Jharkhand Kurmi Politics: पश्चिम बंगाल के पुरुलिया में 20 सितंबर को आयोजित कुड़मी समाज के करम महाजुटान ने झारखंड की राजनीति में भी नई बहस छेड़ दी है। मंच पर पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के साथ आजसू प्रमुख सुदेश महतो की मौजूदगी और कुड़मी समाज से जुड़े कई बड़े ऐलान महत्वपूर्ण राजनीतिक संकेत के रूप में देखे जा रहे हैं। दूसरी ओर, उसी दिन डुमरी में विधायक जयराम महतो की सभा और पुरुलिया कार्यक्रम को लेकर उनकी आपत्ति ने कुड़मी राजनीति में नेतृत्व की प्रतिस्पर्धा को और स्पष्ट कर दिया है।
- पुरुलिया में क्या हुआ?
- सुदेश महतो की मौजूदगी क्यों महत्वपूर्ण?
- भाजपा के लिए सुदेश महतो क्यों महत्वपूर्ण हैं?
- जयराम महतो ने बदला समीकरण
- पुरुलिया के मंच से जयराम को संदेश?
- क्या भाजपा सुदेश महतो को फिर बड़ा कुड़मी चेहरा बनाना चाहती है?
- जयराम महतो के सामने चुनौती क्यों बड़ी है?
- ST दर्जे का मुद्दा सबसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा
- बंगाल की घोषणाओं का झारखंड पर असर
- असली लड़ाई सिर्फ वोट की नहीं, नेतृत्व की है
- पुरुलिया का महाजुटान क्यों महत्वपूर्ण है?
सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या भाजपा झारखंड में सुदेश महतो को फिर से एक बड़े कुड़मी चेहरे के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रही है? और क्या जयराम महतो इस रणनीति के सामने सबसे बड़ी चुनौती बन रहे हैं?
पुरुलिया में क्या हुआ?
पुरुलिया के करम महाजुटान में शुभेंदु अधिकारी ने कुड़मी समाज से जुड़े कई महत्वपूर्ण घोषणाएं कीं। उन्होंने आंदोलन के दौरान दर्ज मुकदमों को वापस लेने की बात कही, कुड़मी विकास बोर्ड को फिर सक्रिय करने का आश्वासन दिया और इस साल कुड़मी समाज के विकास के लिए 50 करोड़ रुपये के प्रावधान की बात कही।
इसके अलावा कुड़माली और राजबंशी भाषाओं को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कराने की दिशा में प्रयास करने की बात भी कही गई। UCC से कुड़मी समाज को बाहर रखने का आश्वासन भी दिया गया।
यानी एक ही मंच से पहचान, भाषा, संस्कृति, विकास और राजनीतिक अधिकार—इन सभी मुद्दों को संबोधित किया गया।
यहीं से इस आयोजन का झारखंड कनेक्शन महत्वपूर्ण हो जाता है।
कुड़मी समाज की सामाजिक मौजूदगी पश्चिम बंगाल के अलावा झारखंड और ओडिशा में भी है। इसलिए पुरुलिया में होने वाली कुड़मी राजनीति का असर झारखंड के राजनीतिक विमर्श पर पड़ना स्वाभाविक है। आपकी मूल स्क्रिप्ट भी इसी अंतरराज्यीय कनेक्शन को इस घटनाक्रम का महत्वपूर्ण पहलू मानती है।
सुदेश महतो की मौजूदगी क्यों महत्वपूर्ण?
पुरुलिया के कार्यक्रम में सुदेश महतो की मौजूदगी को अलग से देखने की जरूरत है।
क्योंकि महाजुटान से महज नौ दिन पहले, 11 सितंबर 2026 को सुदेश महतो ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात की थी। इस दौरान उन्होंने कुड़मी समाज को ST दर्जा देने की मांग उठाई। साथ ही कुड़माली, कुड़ुख और मुंडारी सहित भाषाओं को आठवीं अनुसूची में शामिल करने का मुद्दा भी रखा।
इसलिए राजनीतिक घटनाक्रम का क्रम ध्यान देने लायक है—
11 सितंबर — अमित शाह से मुलाकात।
20 सितंबर — पुरुलिया के बड़े कुड़मी महाजुटान में सुदेश महतो की प्रमुख मौजूदगी।
क्या यह सिर्फ संयोग है?
