Rajya Sabha Election Analysis : झारखंड में राज्यसभा की दो सीटों के लिए 18 जून को मतदान होना है, लेकिन यह चुनाव सिर्फ दो सांसदों के चयन तक सीमित नहीं रह गया है। राज्यसभा की यह लड़ाई अब झारखंड की सत्ता, इंडिया गठबंधन की एकजुटता और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की राजनीतिक रणनीति की परीक्षा के रूप में देखी जा रही है।
चुनावी मैदान में तीन उम्मीदवार हैं। झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) ने बैद्यनाथ राम को उम्मीदवार बनाया है। कांग्रेस की ओर से प्रणव झा मैदान में हैं, जबकि एनडीए समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में परिमल नाथवानी चुनाव लड़ रहे हैं। विधानसभा में वर्तमान संख्या बल को देखते हुए बैद्यनाथ राम की जीत लगभग तय मानी जा रही है। असली मुकाबला कांग्रेस उम्मीदवार प्रणव झा और परिमल नाथवानी के बीच माना जा रहा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह चुनाव परिणाम से अधिक राजनीतिक संकेतों का चुनाव बन चुका है।
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क्या झामुमो और कांग्रेस के बीच बढ़ा अविश्वास?
पिछले कुछ महीनों में झामुमो और कांग्रेस के रिश्तों को लेकर कई तरह की चर्चाएँ होती रही हैं। असम विधानसभा चुनाव में झामुमो द्वारा अकेले चुनाव लड़ने के फैसले ने कांग्रेस नेतृत्व के भीतर सवाल खड़े किए थे।
राजनीतिक हलकों में यह चर्चा रही कि झामुमो का यह कदम कांग्रेस की रणनीति से अलग था और इससे भाजपा को अप्रत्यक्ष लाभ मिला। हालांकि इस संबंध में कोई आधिकारिक स्वीकारोक्ति नहीं हुई, लेकिन इसके बाद दोनों दलों के बीच राजनीतिक भरोसे को लेकर सवाल उठने लगे।
यही वजह है कि राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस ने शुरू से ही अपनी दावेदारी को आक्रामक ढंग से आगे बढ़ाया। कांग्रेस नेतृत्व ने स्पष्ट संकेत दिया कि वह राज्यसभा की एक सीट पर समझौता करने के मूड में नहीं है।
क्या मतदान टालने की कोई रणनीति थी?
राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी रही कि झामुमो की शुरुआती रणनीति ऐसी हो सकती थी, जिससे राज्यसभा चुनाव निर्विरोध संपन्न हो जाए। इस चर्चा के अनुसार यदि विपक्ष और सत्तापक्ष के बीच एक अनौपचारिक राजनीतिक समझ बनती, तो एक सीट झामुमो और दूसरी सीट परिमल नाथवानी के खाते में जा सकती थी।
हालांकि इस तरह की चर्चाओं की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। लेकिन कांग्रेस द्वारा अचानक प्रणव झा को उम्मीदवार घोषित किए जाने के बाद यह संभावना स्वतः समाप्त हो गई और चुनाव मुकाबले की स्थिति में पहुंच गया।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि कांग्रेस किसी भी स्थिति में राज्यसभा चुनाव को केवल औपचारिक प्रक्रिया नहीं बनने देना चाहती थी।
परिमल नाथवानी क्यों बने केंद्र बिंदु?
परिमल नाथवानी का नाम झारखंड की राजनीति में नया नहीं है। वे पहले भी राज्यसभा के लिए झारखंड का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं और 2014 में निर्विरोध निर्वाचन का हिस्सा रहे हैं।
इस बार भी उन्हें एनडीए विधायकों का समर्थन प्राप्त है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि नाथवानी जीतते हैं तो इसका राजनीतिक संदेश सिर्फ एक राज्यसभा सीट तक सीमित नहीं रहेगा। इसे केंद्र और राज्य सरकार के बीच संबंधों तथा झारखंड की बदलती राजनीतिक दिशा के संकेत के रूप में भी देखा जाएगा।
हेमंत सोरेन के सामने राजनीतिक दुविधा
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के सामने सबसे बड़ी चुनौती संतुलन बनाए रखने की है। एक तरफ उनकी सरकार इंडिया गठबंधन का हिस्सा है, वहीं दूसरी ओर उन्हें केंद्र सरकार के साथ भी काम करना है।
यदि कांग्रेस उम्मीदवार प्रणव झा जीतते हैं तो इसे इंडिया गठबंधन की मजबूती और कांग्रेस की रणनीतिक सफलता माना जाएगा। लेकिन यदि परिमल नाथवानी जीत जाते हैं तो विपक्षी दल इसे झामुमो और कांग्रेस के रिश्तों में दरार के संकेत के रूप में पेश कर सकते हैं।
यही वजह है कि यह चुनाव मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की राजनीतिक विश्वसनीयता और गठबंधन प्रबंधन क्षमता की भी परीक्षा माना जा रहा है।
परिणाम चाहे जो हो, संदेश दूर तक जाएगा
राज्यसभा चुनाव का परिणाम केवल संसद के उच्च सदन में दो नए सदस्यों को भेजने तक सीमित नहीं रहेगा। इसके असर झारखंड की गठबंधन राजनीति, 2029 की रणनीतियों और इंडिया गठबंधन के भविष्य तक दिखाई दे सकते हैं।
18 जून को मतदान के बाद संख्या का गणित भले स्पष्ट हो जाए, लेकिन राजनीतिक सवाल लंबे समय तक बने रहेंगे। सबसे बड़ा सवाल यही रहेगा कि क्या झारखंड की राजनीति में सहयोग और प्रतिस्पर्धा का यह अनोखा समीकरण आगे भी जारी रहेगा, या फिर राज्यसभा चुनाव गठबंधन की राजनीति में नए अध्याय की शुरुआत करेगा।
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