Anand Kumar, Ranchi : असम विधानसभा चुनाव को लेकर झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) ने निर्णायक कदम उठाते हुए 19 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने का फैसला कर लिया है। कांग्रेस के साथ लंबे समय से चल रही सीट बंटवारे की बातचीत अंततः बेनतीजा रही।
सूत्रों के अनुसार, बेहाली सीट सहयोगी माले (CPI-ML) को दी गई है। इस फैसले के साथ ही असम में महागठबंधन की संभावनाएं लगभग समाप्त हो गई हैं।
सीट शेयरिंग पर गतिरोध, दिल्ली तक हुई बातचीत
कांग्रेस और झामुमो के बीच पिछले कई दिनों से सीट बंटवारे को लेकर बातचीत जारी थी। जानकारी के मुताबिक कांग्रेस ने झामुमो को 5 सीटें देने और 2-3 सीटों पर ‘फ्रेंडली फाइट’ का प्रस्ताव दिया था।
22 मार्च की शाम मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और विधायक कल्पना सोरेन दिल्ली पहुंचे थे, जहां अंतिम दौर की बातचीत हुई। लेकिन यह वार्ता किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सकी।
इसके बाद झामुमो ने स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ने का निर्णय ले लिया।
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फैसला होते ही चुनावी मशीनरी एक्टिव
फैसले के तुरंत बाद पार्टी ने संगठनात्मक स्तर पर तेजी दिखाते हुए उम्मीदवारों को चुनाव चिन्ह आवंटित करना शुरू कर दिया।
मंत्री चमरा लिंडा और पार्टी महासचिव विनोद पांडेय, जो पहले से असम में डेरा डाले हुए थे, उन्होंने संभावित उम्मीदवारों को सिंबल बांट दिए हैं।
हालांकि आधिकारिक सूची जारी होना अभी बाकी है, लेकिन पार्टी के भीतर चुनावी प्रक्रिया पूरी तरह शुरू हो चुकी है।
महीनों से चल रहा था असम मिशन
झामुमो का यह फैसला अचानक नहीं, बल्कि लंबे राजनीतिक तैयारी का परिणाम है।
पार्टी ने असम में करीब 70 लाख ‘टी-ट्राइब’ आबादी को केंद्र में रखकर अपनी रणनीति तैयार की थी, जिनकी सामाजिक जड़ें झारखंड से जुड़ी मानी जाती हैं।
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन स्वयं हाल के महीनों में दो बार असम दौरे पर जा चुके थे और पार्टी की सक्रियता लगातार बढ़ रही थी।
कांग्रेस की रणनीति से बढ़ा अविश्वास
राजनीतिक हलकों में यह भी चर्चा है कि कांग्रेस द्वारा 90 से अधिक सीटों पर उम्मीदवारों की घोषणा ने झामुमो के भीतर असंतोष को और बढ़ा दिया।
खासकर उन क्षेत्रों में उम्मीदवार उतारे गए, जहां झामुमो अपनी मजबूत दावेदारी मान रहा था। इससे यह संकेत गया कि कांग्रेस सीमित सीटों से आगे बढ़ने के पक्ष में नहीं है।
बिहार का अनुभव भी बना कारण
झामुमो के निर्णय के पीछे बिहार विधानसभा चुनाव का अनुभव भी एक अहम कारण माना जा रहा है।
उस समय भी सीट बंटवारे को लेकर लंबी बातचीत चली थी, लेकिन अंतिम समय में पार्टी को पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिल सका था।
इस बार पार्टी ने अंतिम क्षण तक इंतजार करने के बजाय पहले ही स्वतंत्र रास्ता चुन लिया।
झारखंड में राज्यसभा समीकरण पर असर
असम में गठबंधन नहीं बनने का सीधा असर अब झारखंड की राजनीति पर पड़ सकता है।
जून में होने वाले राज्यसभा चुनाव में दो सीटें खाली हो रही हैं। कांग्रेस एक सीट पर दावा कर रही थी, लेकिन मौजूदा घटनाक्रम के बाद यह दावा कमजोर पड़ सकता है।
झामुमो के पास अपने दम पर एक सीट जीतने की संख्या है, जबकि दूसरी सीट के लिए समीकरण नए सिरे से बन सकते हैं।
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गठबंधन के भविष्य पर सवाल
असम में अलग राह अपनाने के बाद झारखंड में सत्तारूढ़ महागठबंधन के भविष्य को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि राज्यसभा चुनाव में भी तालमेल नहीं बनता है, तो गठबंधन में दरार और गहरी हो सकती है।
इसी बीच यह चर्चा भी तेज हो गई है कि क्या झारखंड में गैर-भाजपा और गैर-कांग्रेस राजनीतिक विकल्प की संभावनाएं मजबूत हो रही हैं। असम का यह चुनाव अब झारखंड की राजनीति की दिशा तय करने वाला एक बड़ा मोड़ बन चुका है।