झारखंड की सियासत: सतह की शांति और नीचे का बवंडर  

Anand Kumar
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Anand Kumar

राजनीति में अक्सर सतह पर सब कुछ शांत और स्थिर नजर आता है, लेकिन नीचे गहरे बवंडर उठ रहे होते हैं। झारखंड की वर्तमान सियासत ठीक इसी स्थिति से गुजर रही है। बाहर से देखें तो मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के नेतृत्व वाला झामुमो-कांग्रेस-राजद महागठबंधन 56 विधायकों के साथ मजबूत दिख रहा है। संख्या बल सुरक्षित है, सरकार चल रही है, कोई तत्काल संकट नहीं। लेकिन भीतर ही भीतर कई नई राजनीतिक धाराएं उभर रही हैं, जो आने वाले समय में राज्य की सियासत को पूरी तरह बदल सकती हैं।

एक तरफ झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा (जेएलकेएम) के अध्यक्ष और डुमरी विधायक जयराम कुमार महतो ‘टाइगर जयराम’ के नाम से गैर-भाजपा, गैर-कांग्रेस तीसरे विकल्प की बात कर राजनीतिक हलचल मचा रहे हैं। दूसरी तरफ सत्तारूढ़ झामुमो अपनी क्षेत्रीय पहचान को राष्ट्रीय पटल पर ले जाने की जद्दोजहद में है।

वह असम में कांग्रेस से तालमेल तोड़कर अकेले 18 सीटों पर चुनाव लड़ रहा है। वहीं पड़ोसी पश्चिम बंगाल में वह रणनीतिक मौन साधे हुए है। इन तीनों घटनाक्रमों का गहरा विश्लेषण यह स्पष्ट करता है कि झारखंड की राजनीति एक बड़े संरचनात्मक बदलाव की दहलीज पर खड़ी है। यह बदलाव सिर्फ गठबंधन की स्थिरता को नहीं, बल्कि आने वाले राज्यसभा चुनाव, 2029 के लोकसभा चुनाव और आदिवासी-कुड़मी राजनीति के भविष्य को भी प्रभावित करेगा।

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जयराम महतो: युवा चेहरा या भविष्य का किंगमेकर?

झारखंड की स्थापित पार्टियों की नींद उड़ाने वाला सबसे ताजा चेहरा है जयराम महतो। ‘टाइगर जयराम’ के नाम से मशहूर यह 31 वर्षीय नेता 2024 के विधानसभा चुनाव में डुमरी से जीतकर विधायक बने। उनकी पार्टी जेएलकेएम ने मात्र एक सीट जीती, लेकिन उन्होंने 71 सीटों पर लड़कर कम से कम 14 सीटों के नतीजे प्रभावित किए और ज्यादातर मामलों में महागठबंधन को फायदा पहुंचाया।

जयराम का दावा साहसिक है: राज्यसभा चुनाव के बाद झारखंड में गैर-भाजपा, गैर-कांग्रेसी विकल्प उभर सकता है। कांग्रेस विधायक नमन बिक्सल कोंगाड़ी ने इसे ‘भगवान वाली भविष्यवाणी’ कहकर तीखा हमला बोला, लेकिन यह बयान महज शोर नहीं। जयराम ने 1932 के खतियान, स्थानीय भाषा-संस्कृति की रक्षा और ‘बाहरी’ ताकतों के खिलाफ जो आंदोलन छेड़ा, उसने युवा और ग्रामीण झारखंड की नब्ज पकड़ ली है। कुड़मी समुदाय के बड़े नेता के रूप में उन्होंने स्थानीय पहचान की राजनीति को नया आयाम दिया।

विश्लेषकों का मानना है कि उनकी रणनीति सिर्फ बयानों तक सीमित नहीं। वे धीरे-धीरे एक तीसरा मोर्चा तैयार कर रहे हैं, जो भविष्य में किसी भी गठबंधन के लिए ‘किंगमेकर’ साबित हो सकता है। अगर महागठबंधन के भीतर छोटी-छोटी दरारें गहरी हुईं।  खासकर असम वाले गठबंधन टूटने के बाद। तो जयराम समर्थकों के साथ विचार-विमर्श कर किसी बड़े फैसले पर पहुंच सकते हैं।

उन्होंने पहले ही संकेत दे दिया है कि अगर उन्हें मंत्री बनाने का प्रस्ताव आया तो वे अपने समर्थकों से चर्चा कर फैसला लेंगे। यह एक संकेत है कि वे अब महागठबंधन के अंदर भी ‘बाहरी’ विकल्प के रूप में खुद को स्थापित कर चुके हैं।

