रांची, 8 अक्टूबर 2026: झारखंड में प्रतियोगी परीक्षाओं को लेकर चल रहा विवाद अब एक महत्वपूर्ण कानूनी सवाल पर आकर टिक गया है। क्या किसी परीक्षा में गड़बड़ी के आरोप सामने आने पर सरकार पूरी नियुक्ति प्रक्रिया रद्द कर सकती है? और क्या बिना किसी अभ्यर्थी का व्यक्तिगत दोष साबित हुए उसकी नौकरी समाप्त करना उचित है?
- सरकार के फैसले पर हाईकोर्ट ने क्यों उठाए सवाल?
- सरकार का तर्क: गड़बड़ियां गंभीर, दोषियों की पहचान मुश्किल
- निर्दोष अभ्यर्थियों की नौकरी क्यों जाए? याचिकाकर्ताओं की दलील
- 1932 और 2700 नियुक्तियों का क्या है मामला?
- छात्र आंदोलन के बाद सरकार ने रद्द की थीं परीक्षाएं
- अब हाईकोर्ट के फैसले पर टिकी हजारों अभ्यर्थियों की नजर
झारखंड हाईकोर्ट में बुधवार को JSSC CGL समेत विभिन्न नियुक्ति परीक्षाओं को रद्द करने के राज्य सरकार के फैसले पर हुई सुनवाई में यही सवाल प्रमुखता से सामने आए। न्यायमूर्ति दीपक रोशन की अदालत ने सरकार के निर्णय की वैधानिकता को लेकर गंभीर सवाल उठाए। अदालत की मौखिक टिप्पणी से यह सवाल भी उठा कि क्या नियुक्तियां रद्द करने का निर्णय छात्र आंदोलन के दबाव में लिया गया था।
सरकार के फैसले पर हाईकोर्ट ने क्यों उठाए सवाल?
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं और सीआईडी की जांच का हवाला देकर अपने निर्णय का बचाव किया।
हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि उसके सामने मुख्य मुद्दा जांच की प्रगति नहीं, बल्कि नियुक्तियां समाप्त करने वाले सरकारी आदेश की कानूनी वैधता है।
अदालत ने इस बात पर विशेष ध्यान दिया कि एक अधिसूचना के माध्यम से लगभग 2700 नियुक्तियों को प्रभावित करने का निर्णय किन परिस्थितियों में लिया गया और क्या इसके लिए आवश्यक प्रक्रियाओं का पालन हुआ।
सरकार की ओर से प्रस्तुत जवाब पर अदालत ने मौखिक रूप से टिप्पणी की कि निर्णय आंदोलन के दबाव में लिया गया प्रतीत होता है। हालांकि, यह अंतिम न्यायिक निष्कर्ष नहीं है।
सरकार का तर्क: गड़बड़ियां गंभीर, दोषियों की पहचान मुश्किल
राज्य सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मीनाक्षी अरोड़ा और महाधिवक्ता रोहिताश्य राय ने अदालत में अपना पक्ष रखा।
सरकार ने दलील दी कि विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में अनियमितताओं और आर्थिक लेन-देन से जुड़े गंभीर तथ्य जांच में सामने आए हैं। सरकारी पक्ष के अनुसार, संबंधित मामले में 28 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है।
सरकार का कहना था कि जांच अभी पूरी नहीं हुई है। ऐसे में अनियमितताओं से लाभ उठाने वाले अभ्यर्थियों और निष्पक्ष तरीके से सफल हुए उम्मीदवारों के बीच स्पष्ट अंतर करना फिलहाल चुनौतीपूर्ण है।
इसी आधार पर सरकार ने संबंधित परीक्षाओं और नियुक्ति प्रक्रियाओं को रद्द करने के अपने निर्णय को उचित बताया।
निर्दोष अभ्यर्थियों की नौकरी क्यों जाए? याचिकाकर्ताओं की दलील
सरकार के फैसले को चुनौती देने वाले अभ्यर्थियों की ओर से कहा गया कि परीक्षा में गड़बड़ी करने वाले व्यक्तियों की पहचान कर उनके खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए।
याचिकाकर्ताओं ने सवाल उठाया कि यदि कुछ लोगों पर अनियमितताओं में शामिल होने का संदेह है तो उसकी कीमत सभी सफल अभ्यर्थियों को क्यों चुकानी पड़े?
