सामाजिक न्याय की राजनीति और OBC/EBC समीकरण के केंद्र में एक नाम राम नाथ ठाकुर

Krishna Raj Shail
OBC Politics : उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के इस्तीफे के बाद देश में इस पद के लिए नये नामों पर मंथन शुरू हो गया है। ऐसे में राम नाथ ठाकुर का नाम एक बेहद सशक्त दावेदार के रूप में सामने आता है। वे न केवल सामाजिक न्याय की राजनीति की विरासत को आगे बढ़ाने वाले हैं, बल्कि प्रशासनिक अनुभव, संसदीय गंभीरता और राजनीतिक संतुलन का भी एक मजबूत प्रतीक हैं।
राम नाथ ठाकुर बिहार के वरिष्ठ नेता हैं। वे जनता दल यूनाइटेड (JDU) से राज्यसभा सांसद रहे हैं और वर्तमान में केंद्र सरकार में कृषि राज्य मंत्री हैं। इससे पहले वे लालू प्रसाद यादव के नेतृत्व वाली सरकार में भी मंत्री रह चुके हैं और नीतीश कुमार की 2005–2010 की सरकार में भी उन्होंने मंत्री पद संभाला था। उनके पास प्रशासनिक अनुभव का लंबा इतिहास है।
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राम नाथ ठाकुर का राजनीतिक मूल्य इस बात से और बढ़ जाता है कि वे प्रख्यात समाजवादी नेता और भारत रत्न से सम्मानित कर्पूरी ठाकुर के पुत्र हैं। कर्पूरी ठाकुर को सामाजिक न्याय के आधार पर राजनीति में बदलाव लाने वाला माना जाता है। 2024 लोकसभा चुनाव से पहले जब उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया, तब यह कदम सामाजिक और राजनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया। उसके तुरंत बाद राम नाथ ठाकुर को केंद्र सरकार में कृषि राज्य मंत्री बनाया गया, जिससे यह संकेत मिला कि भाजपा-जेडीयू गठबंधन उन्हें राष्ट्रीय राजनीति में अधिक बड़ी भूमिका देना चाहता है।
इस संदर्भ में यह भी समझना जरूरी है कि लालू प्रसाद यादव भले ही कभी सामाजिक न्याय के सबसे बड़े प्रतीक माने जाते थे, लेकिन अब वे अपने परिवार तक ही सीमित होकर रह गए हैं। राबड़ी देवी, तेजस्वी यादव, तेजप्रताप यादव और मीसा भारती सरीखे परिवारजन ही राजनीति में सक्रिय हैं, जबकि राम कृपाल यादव और हुकुमदेव नारायण यादव जैसे जनाधारित नेताओं ने उनका साथ छोड़ दिया। नीतीश कुमार भी जॉर्ज फर्नांडीस और शरद यादव जैसे सामाजिक न्याय के पुरोधाओं को एक-एक कर किनारे लगाने के बाद यहां तक पहुंचे हैं।
बिहार में सामाजिक न्याय की अवधारणा को मजबूत करने वाले मुंगेरी लाल आयोग की भूमिका को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। 1971 में गठित इस आयोग ने पिछड़ी जातियों को दो वर्गों — पिछड़ा (OBC) और अत्यंत पिछड़ा (EBC) — में बांटा था। 1978 में मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर ने इस आधार पर आरक्षण व्यवस्था लागू की, जिसमें पिछड़ा वर्ग को 8% और अत्यंत पिछड़ा वर्ग को 12% आरक्षण दिया गया। यह फैसला न केवल ऐतिहासिक था, बल्कि जातीय समीकरणों को गहराई से प्रभावित करने वाला भी साबित हुआ।
आज बिहार में अन्य पिछड़ा वर्ग की जनसंख्या लगभग 63% है, जिसमें 27% पिछड़ा और 36% अत्यंत पिछड़ा वर्ग शामिल है। यादव, कुर्मी और कुशवाहा तीन प्रमुख पिछड़ी जातियां हैं, जिनकी जनसंख्या क्रमशः 14%, 3% और 4% है। भाजपा जहां लव-कुश (कुर्मी–कोयरी) समीकरण और 15.5% सवर्णों के साथ मिलाकर एक मज़बूत 22.5% का कोर वोटबैंक साधने की कोशिश कर रही है, वहीं लालू यादव का यादव-मुस्लिम समीकरण 31.7% तक जाता है। ऐसे में 36% अति पिछड़ा वर्ग अगर भाजपा के साथ लामबंद हो जाता है, तो यह समीकरण NDA को निर्णायक बढ़त दे सकता है।
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यही वह स्थान है जहां कर्पूरी ठाकुर की विरासत और राम नाथ ठाकुर की स्वीकार्यता भाजपा और सहयोगी दलों के लिए महत्वपूर्ण हो जाती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ‘सबका साथ, सबका विकास’ की नीति को व्यवहारिक धरातल पर उतारने के लिए ऐसे नेताओं को तरजीह देते रहे हैं, जो जातीय प्रतिनिधित्व के साथ-साथ प्रशासनिक क्षमता भी रखते हों।
राम नाथ ठाकुर उस वर्ग से आते हैं, जिसकी ऐतिहासिक उपेक्षा हुई, लेकिन आज जिसकी राजनीतिक ताकत निर्णायक हो चुकी है। अगर भाजपा उन्हें उपराष्ट्रपति पद के लिए आगे बढ़ाती है, तो यह न केवल सामाजिक न्याय की दिशा में एक अहम कदम होगा, बल्कि आने वाले चुनावों में यह NDA के लिए बड़ा रणनीतिक लाभ भी हो सकता है।
इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो राम नाथ ठाकुर की उम्मीदवारी “मुंगेरी लाल के हसीन सपने” नहीं, बल्कि “मोदी है तो मुमकिन है” के यथार्थवादी दृष्टिकोण से काफी करीब दिखती है।
डिस्क्लेमर:
लेख में व्यक्त सभी विचार लेखक के निजी हैं। इनका उद्देश्य किसी की छवि को प्रभावित करना नहीं, बल्कि विषय पर विमर्श प्रस्तुत करना है।
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