New Delhi : केंद्र सरकार ने ‘केरल’ राज्य का नाम बदलकर ‘केरलम’ करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। यह निर्णय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) की अध्यक्षता में हुई केंद्रीय कैबिनेट की बैठक में लिया गया। केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव (Ashwini Vaishnaw) ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में इसकी औपचारिक घोषणा की।
यह फैसला ऐसे समय में आया है जब राज्य में आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारियां तेज हैं। राजनीतिक हलकों में इसे सांस्कृतिक पहचान और चुनावी रणनीति—दोनों के संदर्भ में देखा जा रहा है।
अब आगे क्या होगी संवैधानिक प्रक्रिया?
केंद्रीय कैबिनेट की मंजूरी के बाद अगला कदम संवैधानिक प्रक्रिया के तहत उठाया जाएगा। प्रस्तावित केरल (नाम में बदलाव) बिल, 2026 को राष्ट्रपति की अनुमति से राज्य विधानसभा के विचारार्थ भेजा जाएगा।
आर्टिकल 3 क्या कहता है?
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 3 (Article 3 of the Constitution of India) संसद को यह अधिकार देता है कि वह—
- किसी राज्य की सीमाओं में परिवर्तन कर सके
- नए राज्य का गठन कर सके
- या किसी राज्य का नाम बदल सके
हालांकि, इससे पहले संबंधित राज्य की विधानसभा से उसके विचार मांगे जाते हैं। अंतिम निर्णय संसद द्वारा ही लिया जाता है।
राज्य विधानसभा की राय प्राप्त होने के बाद केंद्र सरकार संसद में विधेयक पेश करेगी। इसके लिए राष्ट्रपति की सिफारिश आवश्यक होगी। संसद से पारित होने और राष्ट्रपति की स्वीकृति के बाद संविधान की पहली अनुसूची में आवश्यक संशोधन किया जाएगा।
केरल विधानसभा ने पहले ही पारित किया था प्रस्ताव
यह कदम अचानक नहीं है। केरल विधानसभा ने 24 जून 2024 को सर्वसम्मति से राज्य का नाम ‘केरल’ से ‘केरलम’ करने का प्रस्ताव पारित किया था। प्रस्ताव में कहा गया था कि मलयालम भाषा में राज्य का नाम ‘केरलम’ है और भाषा-आधारित राज्यों के गठन (1 नवंबर 1956) के ऐतिहासिक संदर्भ में यही नाम अधिक उपयुक्त है।
विधानसभा ने केंद्र से अपील की थी कि वह संविधान के प्रावधानों के तहत आवश्यक कार्रवाई करे और पहली अनुसूची में संशोधन कर राज्य का आधिकारिक नाम ‘केरलम’ दर्ज करे।
राजनीतिक और सांस्कृतिक महत्व
‘केरलम’ शब्द मलयालम भाषा की मूल अभिव्यक्ति है, जो राज्य की सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा है। राज्य में 1 नवंबर को मनाया जाने वाला ‘केरल पिरवी दिवस’ भी भाषा-आधारित पुनर्गठन की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से जुड़ा है।
विश्लेषकों का मानना है कि नाम परिवर्तन का यह निर्णय:
- क्षेत्रीय अस्मिता को सशक्त करने का संकेत है
- केंद्र और राज्य के बीच सहमति की प्रक्रिया को दर्शाता है
- चुनावी वर्ष में सांस्कृतिक विमर्श को केंद्र में ला सकता है
गृह मंत्रालय और विधि मंत्रालय की प्रक्रिया
मामले पर केंद्रीय गृह मंत्रालय में विचार-विमर्श हुआ। गृह मंत्री अमित शाह (Amit Shah) की मंजूरी के बाद ड्राफ्ट नोट कानून एवं न्याय मंत्रालय के विधायी विभाग को भेजा गया। विधि मंत्रालय ने प्रस्ताव पर सहमति दे दी है, जिसके बाद कैबिनेट ने इसे औपचारिक स्वीकृति प्रदान की।
आगे का परिदृश्य
अब नजरें संसद के आगामी सत्र पर टिकी हैं। यदि विधेयक संसद से पारित हो जाता है और राष्ट्रपति की स्वीकृति मिल जाती है, तो आधिकारिक दस्तावेजों, मानचित्रों और संवैधानिक अनुसूचियों में ‘केरल’ की जगह ‘केरलम’ दर्ज किया जाएगा।
नाम परिवर्तन की यह प्रक्रिया केवल औपचारिक नहीं, बल्कि ऐतिहासिक और राजनीतिक दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण मानी जा रही है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा राज्य और राष्ट्रीय राजनीति में चर्चा का केंद्र बना रह सकता है।