झारखंड की सत्ता सियासत में बदलता संतुलन: सहयोग, संदेह और 2029 की संभावनाएं

Anand Kumar
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Anand Kumar

झारखंड की सियासत इन दिनों एक ऐसे मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है, जहां गठबंधन की मजबूरी और राजनीतिक आत्मनिर्भरता की महत्वाकांक्षा आमने-सामने खड़ी हैं। सतह पर सब कुछ सामान्य दिखता है। सरकार चल रही है, सहयोगी दल साथ हैं, लेकिन भीतर एक गहरी खटास, अविश्वास और भविष्य को लेकर रणनीतिक असमंजस साफ महसूस किया जा सकता है। सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि वर्तमान गठबंधन कितने दिन टिकेगा, बल्कि यह है कि आने वाले चुनावों में इसका स्वरूप क्या होगा और कौन-सी पार्टी सबसे ज्यादा लाभ या नुकसान उठाएगी।

संख्या का सच: स्थिर कांग्रेस, उभरता जेएमएम

नवंबर 2024 के विधानसभा चुनाव परिणाम इस पूरी बहस की आधारशिला हैं। 81 सदस्यीय झारखंड विधानसभा में बहुमत का आंकड़ा 41 है। महागठबंधन ने कुल 56 सीटें हासिल कर सरकार बनाई, जिसमें झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) 34 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी, जबकि कांग्रेस 16 सीटों पर ही सिमट गई। राष्ट्रीय जनता दल (RJD) को 4 और माले (CPI-ML) को 2 सीटें मिलीं।

यहां सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि 2019 और 2024, दोनों चुनावों में कांग्रेस की सीटें 16 पर स्थिर रहीं, जबकि JMM ने 30 से बढ़कर 34 सीटें हासिल कीं। यह वृद्धि केवल आंकड़ा नहीं, बल्कि राजनीतिक विस्तार और जनाधार के मजबूत होने का संकेत है। इसके विपरीत कांग्रेस का प्रदर्शन ठहरा हुआ नजर आता है, जो यह संकेत देता है कि वह गठबंधन के भीतर अपनी स्वतंत्र ताकत बढ़ाने में सफल नहीं रही।

विश्लेषकों के अनुसार, कांग्रेस की अधिकांश सीटें उन क्षेत्रों से आती हैं जहां झामुमो का आदिवासी और अल्पसंख्यक आधार मजबूत है। यानी कांग्रेस की जीत काफी हद तक गठबंधन के वोट ट्रांसफर पर निर्भर करती है। हालांकि कुछ शहरी और गैर-आदिवासी इलाकों में कांग्रेस को सवर्ण और ओबीसी वोटरों का समर्थन मिलता है, लेकिन यह समर्थन व्यापक राजनीतिक बढ़त में तब्दील नहीं हो पा रहा।

बिहार का संकेत: राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस की चुनौती

अगर इस परिप्रेक्ष्य को और व्यापक किया जाए, तो 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव कांग्रेस की स्थिति को और स्पष्ट करते हैं। 61 सीटों पर चुनाव लड़ने के बावजूद पार्टी केवल एक सीट जीत पाई। और बंगाल के चुनावों में तृणमूल और भाजपा में सीधा मुकाबला दिख रहा है। यह प्रदर्शन बताता है कि राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस की जमीनी पकड़ कमजोर हुई है, और क्षेत्रीय दलों के लिए उसकी उपयोगिता सीमित होती जा रही है।

यही कारण है कि झामुमो के भीतर यह सवाल लगातार उभर रहा है कि जब कांग्रेस से अपेक्षित चुनावी लाभ नहीं मिल रहा, तो सीटों का बड़ा हिस्सा उसके साथ साझा करने का औचित्य क्या है।

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असम प्रयोग: रणनीतिक संकेत या राजनीतिक संदेश?

मार्च 2026 में झामुमो का असम में अकेले चुनाव लड़ने का निर्णय इस पूरे परिदृश्य को नई दिशा देता है। पार्टी ने 21 सीटों पर उम्मीदवार उतारने की घोषणा की, खासकर उन इलाकों में जहां चाय बागान से जुड़े आदिवासी समुदाय का प्रभाव है। ऐसा समुदाय जिसका ऐतिहासिक और सामाजिक संबंध झारखंड से जुड़ा हुआ है।

राजनीतिक पर्यवेक्षकों के अनुसार, यह कदम केवल असम तक सीमित नहीं है। यह झामुमो की उस दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा है, जिसके तहत वह खुद को एक क्षेत्रीय दल से आगे बढ़ाकर राष्ट्रीय पहचान दिलाना चाहती है। इस संदर्भ में हेमंत सोरेन (Hemant Soren) का नेतृत्व निर्णायक भूमिका निभा रहा है, जो राज्य से बाहर भी पार्टी का विस्तार करने की कोशिश कर रहे हैं।