असम में झामुमो की दावेदारी और विस्तार का गणित

झामुमो का सबसे आक्रामक कदम असम की ओर है। 9 अप्रैल 2026 को होने वाले असम विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के नेतृत्व वाली पार्टी ने कांग्रेस से तालमेल तोड़कर 21 सीटों पर उम्मीदवार उतार दिए। नामांकन की जांच में तीन रद्द होने के बाद अब 18 सीटों पर अकेले लड़ाई है। इसके पीछे का गणित स्पष्ट है।

असम के चाय बागानों में करीब 70 लाख आदिवासी (संथाली, मुंडा, उरांव) बसे हुए हैं, जिनकी सांस्कृतिक और पैदाइशी जड़ें झारखंड से गहराई से जुड़ी हैं। दशकों से ये वोट बैंक रहे, लेकिन राजनीतिक प्रतिनिधित्व नहीं मिला। झामुमो इन्हें अपना विस्तार का आधार बना रहा है। एक वरिष्ठ झामुमो नेता ने कहा, “असम की बड़ी जनजातीय आबादी पार्टी के लिए सुनहरा अवसर है।”कांग्रेस के लिए यह दुःस्वप्न है।

असम कांग्रेस अध्यक्ष गौरव गोगोई खास रांची आए और हेमंत सोरेन से मिले। कांग्रेस ने 5-7 सीटें छोड़ने का प्रस्ताव भी रखा, लेकिन सहमति नहीं बनी। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता बंधु तिर्की ने चेताया कि असम की 38 आदिवासी बहुल सीटों पर वोट बंटने से सीधा फायदा भाजपा को होगा। असम में मुख्य विपक्षी भूमिका निभा रही कांग्रेस अब गैर-भाजपा वोटों के बिखराव से चिंतित है।

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बिहार का कटु अनुभव: क्यों नहीं मान रहा झामुमो कांग्रेस के वादे?

इस रस्साकशी के पीछे मनोवैज्ञानिक कारण भी है। बिहार विधानसभा चुनाव में झामुमो को महागठबंधन के अंदर आखिरी वक्त तक सीट का आश्वासन देकर इंतजार कराया गया, लेकिन अंत में एक भी सीट नहीं मिली। यह अपमान हेमंत सोरेन के जेहन में ताजा है। राजनीति में ऐसे जख्म जल्दी नहीं भरते। इसलिए असम में झामुमो ने कांग्रेस के किसी भी वादे पर अंधा भरोसा करने से इनकार कर दिया। पार्टी ने असम की जमीन पर मेहनत की है और उसे गठबंधन धर्म के नाम पर कुर्बान नहीं करना चाहती।

राज्यसभा चुनाव पर असर: गठबंधन बिखरने का खतरा

असम का यह फैसला झारखंड के घरेलू समीकरणों को भी हिला रहा है। अप्रैल-मई 2026 में राज्यसभा की दो सीटों के चुनाव होने हैं। कांग्रेस एक सीट का दावा कर रही है। अगर झामुमो दोनों सीटों पर दावा करता है तो माहौल दिलचस्प हो जाएगा। संख्या बल के हिसाब से झामुमो एक सीट आराम से जीत सकता है, लेकिन दूसरी के लिए उसे 22 अतिरिक्त वोटों की जरूरत पड़ेगी।

कांग्रेस के पास 16 विधायक हैं – उसे एक सीट के लिए 12 और समर्थन चाहिए। ऐसे में क्रॉस वोटिंग या विधायकों को अनुपस्थित कराने की रणनीति (जैसा बिहार में राजद के एडी सिंह के मामले में हुआ) भाजपा के लिए दरवाजा खोल सकती है। एनडीए के पास 24 विधायक हैं; उन्हें महज 4 वोट और चाहिए।

विधानसभा में स्थिति और नाजुक है। अगर कांग्रेस सरकार से बाहर भी जाती है तो हेमंत सोरेन को तत्काल बहुमत संकट नहीं। राजद के 4 और माले के 2 विधायकों को मिलाकर उनके पास 40 विधायक हैं – बहुमत (41) से सिर्फ एक कम। लेकिन गठबंधन की दरारें गहरी होने पर जयराम महतो जैसे नेता निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।

कांग्रेस की मजबूरी: सत्ता छोड़ने का जोखिम क्यों ले?