अभ्यर्थियों की ओर से पूर्व न्यायिक आदेशों का भी उल्लेख किया गया। उनका तर्क था कि जांच में दोषी पाए जाने वाले उम्मीदवारों के खिलाफ कार्रवाई का रास्ता खुला है। लेकिन केवल आशंका के आधार पर पूरी चयन प्रक्रिया समाप्त करना न्यायसंगत नहीं होगा।
याचिकाकर्ताओं ने सरकार के फैसले को पहले दिए गए न्यायिक निर्देशों के विपरीत भी बताया।
1932 और 2700 नियुक्तियों का क्या है मामला?
JSSC CGL विवाद में नियुक्तियों की संख्या को लेकर अलग-अलग आंकड़े सामने आए हैं।
अगस्त में प्रकाशित इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, JSSC CGL के माध्यम से 1932 अभ्यर्थियों की नियुक्ति हो चुकी थी।
वहीं, 7 अक्टूबर की सुनवाई से संबंधित समाचारों में लगभग 2700 नियुक्तियों को प्रभावित करने वाले सरकारी आदेश का उल्लेख किया गया है।
इसलिए 2700 के आंकड़े को केवल JSSC CGL की नियुक्तियों की संख्या बताना सही नहीं होगा। यह विवाद विभिन्न नियुक्ति प्रक्रियाओं से संबंधित है।
छात्र आंदोलन के बाद सरकार ने रद्द की थीं परीक्षाएं
झारखंड में प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित गड़बड़ियों को लेकर जुलाई और अगस्त में छात्रों ने लंबा आंदोलन चलाया था।
आंदोलनकारी अभ्यर्थियों की प्रमुख मांगों में निष्पक्ष जांच, दोषियों के खिलाफ कार्रवाई और विवादित परीक्षाओं को रद्द करना शामिल था।
इसके बाद अगस्त में हेमंत सोरेन सरकार ने JSSC CGL समेत कई प्रतियोगी परीक्षाओं और नियुक्ति प्रक्रियाओं को रद्द करने का निर्णय लिया।
सरकार के इस कदम से जहां आंदोलनरत अभ्यर्थियों की एक प्रमुख मांग पूरी हुई, वहीं पहले से नियुक्त उम्मीदवारों के सामने नौकरी बचाने का संकट पैदा हो गया।
प्रभावित अभ्यर्थियों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। अदालत ने 20 अगस्त को सरकार के आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी थी, जिससे नियुक्त कर्मचारियों को राहत मिली।
अब हाईकोर्ट के फैसले पर टिकी हजारों अभ्यर्थियों की नजर
बुधवार की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से जांच से संबंधित सीलबंद रिपोर्ट भी अदालत में प्रस्तुत की गई। मामले की सुनवाई गुरुवार, 8 अक्टूबर को भी जारी रहने की बात कही गई है।
अब महत्वपूर्ण सवाल यह है कि सरकार नियुक्तियां रद्द करने के अपने फैसले को कानूनी कसौटी पर कितना सही साबित कर पाती है।
यह मामला केवल JSSC CGL के चयनित उम्मीदवारों के भविष्य तक सीमित नहीं है। इसका असर राज्य की अन्य विवादित नियुक्ति प्रक्रियाओं पर भी पड़ सकता है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि परीक्षा व्यवस्था में गड़बड़ी की सजा क्या उन अभ्यर्थियों को भी मिलनी चाहिए, जिनके खिलाफ किसी अनियमितता में शामिल होने का आरोप साबित नहीं हुआ है?
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