रांची: झारखंड का राज्य प्रशासनिक महकमा इन दिनों अजीब उलझन से गुजर रहा है। JSSC CGL से सिलेक्ट हुए अधिकारी और कर्मचारी दफ्तर तो पहुंच रहे हैं, लेकिन कई सिर्फ अटेंडेंस बनाकर दिन काट रहे हैं। किसी को स्पष्ट नहीं है कि उन्हें काम करना है या नहीं और अगर काम करना है तो कौन-सा काम करना है। सबसे बड़ी परेशानी यह है कि इस संबंध में कोई स्पष्ट लिखित आदेश भी सामने नहीं आया है।
JPSC और JSSC के माध्यम से चयनित होकर विभिन्न पदों पर बहाल किए गए अभ्यर्थियों की नौकरी सरकारी आदेश के बाद रद्द कर दी गई थी। बाद में हाईकोर्ट के हस्तक्षेप से उनकी नियुक्ति फिलहाल बनी हुई है। लेकिन कोर्ट के आदेश के बाद भी यह स्पष्ट नहीं है कि इन कर्मचारियों को पहले की तरह नियमित रूप से काम करना है या नहीं।
स्थिति यह है कि सचिवालय में कार्यरत कुछ कर्मचारी रोज दफ्तर पहुंच रहे हैं और काम भी कर रहे हैं, लेकिन उन्हें वेतन नहीं मिल रहा। वहीं प्रखंड और अनुमंडल स्तर पर नियुक्त कुछ अधिकारियों को उनके वरीय अधिकारी काम करने की अनुमति नहीं दे रहे हैं।
मसलन, अगर कोई खाद्य आपूर्ति पदाधिकारी है तो उसके हिस्से का काम किसी दूसरे अधिकारी को सौंप दिया गया है। सूत्रों के मुताबिक, यह सब किसी स्पष्ट लिखित आदेश के बजाय मौखिक निर्देशों के आधार पर हो रहा है। यानी पूरी प्रशासनिक व्यवस्था फिलहाल एक तरह से मौखिक आदेशों के भरोसे चल रही है।
क्या है पूरा मामला?
पूरा मामला 17 अगस्त को मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की घोषणा से जुड़ा है। JPSC और JSSC समेत विभिन्न भर्ती परीक्षाओं को लेकर लंबे समय से चल रहे विवाद और छात्र आंदोलन के बीच मुख्यमंत्री ने 17 अगस्त को प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कई भर्ती परीक्षाओं को रद्द करने की घोषणा की थी।
यह फैसला करीब 24 दिनों से चल रहे छात्र आंदोलन के दबाव के बीच आया था।
इसके अगले दिन, 18 अगस्त की देर रात कार्मिक, प्रशासनिक सुधार एवं राजभाषा विभाग ने आठ अलग-अलग अधिसूचनाएं जारी कीं। इन अधिसूचनाओं के दायरे में कुल 45 परीक्षाएं आईं। इनमें 22 परीक्षाओं को पूरी तरह रद्द किया गया, छह को अगले आदेश तक स्थगित किया गया, जबकि 17 परीक्षाएं CID-SIT जांच के दायरे में रखी गईं।
रद्द की गई परीक्षाओं में JSSC CGL यानी झारखंड सामान्य स्नातक स्तरीय संयुक्त प्रतियोगिता परीक्षा-2023 भी शामिल थी। यह परीक्षा विज्ञापन संख्या 10/2023 के तहत आयोजित की गई थी।
सभी अधिसूचनाएं कार्मिक विभाग के सचिव प्रवीण कुमार टोप्पो के हस्ताक्षर से जारी हुईं। अधिसूचना जारी होने के बाद ही प्रवीण कुमार टोप्पो छुट्टी पर चले गए।
नियुक्त अभ्यर्थी धरने पर बैठे
