New Delhi : महज पांच साल पहले तक दिल्ली के अरविंदर खुराना की गिनती राजधानी के सफल मोबाइल रिटेलर्स में होती थी। 1996 में एक छोटी सी शुरुआत करने वाले खुराना के पास 2014 तक 12 दुकानों का नेटवर्क और 100 से ज्यादा कर्मचारियों का लवाजमा था। सालाना 28 करोड़ का टर्नओवर रखने वाले खुराना को अंदाजा नहीं था कि तीन दशक की उनकी मेहनत को तकनीक की एक लहर बहा ले जाएगी।
आज अरविंदर की सारी मोबाइल दुकानें बंद हो चुकी हैं। वे कहते हैं, “ऑनलाइन और क्विक कॉमर्स ने हमारी कमर तोड़ दी। मुनाफे की जगह घाटा इतना बढ़ा कि ताला लटकाने के अलावा कोई चारा नहीं बचा।” यह सिर्फ खुराना की कहानी नहीं है, यह देश के उन 10 लाख किराना और रिटेल दुकानदारों की हकीकत है जो पिछले कुछ वर्षों में अपनी रोजी-रोटी खो चुके हैं।
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10 मिनट की ‘जादुई’ डिलीवरी या मानवाधिकारों का उल्लंघन?
कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (CAIT) के महासचिव और सांसद प्रवीण खंडेलवाल इस ‘फास्ट डिलीवरी’ कल्चर पर गंभीर सवाल उठाते हैं। वे इसे चमत्कार नहीं, बल्कि ‘मानवाधिकारों का उल्लंघन’ करार देते हैं। खंडेलवाल के मुताबिक, “जब तक बैकएंड में श्रमिकों पर अमानवीय दबाव न हो, तब तक 10 मिनट में डिलीवरी संभव ही नहीं। ई-कॉमर्स और क्विक कॉमर्स कंपनियाँ एफडीआई नियमों की धज्जियाँ उड़ाकर बाजार पर कब्जा कर रही हैं।”
डेटा का मायाजाल: अब ‘ग्राहक’ राजा नहीं, एल्गोरिदम का ‘गुलाम’ है
अक्सर कहा जाता है कि ग्राहक बाजार का राजा है, लेकिन ऑल इंडिया कंज्यूमर प्रोडक्ट्स डिस्ट्रिब्यूटर्स फेडरेशन के अध्यक्ष धैर्यशील एच. पाटील की राय जुदा है। वे बताते हैं कि कैसे एआई और एल्गोरिद्म का इस्तेमाल करके ग्राहकों के साथ ‘डिजिटल भेदभाव’ किया जा रहा है:
- डिवाइस आधारित लूट: अगर आप iPhone से ऑर्डर कर रहे हैं, तो मुमकिन है कि एल्गोरिदम आपको अमीर मानकर ऊंची कीमतें दिखाए।
- डायनामिक प्राइसिंग: आपकी लोकेशन और जरूरत (Urgency) के हिसाब से कीमतें बदल दी जाती हैं। पॉश कॉलोनियों के लिए अलग रेट और सामान्य के लिए अलग।
- प्रेफर्ड सेलर का खेल: सर्च रिजल्ट में केवल उन्हीं सेलर्स को दिखाया जाता है जिनसे इन कंपनियों की साठगांठ है।
डार्क स्टोर्स: मोहल्लों के बीच छिपे ‘अदृश्य दुश्मन’
क्विक कॉमर्स का असली हथियार हैं – डार्क स्टोर्स। ये वे गुप्त गोदाम हैं जो आपके घर के पास की गलियों में खुल रहे हैं। एचएसबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक, 2026 तक भारत में इनकी संख्या 5,500 पार कर जाएगी। ये स्टोर्स सीधे कंपनियों से माल मंगाते हैं और स्थानीय दुकानदार का 25-30% बिजनेस छीन चुके हैं।
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भारी डिस्काउंट का खेल
क्विक कॉमर्स कंपनियां कई बार ऐसे डिस्काउंट देती हैं जिन्हें देखकर छोटे दुकानदार हैरान रह जाते हैं। कई उत्पादों पर 20–30 फीसदी तक की छूट मिलती है। कभी-कभी स्टॉक खत्म करने के लिए 70–80 फीसदी तक डिस्काउंट भी दिखाई देता है। छोटे दुकानदारों का सवाल है – जब रिटेल मार्जिन इतना नहीं है, तो यह छूट आखिर आती कहां से है?
उनका आरोप है कि बड़ी कंपनियां बाजार पर कब्जा करने के लिए घाटे में बेचने की रणनीति अपनाती हैं।
क्या बैंकों की भी है मिलीभगत?
रिटेलर्स का आरोप है कि बैंकिंग सिस्टम भी उनके साथ सौतेला व्यवहार कर रहा है। मोबाइल रिटेलर्स एसोसिएशन के चेयरमैन कैलाश लख्यानी सवाल उठाते हैं कि ऑनलाइन पेमेंट पर मिलने वाला भारी डिस्काउंट और कैशबैक ऑफलाइन दुकानों को क्यों नहीं मिलता? वे इसे ‘लेवल प्लेइंग फील्ड’ की हत्या मानते हैं।
सुविधा की कीमत
क्विक कॉमर्स ने उपभोक्ताओं को निश्चित रूप से नई सुविधा दी है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह सुविधा भारत के पारंपरिक बाजार की कीमत पर आ रही है? अगर यही रफ्तार जारी रही, तो आने वाले समय में शहरों की गलियों में छोटी किराना दुकानें धीरे-धीरे इतिहास बन सकती हैं। और तब सवाल सिर्फ कारोबार का नहीं होगा। यह भारत के स्थानीय बाजार, रोजगार और आर्थिक संतुलन का भी होगा।
भविष्य की भयावह तस्वीर
आंकड़े बताते हैं कि देश में लगभग 1.30 करोड़ किराना दुकानें हैं, जिनमें से 45 लाख दुकानें अगले पांच साल में बंद हो सकती हैं। सरकार ने ‘डार्क पैटर्न’ को लेकर गाइडलाइंस तो जारी की हैं, लेकिन व्यापारियों का मानना है कि जब तक सख्त दंडात्मक प्रावधान और एक स्वतंत्र रेगुलेटर (जैसे SEBI या TRAI) नहीं होगा, तब तक छोटे व्यापारियों को बचाना मुमकिन नहीं होगा।
जन-मन की बात की राय: तकनीक सुविधा लेकर आती है, लेकिन अगर वह सुविधा लाखों घरों के चूल्हे बुझा दे, तो उस पर विचार करना जरूरी है। क्या हम 10 मिनट में ब्रेड मंगाने की सहूलियत के लिए अपने उस पड़ोसी दुकानदार को खोने को तैयार हैं जो आधी रात को जरूरत पड़ने पर बिना पैसों के भी सामान दे देता था? फैसला आपका है।
साभार: यह रिपोर्ट इंडिया टुडे.कॉम के इनपुट्स पर आधारित है।