
शैलेंद्र महतो
हमारे भारतीय संविधान में आदिवासी और वनवासी शब्द को संवैधानिक दर्जा नहीं मिला है, फिर भी हमलोग इन शब्दों को लेकर लड़े जा रहे हैं। संविधान में सिर्फ अनुसूचित जनजाति शब्द का उल्लेख है। अंग्रेजी में इसे Schedule Tribe कहा गया है। समाज के पढ़े- लिखे प्रबुद्ध वर्ग भी बिना जाने – समझे सिर्फ आदिवासी का रट लगाए रहते हैं।
पिछले दिनों यानी 24 मई 2026 को दिल्ली के लाल किला मैदान में जनजातियों की एक बड़ी रैली हुई। रैली का नाम दिया गया था– “जनजातीय सांस्कृतिक समागम”। रैली में देश के विभिन्न हिस्सों से महिला, पुरुष, नौजवान शामिल हुए। लोग बहुत उत्साहित थे, बाजा बज रही थी, गाना गा रहे थे, नाच रहे थे। दिल्ली के सड़कों में लोगों ने बहुत दिनों के बाद ऐसा नजारा देखा होगा?
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देश के गृहमंत्री अमित शाह मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित हुए। उन्होंने रैली को संबोधित करते हुए कहा कि —
“धरती आबा भगवान बिरसा मुंडा की 150 वीं जयंती के अवसर पर आयोजित ‘जनजातीय सांस्कृतिक समागम’ का यह दृश्य आने वाले वर्षों में जनजातियों के महाकुंभ के रूप में जाना जाएगा।”
उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि संविधान ने सबको सम्मान से जीने का अधिकार दिया है लेकिन लालच, प्रलोभन या बलपूर्वक किसी का धर्मांतरण नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि जनजातीय संस्कृति को सुरक्षित करने का जो यह आंदोलन चलाया जा रहा है वह भगवान बिरसा मुंडा के उलगुलान के बाद पहला ऐसा जनजातीय आंदोलन है, जो समग्र देश को एक करता है।
संबोधन में अधिकतर जनजाति और वनवासी शब्द का प्रयोग हुआ। यह रैली कुल मिलाकर धर्मांतरित जनजातियों के खिलाफ में था।
आरएसएस और भाजपा आदिवासी शब्द का व्यवहार करने से बचते हैं, ऐसा क्यों?

आदिवासी संवैधानिक शब्द नहीं है
संविधान सभा में जयपाल सिंह और डॉक्टर भीमराव अंबेडकर के बीच “आदिवासी” बनाम “अनुसूचित जनजाति” शब्द को लेकर लंबी बहस चली थी, जिसका संक्षिप्त रूप इस प्रकार है–
संविधान सभा में जयपाल सिंह ने कहा था —
“एक या दो बातें ऐसी है कि मैं चाहूंगा कि डॉक्टर अंबेडकर उन पर प्रकाश डालें। पहली बात जिसको मैं उनके द्वारा स्पष्ट कराना चाहता हूं, वह संशोधन संख्या 491 के संबंध में है जिसको उन्होंने पेश किया है और जिसमें वे ‘आदिवासी’ शब्द के स्थान पर ‘अनुसूचित जनजाति’ शब्द रखना चाहते हैं?”
डॉ अंबेडकर ने जयपाल सिंह के प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा था–
“‘आदिवासी’ शब्द वास्तव में एक सामान्य शब्द है जिसका कोई विशिष्ट कानूनी अर्थ नहीं है। यह कुछ-कुछ अछूत शब्द के समान है। इसका कोई निश्चित कानूनी अर्थ नहीं है। अनुसूचित जनजातियों के प्रश्न पर यह पूछा जा सकता है कि मैंने आदिवासी के स्थान में ‘अनुसूचित’ शब्द क्यों रखा। इस बात पर मेरा उत्तर यह है, जैसा कि मैंने कहा है ‘अनुसूचित जनजाति’ शब्द का एक निश्चित अर्थ है क्योंकि वह जनजातियों को क्रमबद्ध करता है जैसा कि आप दोनों अनुच्छेदों में पाएंगे।”
अंततः संविधान सभा में लंबी बहस के बाद “आदिवासी” शब्द के स्थान में “अनुसूचित जनजाति” शब्द को संवैधानिक हक मिला।
नोट : लेखक पूर्व सांसद हैं
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