गठबंधन के भीतर टकराव: सार्वजनिक बयान, निजी असहमति

हाल के दिनों में गठबंधन सहयोगियों के बीच जिस तरह के सार्वजनिक बयान सामने आए हैं, वे स्थिति की गंभीरता को और बढ़ाते हैं। झामुमो के महासचिव सुप्रियो भट्टाचार्य की कांग्रेस पर तीखी टिप्पणी, कांग्रेस प्रभारी के. राजू के आरोप, और प्रदीप यादव का अवैध बालू खनन से वसूली के मुद्दे उठाना, ये सभी घटनाएं इस बात का संकेत हैं कि गठबंधन के भीतर भरोसा कमजोर पड़ रहा है।

इसके जवाब में राजद कोटे के मंत्री संजय प्रसाद यादव की खुली चुनौती ने इस टकराव को और सार्वजनिक बना दिया। यह स्थिति सामान्य राजनीतिक मतभेद से आगे बढ़कर एक ऐसे संघर्ष का रूप लेती दिख रही है, जहां सहयोगी दल एक-दूसरे के खिलाफ खड़े नजर आ रहे हैं।

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नेतृत्व का संकट : कांग्रेस की सबसे बड़ी कमजोरी

झारखंड में कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनौती उसका नेतृत्व संकट है। राज्य स्तर पर ऐसा कोई सर्वमान्य चेहरा नहीं है, जो पूरे प्रदेश में पार्टी को एकजुट कर सके या मतदाताओं के बीच स्पष्ट पहचान बना सके। इसके विपरीत, हेमंत सोरेन एक स्थापित और पहचाने जाने वाले नेता हैं, जिनकी राजनीतिक पकड़ और जनसंपर्क मजबूत है।

राजनीति में नेतृत्व केवल संगठन का मुखिया नहीं होता, बल्कि वह एक प्रतीक होता है। एक ऐसा चेहरा, जो मतदाता के मन में भरोसा पैदा करता है। कांग्रेस इस स्तर पर पिछड़ती नजर आती है।

परिसीमन और भविष्य का गणित

आने वाले वर्षों में संभावित परिसीमन झारखंड की राजनीति को पूरी तरह बदल सकता है। सीटों की संख्या बढ़ने पर सभी दलों की दावेदारी बढ़ेगी, और गठबंधन के भीतर सीट बंटवारे को लेकर संघर्ष तेज होना तय है। इस संदर्भ में राष्ट्रीय जनता दल के नेता पहले ही संकेत दे चुके हैं कि सम्मानजनक हिस्सेदारी नहीं मिलने पर वे अलग रास्ता चुन सकते हैं।

झामुमो के महासचिव विनोद कुमार पांडेय का यह बयान कि पार्टी राष्ट्रीय स्तर पर विस्तार करेगी, इस बात को और स्पष्ट करता है कि झामुमो भविष्य में किसी अन्य दल पर निर्भर रहने के बजाय अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान मजबूत करना चाहता है।

किसके लिए खतरे की घंटी?

इन सभी घटनाक्रमों को जोड़कर देखा जाए, तो तस्वीर साफ होती है। झामुमो अपने दम पर बहुमत के करीब पहुंच चुका है और विस्तार की दिशा में आगे बढ़ रहा है। राजद क्षेत्रीय समीकरणों में अपनी भूमिका बनाए रखने की कोशिश कर रही है। लेकिन कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती है अपनी प्रासंगिकता बनाए रखना।

अगर 2029 तक गठबंधन कायम रहता है, तो यह एक सामरिक मजबूरी होगी। लेकिन यदि यह टूटता है, तो सबसे बड़ा राजनीतिक नुकसान कांग्रेस को झेलना पड़ सकता है, क्योंकि उसका आधार अभी भी गठबंधन की संरचना पर निर्भर है।

झारखंड की राजनीति अब उस मोड़ पर पहुंच चुकी है, जहां आने वाले फैसले केवल सरकार के भविष्य को नहीं, बल्कि पूरे राज्य के राजनीतिक ढांचे को पुनर्परिभाषित कर सकते हैं।

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वरिष्ठ पत्रकार आनंद कुमार करीब 30 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। उन्होंने एम.ए. (इतिहास), बैचलर ऑफ जर्नलिज्म और एमबीए (मार्केटिंग) की शिक्षा प्राप्त की है। 1996 में 'प्रभात खबर', रांची से बतौर प्रशिक्षु पत्रकार करियर की शुरुआत करके 'हिन्दुस्तान' और 'अमर उजाला' जैसे राष्ट्रीय समाचार पत्रों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल चुके आनंद कुमार हिन्दुस्तान, जमशेदपुर के स्थानीय संपादक भी रहे हैं। इसके अलावा The Photon News अखबार सहित Lagatar.in तथा Newswing.com जैसे डिजिटल माध्यमों में संपादक पद का दायित्व संभाल चुके हैं। इसके अलावा आनंद कुमार कॉरपोरेट कम्यूनिकेशन/जनसंपर्क, प्रबंधन, सरकार/प्रशासन और मीडिया शिक्षण का भी गहन अनुभव रखते हैं। उन्होंने सरयू राय - एक नाम कई आयाम' नामक पुस्तक का संपादन भी किया है।
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