भर्ती परीक्षाएं रद्द होने की खबर सामने आते ही जिन अभ्यर्थियों की नियुक्ति हो चुकी थी, उन्होंने प्रोजेक्ट भवन और कार्मिक विभाग के बाहर धरना शुरू कर दिया। इन अभ्यर्थियों का कहना था कि उन्होंने सरकारी नौकरी मिलने के बाद अपनी दूसरी नौकरियां तक छोड़ दी थीं। अब परीक्षा और नियुक्ति रद्द होने से उनके सामने गंभीर संकट खड़ा हो गया है।
इसी बीच 20 अगस्त को झारखंड हाईकोर्ट ने JPSC की 11वीं से 13वीं सिविल सेवा परीक्षा और फूड सेफ्टी ऑफिसर भर्ती परीक्षा को रद्द करने वाले आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी। इससे करीब 396 से 398 चयनित और नियुक्त अभ्यर्थियों की नौकरी फिलहाल बच गई।
अगले ही दिन, 21 अगस्त को JSSC CGL के अभ्यर्थियों ने भी हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की। अदालत ने इस मामले में भी नियुक्ति रद्द करने वाली अधिसूचना पर स्टे लगा दिया। कोर्ट ने संबंधित कर्मियों से शपथपत्र मांगा है कि अगर आगे की जांच में कोई व्यक्ति व्यक्तिगत रूप से दोषी पाया जाता है तो उसकी जिम्मेदारी स्वयं उसकी होगी। मामले की अगली सुनवाई 5 सितंबर को तय है।
स्टे के बाद भी खत्म नहीं हुआ असमंजस
हाईकोर्ट के आदेश के बाद सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिन कर्मचारियों की नियुक्ति रद्द करने का आदेश रोक दिया गया है, वे अब क्या करें?
यहीं से प्रशासनिक उलझन शुरू होती है।
जानकारी के मुताबिक, मुख्यमंत्री की घोषणा के अगले दिन कार्मिक विभाग की ओर से आधिकारिक पत्र जारी हुआ था, जिसमें स्पष्ट किया गया था कि संबंधित कर्मचारी अब नौकरी पर नहीं हैं। लेकिन जब हाईकोर्ट ने नियुक्ति रद्द करने वाले आदेश पर ही रोक लगा दी, उसके बाद कर्मचारियों को दोबारा पहले की तरह ड्यूटी पर लौटने को लेकर कोई स्पष्ट आधिकारिक आदेश जारी नहीं हुआ।
नतीजा यह है कि कर्मचारी दफ्तर तो पहुंच रहे हैं और कई जगह अटेंडेंस भी बना रहे हैं, लेकिन उनके पास यह स्पष्ट नहीं है कि उन्हें कौन-सा काम करना है। कई जगह अधिकारी उन्हें काम करने की अनुमति नहीं दे रहे हैं, क्योंकि उनके पास नियुक्ति बहाल होने से संबंधित कोई नया आधिकारिक पत्र नहीं पहुंचा है।
इस बीच हाईकोर्ट के आदेश के अगले ही दिन कार्मिक विभाग के सचिव प्रवीण कुमार टोप्पो छुट्टी पर चले गए। ऐसे में प्रशासनिक स्तर पर स्थिति और जटिल हो गई है।
धनबाद में अलग तस्वीर, अधिकारी दफ्तर जा रहे लेकिन काम दूसरे को
धनबाद जिले में इस पूरे मामले का एक अलग ही पैटर्न देखने को मिल रहा है। यहां ब्लॉक स्तर पर नियुक्त अधिकारी दफ्तर तो पहुंच रहे हैं, लेकिन उनका प्रभार किसी दूसरे अधिकारी को सौंप दिया गया है।
कहीं यह जिम्मेदारी BDO को दी गई है तो कहीं महिला पर्यवेक्षिका या दूसरे पदाधिकारी को। संबंधित अधिकारी दफ्तर पहुंचते हैं, अटेंडेंस बनाते हैं और फिर बैठे रहते हैं।
उनके पास न काम है और न यह कहने का कोई आधिकारिक आधार कि उनका पद खाली है या उनकी नियुक्ति समाप्त हो चुकी है।
मौखिक निर्देशों पर चल रही व्यवस्था