या फिर कुड़मी मुद्दों को राष्ट्रीय राजनीति से जोड़ने की कोई व्यापक रणनीति आकार ले रही है?
यही वह सवाल है, जो अब झारखंड की राजनीति में चर्चा का विषय बन गया है।
भाजपा के लिए सुदेश महतो क्यों महत्वपूर्ण हैं?
सुदेश महतो लंबे समय से NDA के सहयोगी रहे हैं और झारखंड की कुड़मी राजनीति में उनका पुराना राजनीतिक आधार है।
लेकिन 2024 के विधानसभा चुनाव ने उनकी स्थिति की दूसरी तस्वीर भी दिखाई।
सिल्ली में सुदेश महतो को 49,302 वोट मिले, जबकि JMM के अमित कुमार को 73,169 वोट मिले। सुदेश 23,867 वोट से चुनाव हार गए। उसी चुनाव में JLKM के देवेंद्र नाथ महतो को भी 41,725 वोट मिले।
यानी कुड़मी बहुल राजनीति में अब मुकाबला पहले जैसा सीधा नहीं रहा।
सुदेश के पास अनुभव, संगठन और NDA से राजनीतिक संबंध हैं।
लेकिन दूसरी तरफ एक नया चेहरा उभरा है—
जयराम महतो।
जयराम महतो ने बदला समीकरण
2024 के विधानसभा चुनाव में जयराम महतो ने डुमरी से 94,496 वोट हासिल कर जीत दर्ज की। JMM की बेबी देवी को 83,551 और AJSU की यशोदा देवी को 35,890 वोट मिले। जयराम की जीत का अंतर 10,945 वोट रहा।
लेकिन जयराम का प्रभाव केवल डुमरी तक सीमित नहीं रहा।
उनकी पार्टी JLKM ने 2024 के झारखंड विधानसभा चुनाव में करीब 6.20 प्रतिशत वोट हासिल किए और 68 सीटों पर चुनाव लड़ा। AJSU का वोट शेयर करीब 3.54 प्रतिशत रहा और पार्टी को एक सीट मिली।
इससे एक बात स्पष्ट हुई—
झारखंड की कुड़मी राजनीति अब सिर्फ सुदेश महतो के इर्द-गिर्द नहीं घूमती।
जयराम महतो ने एक स्वतंत्र राजनीतिक स्पेस तैयार किया है।
पुरुलिया के मंच से जयराम को संदेश?
जयराम महतो ने पुरुलिया महाजुटान से दूरी बनाई और कार्यक्रम के पीछे भाजपा तथा केंद्र के राजनीतिक हस्तक्षेप का आरोप लगाया।
इसके बाद पुरुलिया के मंच से बिना नाम लिए झारखंड के उन “नए नेताओं” पर निशाना साधा गया, जो आयोजन को भाजपा से जोड़कर सवाल उठा रहे थे। आपकी स्क्रिप्ट में इसे जयराम महतो की ओर संकेत के रूप में पढ़ा गया है।
यहीं से मामला केवल एक आयोजन का नहीं रह जाता।
यह सवाल बन जाता है—
कुड़मी समाज की राजनीतिक आवाज किसके हाथ में होगी?
एक तरफ स्थापित राजनीतिक नेतृत्व है।
दूसरी तरफ आंदोलन से निकला नया युवा नेतृत्व।
एक तरफ सत्ता के साथ रहकर मांगों को आगे बढ़ाने की राजनीति है।
दूसरी तरफ सत्ता पर दबाव बनाने वाली स्वतंत्र राजनीति।
क्या भाजपा सुदेश महतो को फिर बड़ा कुड़मी चेहरा बनाना चाहती है?
