होइहें सोई जो हेमंत रचि राखा! राज्यसभा चुनाव की पटकथा क्या पहले ही लिखी जा चुकी थी?

Anand Kumar
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झारखंड राज्यसभा चुनाव: क्या जो दिख रहा है, वह असली कहानी नहीं है?

आनंद कुमार

झारखंड में राज्यसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक बयानबाजी अपने चरम पर है। कांग्रेस, झामुमो और भाजपा के नेताओं के बयानों से ऐसा माहौल बनाया जा रहा है मानो हर दल अपनी-अपनी रणनीति के तहत जीत की पूरी तैयारी में जुटा हो। लेकिन राजनीति में अक्सर जो सबसे ज्यादा दिखाई देता है, वही सबसे कम सच होता है।

राज्यसभा चुनाव की मौजूदा तस्वीर को देखें तो ऐसा लगता है कि इसकी पटकथा बहुत पहले लिखी जा चुकी थी। असम और पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के दौरान ही पूर्वी भारत की राजनीति के कुछ बड़े समीकरण आकार लेने लगे थे। झारखंड उसी व्यापक राजनीतिक रणनीति का हिस्सा दिखाई देता है।

राजनीतिक बयानबाजी का उद्देश्य शायद वास्तविक तस्वीर को धुंधला करना था। ऐसा माहौल बनाया गया कि भाजपा और झामुमो एक-दूसरे के सबसे बड़े विरोधी हैं, जबकि कई घटनाक्रम संकेत देते हैं कि वास्तविक राजनीतिक गणित कहीं अधिक जटिल है। नतीजा यह हुआ कि राजनीतिक कार्यकर्ता, समर्थक, पत्रकार और विश्लेषक बयानबाजी के शोर में उलझे रहे, जबकि असली कहानी पर्दे के पीछे लिखी जाती रही।

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क्यों मुश्किल दिख रही है कांग्रेस की राह?

गणित कहता है कि महागठबंधन के पास 56 विधायक हैं और दो सीटों के लिए 56 वोट पर्याप्त हैं। लेकिन राजनीति केवल गणित नहीं होती।

कांग्रेस उम्मीदवार प्रणव झा का नाम सबसे पहले सामने आया। उन्होंने नामांकन पर्चा भी सबसे पहले खरीदा। लेकिन भारतीय राजनीति का इतिहास बताता है कि कतार में सबसे आगे खड़ा व्यक्ति हमेशा मंजिल तक सबसे पहले नहीं पहुंचता।

झारखंड में राज्यसभा चुनावों का इतिहास भी यही कहता है।

2012 का चुनाव: जब गठबंधन का उम्मीदवार हार गया था

अप्रैल 2012 का चुनाव झारखंड की राजनीति में आज भी मिसाल के तौर पर याद किया जाता है।

उस समय भाजपा-झामुमो गठबंधन की सरकार थी। अर्जुन मुंडा मुख्यमंत्री थे और हेमंत सोरेन उपमुख्यमंत्री।

राज्यसभा की दो सीटों पर चुनाव हुआ।

  • भाजपा ने एस.एस. अहलूवालिया को उम्मीदवार बनाया।
  • झामुमो ने संजीव कुमार को मैदान में उतारा।
  • कांग्रेस ने प्रदीप बलमुचू को उम्मीदवार बनाया।
  • आर.के. अग्रवाल निर्दलीय उम्मीदवार थे।

परिणाम चौंकाने वाले रहे।

झामुमो के संजीव कुमार जीत गए, लेकिन भाजपा के अधिकृत उम्मीदवार एस.एस. अहलूवालिया हार गए और कांग्रेस के प्रदीप बलमुचू जीतकर राज्यसभा पहुंच गए।

यानी सत्ता पक्ष के भीतर भी राजनीतिक समीकरण अंतिम क्षणों में बदल सकते हैं।

झामुमो ने दो उम्मीदवारों की बात की, उतारा सिर्फ एक

इस चुनाव का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक संकेत झामुमो की रणनीति है।

लंबे समय तक यह संदेश दिया गया कि झामुमो दोनों सीटों पर दावा कर सकता है। लेकिन अंततः पार्टी ने केवल बैजनाथ राम को उम्मीदवार बनाया।

यह निर्णय केवल उम्मीदवार चयन भर नहीं है। इसके राजनीतिक अर्थ कहीं अधिक गहरे हैं।

यह संदेश है कि झामुमो फिलहाल अपनी प्राथमिकता वाली सीट को सुरक्षित करना चाहता है। दूसरी सीट को लेकर पार्टी ने अपने लिए राजनीतिक लचीलापन खुला रखा है।

भाजपा की चुप्पी क्या संकेत दे रही है?

दूसरी तरफ भाजपा लगातार कहती रही कि वह उम्मीदवार उतारेगी। लेकिन नामांकन प्रक्रिया शुरू होने के बाद भी आधिकारिक उम्मीदवार की घोषणा नहीं हुई।

दूसरे राज्यों के लिए भाजपा ने अपने उम्मीदवारों की सूची पहले ही जारी कर दी थी। पार्टी अध्यक्ष नितिन नवीन रांची में मौजूद हैं, लेकिन इसके बावजूद उम्मीदवार की घोषणा नहीं होना सामान्य राजनीतिक घटना नहीं मानी जा सकती।

इसी बीच परिमल नाथवानी की सक्रियता बढ़ी।

नाथवानी का चुनावी मैदान में उतरना और राजनीतिक संपर्क बढ़ाना इस बात का संकेत माना जा रहा है कि पर्दे के पीछे कोई वैकल्पिक रणनीति चल रही है।

यहीं से भाजपा के तथाकथित “डार्क हॉर्स प्लान” की चर्चा शुरू होती है।

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बैजनाथ राम: मास्टरस्ट्रोक या राजनीतिक ढाल?