सूत्रों के मुताबिक, रांची के अधिकारियों की ओर से मौखिक रूप से कहा गया है कि कर्मचारी दफ्तर जाएं और अपनी उपस्थिति दर्ज करें। इसके बाद कुछ ब्लॉक स्तर के अधिकारी भी ड्यूटी पर लौटने लगे हैं।
लेकिन सबसे अहम बात यह है कि ये निर्देश लिखित आदेश के रूप में जारी नहीं किए गए हैं।
एक दिन कर्मचारियों का एक प्रतिनिधिमंडल कार्मिक विभाग के सचिव प्रवीण कुमार टोप्पो से मिलने भी पहुंचा, लेकिन मुलाकात नहीं हो सकी। प्रतिनिधिमंडल को बताया गया कि फाइल आगे भेजी जा चुकी है।
यानी स्थिति यह है कि जब तक कोई स्पष्ट आधिकारिक आदेश जारी नहीं होता, तब तक कर्मचारियों को न तो काम करने को लेकर स्पष्टता है और न ही उनके वेतन तथा सेवा संबंधी स्थिति को लेकर।
वेतन का संकट भी गहराया
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे गंभीर असर कर्मचारियों के वेतन पर पड़ रहा है।
हर महीने की निर्धारित तारीख पर वेतन खाते में आ जाता था, लेकिन इस बार कई कर्मचारियों के खाते में पैसा नहीं पहुंचा। दूसरी ओर बायोमेट्रिक सिस्टम में उनकी उपस्थिति लगातार दर्ज हो रही है।
कई ऐसे कर्मचारी भी हैं जिन्होंने सरकारी नौकरी मिलने के बाद अपनी पिछली नौकरी छोड़ दी थी। उनके लिए यही नौकरी परिवार चलाने का मुख्य जरिया थी। अब वेतन नहीं मिलने से उनके सामने घर चलाने, कमरे का किराया देने और रोजमर्रा के खर्च पूरे करने का संकट खड़ा हो गया है।
सवाल सीधा है—अगर कर्मचारी दफ्तर आ रहे हैं, उनकी उपस्थिति दर्ज हो रही है और वे काम करने के लिए तैयार हैं, तो उनका वेतन क्यों रुका है?
एक तरफ कोर्ट का स्टे, दूसरी तरफ कोई स्पष्ट आदेश नहीं
पूरे मामले में फिलहाल सबसे बड़ी विडंबना यही है कि एक तरफ हाईकोर्ट ने नियुक्ति रद्द करने के सरकारी आदेश पर रोक लगा दी है, दूसरी तरफ कर्मचारियों को पहले की तरह काम पर लौटने के संबंध में कोई स्पष्ट लिखित आदेश नहीं आया है।
एक तरफ कर्मचारी दफ्तर पहुंच रहे हैं, दूसरी तरफ उन्हें काम करने की अनुमति नहीं दी जा रही। भर्ती परीक्षा कभी रद्द होती है, फिर अदालत से उस पर रोक लगती है और इसी बीच संबंधित विभाग के सचिव छुट्टी पर चले जाते हैं।
हर स्तर पर फैसला किसी न किसी वजह से अटकता दिखाई दे रहा है।
अब सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि भर्ती परीक्षाओं का अंतिम परिणाम क्या होगा। उससे पहले बड़ा सवाल यह है कि जिन अभ्यर्थियों की नियुक्ति हो चुकी थी, उनके वर्तमान प्रशासनिक दर्जे, काम और वेतन का फैसला कौन करेगा?
क्योंकि जब अदालत का आदेश कर्मचारियों के पक्ष में है, तो सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि वे कर्मचारी ड्यूटी पर हैं या नहीं, उनका काम कौन तय करेगा और उनके वेतन का भुगतान कब होगा।
यही वह सवाल है जिसका जवाब फिलहाल हजारों चयनित अभ्यर्थी और कर्मचारी तलाश रहे हैं।
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