रांची में 40 साल पुरानी जलमीनार तोड़ते समय हादसा, मलबे में दबकर दो मजदूरों की मौत

Jan Man Ki Baat
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रांची: जिला स्कूल परिसर में बुधवार शाम करीब 5:40 बजे एक दर्दनाक हादसा हो गया। करीब 40 साल पुरानी पानी की टंकी को तोड़ने के दौरान जलमीनार अचानक भरभराकर गिर गई। मलबे में दबने से पलामू के दो मजदूरों की मौत हो गई।

मृतकों की पहचान सत्या भुईंया (26) और मैथिली शरण महतो (45) के रूप में हुई है। सत्या का शव हादसे के करीब एक घंटे बाद निकाल लिया गया, जबकि मलबे में बुरी तरह दबे मैथिली शरण का शव रात 10:50 बजे एनडीआरएफ की टीम ने निकाला।

हादसे के बाद पेयजल विभाग के रांची के अधीक्षण अभियंता विजय कुमार अडवीन ने कार्यपालक अभियंता को पूरे मामले की जांच करने का निर्देश दिया है।

सुरक्षा के निर्देश थे, फिर भी बरती गई लापरवाही

पुरानी जलमीनार को तोड़ने का काम पेयजल विभाग ने मां कृपा डेवलपर्स एजेंसी को सौंपा था। खास बात यह है कि विभाग के स्वर्णरेखा वितरण प्रमंडल बूटी के कार्यपालक अभियंता ने 22 अगस्त को एजेंसी को पत्र लिखकर सुरक्षा मानकों का पालन करने का निर्देश दिया था।

पत्र में स्पष्ट रूप से कहा गया था कि काम शुरू करने से पहले कोतवाली थाना और जिला स्कूल प्रशासन से समन्वय किया जाए। आसपास के लोगों को जलमीनार ध्वस्त किए जाने की सूचना दी जाए और 150 फीट के दायरे में लोगों को जाने से रोकने के लिए जगह-जगह चेतावनी बोर्ड लगाए जाएं।

इसके बावजूद मौके पर सुरक्षा व्यवस्था आधी-अधूरी नजर आई। जलमीनार के पास लगाए गए बोर्ड पर कार्यपालक अभियंता, साइट इंजीनियर, कॉन्ट्रैक्टर प्रतिनिधि और पुलिस स्टेशन का नंबर दिया गया था, लेकिन पुलिस का मोबाइल नंबर भी पूरा नहीं लिखा गया था। शुरुआती चार अंकों के बाद क्रॉस का निशान लगा था। केवल एंबुलेंस का 108 नंबर पूरी तरह दर्ज था।

पांच में से दो पिलर टूटे और भरभराकर गिर गई जलमीनार

हादसे के समय जलमीनार पर दो मजदूर काम कर रहे थे, जबकि दो मजदूर नीचे मौजूद थे। बताया गया कि पांच पिलर में से दो पिलर टूट गए। इसके बाद अचानक पूरी संरचना असंतुलित हो गई और तेज आवाज के साथ जलमीनार भरभराकर नीचे आ गिरी।

प्रत्यक्षदर्शी बाइक मिस्त्री इरफान आलम के अनुसार, जलमीनार गिरने के बाद करीब 10 मिनट तक पूरा इलाका धुएं और धूल से भर गया था। ऊपर काम कर रहे दोनों मजदूर मलबे में दब गए।

घटना की सूचना मिलते ही रांची नगर निगम की टीम और कोतवाली थाने की पुलिस मौके पर पहुंची। करीब 10 मिनट के भीतर रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू कर दिया गया। दो जेसीबी और मजदूरों की मदद से मलबा हटाने का काम शुरू हुआ। बाद में एनडीआरएफ की टीम ने भी रेस्क्यू अभियान में हिस्सा लिया।

पहली लाश एक घंटे में निकली, दूसरी के लिए पांच घंटे चला रेस्क्यू

हादसे के करीब एक घंटे बाद सत्या भुईंया का शव मलबे से निकाल लिया गया और उसे रिम्स भेजा गया। लेकिन मैथिली शरण महतो मलबे में इस तरह दबे थे कि उन्हें निकालने में कई घंटे लग गए।

एनडीआरएफ की टीम ने करीब पांच घंटे की मशक्कत के बाद रात 10:50 बजे उनका शव बाहर निकाला।

दो मजदूरों की मौत से घटनास्थल पर मातम पसर गया। हादसे ने जलमीनार तोड़ने के दौरान अपनाए गए सुरक्षा इंतजामों पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

जलमीनार मजदूरों

स्ट्रक्चर सेफ्टी ऑडिट के बिना तोड़ी जा रही थी जलमीनार?

पुरानी और जर्जर संरचना को तोड़ना भी बेहद जोखिम भरा काम होता है। किसी भी ऐसी संरचना को ध्वस्त करने से पहले यह आकलन जरूरी होता है कि उसका कौन सा हिस्सा किस दिशा में गिर सकता है और मजदूरों को किस सुरक्षित दूरी पर रखा जाना चाहिए।

इसके लिए सामान्य तौर पर स्ट्रक्चर सेफ्टी ऑडिट और डिमोलिशन प्लान तैयार किया जाता है। अनुभवी इंजीनियर की निगरानी में यह तय किया जाता है कि संरचना को किस क्रम में तोड़ा जाए।

आरोप है कि कोतवाली थाना के पीछे स्थित इस पुरानी जलमीनार को तोड़ने से पहले किसी तरह का स्ट्रक्चर सेफ्टी ऑडिट नहीं कराया गया। ठेका लेने के बाद एजेंसी ने मजदूरों से काम शुरू करा दिया।

अब जांच में यह स्पष्ट होना बाकी है कि जलमीनार तोड़ने से पहले सुरक्षा और तकनीकी मानकों का कितना पालन किया गया था और किस स्तर पर लापरवाही हुई।

3 लाख गैलन की नई जलमीनार बनाने की थी योजना

कोतवाली थाना के पीछे स्थित यह जलमीनार काफी पुरानी थी और इसकी क्षमता करीब एक लाख गैलन बताई गई है। पुरानी जलमीनार को हटाकर उसकी जगह करीब तीन लाख गैलन क्षमता की नई जलमीनार बनाई जानी थी।

इसी के लिए पुरानी संरचना को ध्वस्त करने का काम मां कृपा डेवलपर्स को दिया गया था।

हादसे के बाद एजेंसी संचालक का फोन बंद

हादसे के बाद निर्माण एजेंसी के संचालक अनिल कुमार गुप्ता से संपर्क करने की कोशिश की गई, लेकिन देर रात तक उनका मोबाइल बंद मिला।

एजेंसी के प्रतिनिधि संतोष कुमार विश्वकर्मा कुछ समय तक घटनास्थल पर मौजूद रहे। हालांकि मीडिया के सवालों के बीच वह वहां से चले गए और बाद में उनसे संपर्क नहीं हो सका।

अब पेयजल विभाग की जांच में यह सामने आना अहम होगा कि एजेंसी ने विभाग की ओर से जारी सुरक्षा निर्देशों का पालन क्यों नहीं किया और बिना पर्याप्त सुरक्षा इंतजाम के मजदूरों को जलमीनार पर काम करने की अनुमति कैसे दी गई।

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