कांग्रेस के पास विकल्प सीमित हैं। हेमंत सरकार में उसके चार मंत्री हैं, बोर्ड-निगमों में उसके लोग एडजस्ट हैं। राज्यसभा की एक सीट के लिए क्या वह सब कुछ दांव पर लगाएगी? कांग्रेस की मजबूरी यही है कि फिलहाल हेमंत सोरेन के साथ बने रहना ही उसके हित में है।

इसलिए गैर-भाजपा, गैर-कांग्रेस सरकार की कोई तत्काल संभावना नजर नहीं आ रही। लेकिन असम का झटका गठबंधन की विश्वसनीयता पर सवाल जरूर उठा रहा है।

बंगाल में रणनीतिक मौन: संभावनाएं खुली रखना

असम में पत्ते खोलने के विपरीत पश्चिम बंगाल चुनाव को लेकर झामुमो चुप है। दिसंबर 2025 में ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी से अनौपचारिक बातचीत हुई थी। झाड़ग्राम, पुरुलिया, बांकुड़ा की 12 सीटों (जंगलमहल क्षेत्र) पर झामुमो की नजर है, जहां 2021 में टीएमसी को भाजपा के हाथों हार मिली थी।

महासचिव सुप्रियो भट्टाचार्य ने कहा था – ‘पूर्व-सहयोग के लिए खुले हैं’। लेकिन अब कोई आधिकारिक घोषणा नहीं। यह मौन संदेश है: झामुमो संभावनाएं खुली रखना चाहता है, बिना अपनी ताकत अनावश्यक बिखेरे।

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चौराहे पर झारखंड की राजनीति

झारखंड की राजनीति आज एक ऐसे चौराहे पर है जहां से राज्य के भविष्य की कई नई इबारतें लिखी जा रही हैं। महागठबंधन भले बहुमत के आंकड़ों पर टिका हो, लेकिन असम में टूटा तालमेल, राज्यसभा चुनाव का सस्पेंस, जयराम महतो का उभार और झामुमो का क्षेत्रीय विस्तार साबित कर रहे हैं कि भीतर बड़े बदलाव की हलचल तेज है।

असम में आक्रामकता, बंगाल में मौन और घरेलू मोर्चे पर तीसरे विकल्प की तैयारी – सब झामुमो की सोची-समझी रणनीति का हिस्सा हैं। हेमंत सोरेन का क्षेत्रीय विस्तार कांग्रेस के साथ घरेलू समीकरणों की कीमत पर तो नहीं चलेगा? क्या जयराम महतो की भविष्यवाणी हकीकत बनेगी? आने वाले अप्रैल-मई के राज्यसभा चुनाव इस बवंडर की पहली बड़ी परीक्षा होंगे।

झारखंड की सियासत अब सिर्फ स्थानीय मुद्दों तक सीमित नहीं रह गई। यह क्षेत्रीय महत्वाकांक्षा, गठबंधन की विश्वसनीयता और नए नेतृत्व के उभार का मिश्रण बन चुकी है। जो नेता इस बवंडर को समझेंगे और अपनी रणनीति उसके अनुसार ढालेंगे, वही आने वाले समय के किंगमेकर साबित होंगे। 

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वरिष्ठ पत्रकार आनंद कुमार करीब 30 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। उन्होंने एम.ए. (इतिहास), बैचलर ऑफ जर्नलिज्म और एमबीए (मार्केटिंग) की शिक्षा प्राप्त की है। 1996 में 'प्रभात खबर', रांची से बतौर प्रशिक्षु पत्रकार करियर की शुरुआत करके 'हिन्दुस्तान' और 'अमर उजाला' जैसे राष्ट्रीय समाचार पत्रों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल चुके आनंद कुमार हिन्दुस्तान, जमशेदपुर के स्थानीय संपादक भी रहे हैं। इसके अलावा The Photon News अखबार सहित Lagatar.in तथा Newswing.com जैसे डिजिटल माध्यमों में संपादक पद का दायित्व संभाल चुके हैं। इसके अलावा आनंद कुमार कॉरपोरेट कम्यूनिकेशन/जनसंपर्क, प्रबंधन, सरकार/प्रशासन और मीडिया शिक्षण का भी गहन अनुभव रखते हैं। उन्होंने सरयू राय - एक नाम कई आयाम' नामक पुस्तक का संपादन भी किया है।
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