक दोषियों पर आपराधिक लापरवाही का मुकदमा दर्ज नहीं होगा, तब तक यह रवैया नहीं बदलेगा।
जन-मन की बात: डिजिटल इंडिया और चमचमाती सड़कों के इस दौर में, अगर एक माता-पिता को अपनी दम तोड़ती बच्ची के लिए पिकअप वैन का सहारा लेना पड़े और बुनियादी ऑक्सीजन के बिना एक मासूम की जिंदगी रास्ते में ही टूट जाए, तो हमें सोचना होगा कि हम विकास की किस राह पर आगे बढ़ रहे हैं। शिवानी की मौत बीमारी से ज्यादा, सिस्टम की संवेदनहीनता से हुई हत्या है।
इस मामले में स्वास्थ्य विभाग के उच्च अधिकारियों को तत्काल संज्ञान लेकर चैनपुर सीएचसी के दोषियों पर कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए, ताकि भविष्य में किसी और गरीब को अपने बच्चे को खोने का यह असहनीय दर्द न झेलना पड़े।