यह सवाल अब इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि घटनाओं का क्रम एक खास राजनीतिक संकेत देता है।
सुदेश महतो की अमित शाह से मुलाकात में ST दर्जा और भाषा का मुद्दा।
इसके कुछ दिन बाद पुरुलिया के बड़े कुड़मी मंच पर उनकी मौजूदगी।
और उसी मंच से कुड़मी समाज से जुड़े कई बड़े ऐलान।
इन घटनाओं को जोड़कर देखें तो सुदेश महतो को कुड़मी मुद्दों की राष्ट्रीय राजनीति से जोड़ने की कोशिश की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
लेकिन इसे अभी भाजपा की घोषित रणनीति कहना जल्दबाजी होगी।
ज्यादा सटीक सवाल यह है—
क्या भाजपा सुदेश महतो को फिर से कुड़मी समाज के बीच राजनीतिक रूप से प्रासंगिक बनाने के लिए बड़ा मंच दे रही है?
इस संभावना के पक्ष में राजनीतिक घटनाओं का क्रम जरूर मौजूद है।
लेकिन अंतिम जवाब जमीन की राजनीति और आने वाले चुनावों से ही मिलेगा।
जयराम महतो के सामने चुनौती क्यों बड़ी है?
जयराम महतो की राजनीति का सबसे बड़ा आधार उनकी स्वतंत्र पहचान है।
वह किसी बड़े दल के गठबंधन के बजाय आंदोलन और युवा नेतृत्व की राजनीति को अपनी पहचान के रूप में प्रस्तुत करते हैं।
इसलिए यदि भाजपा सुदेश महतो को कुड़मी राजनीति में आगे करती है, तो जयराम इसे अपने राजनीतिक स्पेस के सामने चुनौती के रूप में पेश कर सकते हैं।
और यहां 2024 के चुनाव के आंकड़े उनके लिए महत्वपूर्ण राजनीतिक पूंजी हैं।
डुमरी की जीत ने उन्हें विधानसभा में पहुंचाया।
JLKM के 6.20 प्रतिशत वोट ने राज्यव्यापी उपस्थिति का संकेत दिया।
इसलिए जयराम को सिर्फ “एक विधानसभा क्षेत्र का नेता” मानना 2024 के चुनावी आंकड़ों को छोटा करके देखने जैसा होगा।
ST दर्जे का मुद्दा सबसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा
कुड़मी समाज की ST दर्जे की मांग लंबे समय से चली आ रही है।
लेकिन यह सिर्फ राजनीतिक घोषणा का विषय नहीं है। अनुसूचित जनजाति सूची में बदलाव के लिए निर्धारित संवैधानिक और प्रशासनिक प्रक्रिया होती है।
यही वजह है कि इस मुद्दे पर राजनीतिक दावे जितने बड़े होंगे, उतना ही बड़ा सवाल होगा—
दावा क्या है और डिलीवरी क्या है?
इस मुद्दे का दूसरा पहलू भी है।
कई आदिवासी संगठन कुड़मियों को ST सूची में शामिल किए जाने का विरोध करते रहे हैं। उनका तर्क है कि इससे मौजूदा ST आरक्षण और अधिकारों पर असर पड़ सकता है।
इसलिए ST दर्जे का सवाल केवल कुड़मी बनाम सरकार का मामला नहीं है।
यह झारखंड में अलग-अलग सामाजिक समूहों के बीच अधिकारों और प्रतिनिधित्व से जुड़ा संवेदनशील प्रश्न भी है।
बंगाल की घोषणाओं का झारखंड पर असर
पुरुलिया में हुए ऐलान का सबसे बड़ा राजनीतिक असर शायद झारखंड में दिखाई दे सकता है।
कुड़मी मतदाता यह सवाल उठा सकते हैं कि अगर बंगाल में विकास बोर्ड, मुकदमे वापस लेने और भाषा को संवैधानिक मान्यता दिलाने की पहल हो सकती है, तो झारखंड में क्या हो रहा है?