बैजनाथ राम की उम्मीदवारी को व्यापक रूप से हेमंत सोरेन का मास्टरस्ट्रोक बताया जा रहा है।

लेकिन राजनीतिक विश्लेषण की दृष्टि से देखें तो यह केवल मास्टरस्ट्रोक नहीं, बल्कि एक रणनीतिक ढाल भी हो सकती है।

दलित समुदाय से आने वाले बैजनाथ राम को आगे करके झामुमो कई राजनीतिक लक्ष्य साधने की कोशिश करता दिखाई देता है।

पहला लक्ष्य है दलित समाज में अपनी राजनीतिक पैठ मजबूत करना।

दूसरा लक्ष्य है कांग्रेस के दलित चेहरे राधाकृष्ण किशोर के समानांतर अपना प्रभावशाली दलित नेतृत्व विकसित करना।

तीसरा लक्ष्य है यह संदेश देना कि झामुमो भविष्य में सहयोगी दलों पर निर्भर रहने के बजाय अपने दम पर राजनीति करना चाहता है।

बैजनाथ राम ही क्यों?

यह सवाल महत्वपूर्ण है।

बैजनाथ राम झामुमो की पारंपरिक राजनीतिक नर्सरी से नहीं आते।

उन्होंने जनता दल यूनाइटेड, भाजपा और फिर झामुमो का राजनीतिक सफर तय किया है।

यही कारण है कि उनकी उम्मीदवारी केवल संगठनात्मक निर्णय नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेश मानी जा रही है।

झारखंड में अनुसूचित जाति के लिए नौ विधानसभा सीटें आरक्षित हैं। पलामू क्षेत्र में दलित राजनीति का अलग महत्व है।

राधाकृष्ण किशोर पहले से दलित राजनीति में अपनी भूमिका मजबूत करने की कोशिश करते रहे हैं। ऐसे में बैजनाथ राम को आगे बढ़ाना झामुमो की दीर्घकालिक सामाजिक इंजीनियरिंग का हिस्सा भी माना जा सकता है।

कांग्रेस के सामने सबसे बड़ा सवाल

राज्यसभा चुनाव केवल दो सांसद चुनने का मामला नहीं है।

यह महागठबंधन के भीतर शक्ति संतुलन की परीक्षा भी है।

अगर कांग्रेस उम्मीदवार जीतने में असफल रहता है, तो यह संदेश जाएगा कि झारखंड की गठबंधन राजनीति में कांग्रेस की भूमिका लगातार कमजोर हो रही है।

राज्यसभा चुनाव के बाद कांग्रेस की रणनीति क्या होगी, यह भविष्य की राजनीति तय करेगा।

क्योंकि कांग्रेस के मंत्रियों और नेताओं की नाराजगी की खबरें समय-समय पर सामने आती रही हैं।

यदि चुनाव के बाद भी कांग्रेस की राजनीतिक प्रतिक्रिया सीमित रहती है, तो झारखंड में उसका भविष्य बिहार, बंगाल, ओडिशा और उत्तर प्रदेश जैसी चुनौतियों की दिशा में बढ़ सकता है।

परिणाम से पहले ही कहानी का अंत लिखा जा चुका है?

राज्यसभा चुनाव का अंतिम परिणाम मतदान के दिन सामने आएगा, लेकिन राजनीतिक संकेत बताते हैं कि कई बड़े खिलाड़ी पहले ही अपनी-अपनी चाल चल चुके हैं।

झामुमो ने अपनी प्राथमिकता तय कर दी है।

भाजपा अभी भी अपने अंतिम पत्ते छिपाकर बैठी है।

परिमल नाथवानी की सक्रियता नए सवाल खड़े कर रही है।

और कांग्रेस अभी भी इस उम्मीद में है कि गठबंधन का गणित उसके पक्ष में काम करेगा।

लेकिन झारखंड की राजनीति बार-बार साबित कर चुकी है कि यहां केवल अंकगणित नहीं चलता, बल्कि राजनीति का अपना अलग गणित होता है।

इसीलिए शायद यह कहावत इस चुनाव पर सबसे ज्यादा सटीक बैठती है—

“होइहें सोई जो हेमंत रचि राखा।”

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वरिष्ठ पत्रकार आनंद कुमार करीब 30 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। उन्होंने एम.ए. (इतिहास), बैचलर ऑफ जर्नलिज्म और एमबीए (मार्केटिंग) की शिक्षा प्राप्त की है। 1996 में 'प्रभात खबर', रांची से बतौर प्रशिक्षु पत्रकार करियर की शुरुआत करके 'हिन्दुस्तान' और 'अमर उजाला' जैसे राष्ट्रीय समाचार पत्रों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल चुके आनंद कुमार हिन्दुस्तान, जमशेदपुर के स्थानीय संपादक भी रहे हैं। इसके अलावा The Photon News अखबार सहित Lagatar.in तथा Newswing.com जैसे डिजिटल माध्यमों में संपादक पद का दायित्व संभाल चुके हैं। इसके अलावा आनंद कुमार कॉरपोरेट कम्यूनिकेशन/जनसंपर्क, प्रबंधन, सरकार/प्रशासन और मीडिया शिक्षण का भी गहन अनुभव रखते हैं। उन्होंने सरयू राय - एक नाम कई आयाम' नामक पुस्तक का संपादन भी किया है।
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