इससे झारखंड की सत्ताधारी JMM पर भी दबाव बढ़ सकता है।
अगर भाजपा-NDA कुड़मी मुद्दों पर ज्यादा सक्रिय दिखाई देता है, तो JMM को भी इस सामाजिक समूह के प्रति अपनी राजनीतिक स्थिति और स्पष्ट करनी पड़ सकती है।
दूसरी ओर, अगर बंगाल की घोषणाएं जमीन पर ठोस परिणाम में नहीं बदलतीं, तो जयराम महतो जैसे नेताओं को यह कहने का राजनीतिक अवसर मिलेगा कि घोषणाएं और वास्तविक डिलीवरी अलग-अलग चीजें हैं।
असली लड़ाई सिर्फ वोट की नहीं, नेतृत्व की है
यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है।
कुड़मी राजनीति में अब तीन अलग-अलग प्रवृत्तियां दिखाई देती हैं—
पहली — पारंपरिक राजनीतिक नेतृत्व।
सुदेश महतो जैसे नेताओं के पास लंबा राजनीतिक अनुभव, संगठन और बड़े दलों के साथ राजनीतिक संपर्क है।
दूसरी — स्वतंत्र युवा नेतृत्व।
जयराम महतो आंदोलन और युवा राजनीति के जरिए अपना अलग आधार बना रहे हैं।
तीसरी — बड़े राजनीतिक दलों की रणनीति।
भाजपा, JMM और दूसरे दल कुड़मी समाज के मुद्दों को अपने व्यापक राजनीतिक समीकरण में कैसे जगह देते हैं, यह आने वाले समय में महत्वपूर्ण होगा।
इसलिए कुड़मी राजनीति अब केवल “किसे वोट मिलेगा?” का सवाल नहीं है।
यह सवाल भी है—
“कुड़मी समाज की राजनीतिक दिशा कौन तय करेगा?”
पुरुलिया का महाजुटान क्यों महत्वपूर्ण है?
20 सितंबर की तस्वीर में दो समानांतर राजनीतिक घटनाएं दिखाई देती हैं।
एक तरफ पुरुलिया में सुदेश महतो के साथ बड़ा कुड़मी महाजुटान।
दूसरी तरफ उसी दिन झारखंड में जयराम महतो की अपनी सभा और पुरुलिया आयोजन पर सवाल।
यानी एक तरफ सत्ता और संगठन के करीब खड़ा पारंपरिक नेतृत्व।
दूसरी तरफ स्वतंत्र आंदोलन और युवा राजनीति का चेहरा।
इसीलिए पुरुलिया का महाजुटान केवल बंगाल की घटना नहीं है।
यह झारखंड की कुड़मी राजनीति में नेतृत्व की नई प्रतिस्पर्धा का संकेत भी माना जा सकता है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है—
क्या भाजपा सुदेश महतो को आगे करके झारखंड की कुड़मी राजनीति में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है?
या फिर…
जयराम महतो का स्वतंत्र राजनीतिक उभार इस रणनीति को चुनौती देगा?
फिलहाल तस्वीर पूरी तरह साफ नहीं है।
लेकिन इतना जरूर है कि झारखंड की कुड़मी राजनीति अब एक नए चरण में प्रवेश कर चुकी है, जहां पुराने राजनीतिक संगठन और नए आंदोलनकारी नेतृत्व के बीच प्रतिस्पर्धा पहले से ज्यादा स्पष्ट दिखाई दे रही है।
यह भी पढ़ें – 26 साल बाद झारखंड के सामने आखिरी सवाल: खनिज संपदा को मानव संपदा में बदल पाया राज्य?