झारखंड हाई कोर्ट का अहम फैसला: भाइयों की संयुक्त खरीदी जमीन में बहन का हिस्सा नहीं, मां की संपत्ति में बराबर अधिकार

Anand Kumar
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बोकारो के जमीन विवाद में हाई कोर्ट ने बदला निचली अदालत का फैसला; दो भाइयों को संयुक्त रूप से खरीदी गई जमीन में आधा-आधा हिस्सा, मां की संपत्ति में भाई-बहन को एक-एक तिहाई अधिकार

रांची: झारखंड हाई कोर्ट ने संपत्ति बंटवारे से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि दो भाइयों के नाम पर संयुक्त रूप से खरीदी गई जमीन में उनकी बहन का हिस्सा नहीं बनता, यदि वह जमीन संयुक्त पारिवारिक या पैतृक संपत्ति साबित नहीं होती है। वहीं, मां के नाम पर अर्जित संपत्ति में उनके बेटे और बेटी सभी समान रूप से हिस्सेदार होंगे।

न्यायमूर्ति मनोज प्रसाद की अदालत ने बोकारो निवासी गंगाधर राजवार की ओर से दायर प्रथम अपील पर सुनवाई करते हुए निचली अदालत के फैसले में संशोधन किया। अदालत ने भाइयों की ओर से संयुक्त रूप से खरीदी गई जमीन में दोनों को 50-50 प्रतिशत हिस्सेदार माना, जबकि मां भीखनी देवी की संपत्ति में दोनों बेटों और बेटी को एक-एक तिहाई हिस्सा देने के फैसले को बरकरार रखा।

यह फैसला 30 अक्टूबर 2026 को प्रथम अपील संख्या FA No. 132 of 2023 में सुनाया गया। अदालत ने अपील को आंशिक रूप से स्वीकार किया।

क्या है पूरा मामला?

यह विवाद बोकारो जिले के भोजूडीह गांव की जमीन के बंटवारे से जुड़ा है। गंगाधर राजवार ने अपने भाई राम प्रसाद राजवार के खिलाफ वर्ष 2020 में बोकारो सिविल कोर्ट में संपत्ति बंटवारे का मुकदमा दायर किया था।

गंगाधर ने अदालत से मांग की थी कि दोनों भाइयों की ओर से संयुक्त रूप से खरीदी गई जमीन और उनकी मां भीखनी देवी के नाम की संपत्ति में उन्हें आधा हिस्सा दिया जाए।

मामले की सुनवाई के बाद बोकारो की अदालत ने संबंधित संपत्तियों में गंगाधर, उनके भाई राम प्रसाद और बहन गीता देवी को एक-एक तिहाई हिस्सेदार मानते हुए प्रारंभिक डिक्री पारित की थी। इस फैसले को गंगाधर राजवार ने झारखंड हाई कोर्ट में चुनौती दी।

बहन के हिस्सा छोड़ने का दावा, लेकिन रजिस्टर्ड दस्तावेज नहीं

हाई कोर्ट ने मां भीखनी देवी की संपत्ति के मामले में पाया कि उनकी मृत्यु के बाद उनके तीन कानूनी उत्तराधिकारी—दो बेटे और एक बेटी—संपत्ति में बराबर के हकदार हैं।

मामले में यह दावा किया गया था कि बहन गीता देवी ने अपने भाइयों के पक्ष में संपत्ति का हिस्सा छोड़ने पर मौखिक सहमति दी थी। हालांकि, इस दावे के समर्थन में कोई वैध निबंधित दस्तावेज अदालत के सामने पेश नहीं किया गया।

अदालत ने स्पष्ट किया कि संपत्ति में अपना अधिकार छोड़ना या उसका हस्तांतरण करना कानूनी प्रक्रिया के तहत होना चाहिए। केवल मौखिक सहमति के आधार पर किसी उत्तराधिकारी का हिस्सा समाप्त नहीं किया जा सकता।

इस आधार पर मां की संपत्ति में तीनों भाई-बहनों को एक-एक तिहाई हिस्सा देने के निचली अदालत के फैसले को हाई कोर्ट ने बरकरार रखा।

भाइयों ने अपने नाम से खरीदी थी जमीन

मामले में संपत्ति के दूसरे हिस्से को लेकर हाई कोर्ट ने अलग निष्कर्ष निकाला। अदालत ने पाया कि वाद की अनुसूची-ए में शामिल जमीन के बिक्री दस्तावेजों में खरीदार के रूप में गंगाधर राजवार और राम प्रसाद राजवार के नाम दर्ज हैं।

ये जमीन दोनों भाइयों ने अलग-अलग वर्षों में संयुक्त रूप से खरीदी थी। अदालत के सामने ऐसा कोई प्रमाण नहीं आया, जिससे यह साबित हो सके कि ये जमीन संयुक्त हिंदू परिवार की संपत्ति या पैतृक संपत्ति थी।

इसी आधार पर अदालत ने माना कि इस जमीन पर दोनों भाइयों का बराबर अधिकार है। निचली अदालत की ओर से बहन को भी इसमें एक-तिहाई हिस्सेदार मानने का फैसला सही नहीं था। हाई कोर्ट ने संशोधन करते हुए दोनों भाइयों को इस संपत्ति में आधा-आधा हिस्सा देने का आदेश दिया।

मकान और कब्जे को लेकर भी अदालत ने कही अहम बात

हाई कोर्ट ने जमीन पर कब्जे और उस पर बनाए गए मकानों को लेकर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि अंतिम बंटवारे के समय पक्षकारों के वास्तविक कब्जे और निर्माण पर विचार किया जा सकता है।

जहां संभव हो, जिस व्यक्ति ने जमीन के किसी हिस्से पर मकान बनाया है, उसे वही हिस्सा आवंटित करने का प्रयास किया जाना चाहिए। हालांकि, ऐसा करते समय यह ध्यान रखना होगा कि किसी भी पक्ष के साथ असमान या अन्यायपूर्ण बंटवारा न हो।

हाई कोर्ट ने निचली अदालत का फैसला आंशिक रूप से बदला

न्यायमूर्ति मनोज प्रसाद की अदालत ने अपने फैसले में संपत्ति की प्रकृति के आधार पर दोनों मामलों को अलग-अलग माना। भाइयों की संयुक्त खरीद वाली जमीन में दोनों को आधा-आधा हिस्सा दिया गया, जबकि मां की संपत्ति में बेटी समेत तीनों उत्तराधिकारियों का एक-एक तिहाई अधिकार बरकरार रखा गया।

इस तरह हाई कोर्ट ने गंगाधर राजवार की अपील आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए बोकारो सिविल कोर्ट की प्रारंभिक डिक्री में संशोधन कर दिया।

मामले का सार: भाइयों के नाम पर संयुक्त रूप से खरीदी गई और पैतृक या संयुक्त पारिवारिक संपत्ति साबित नहीं हुई जमीन में दोनों भाइयों का बराबर हिस्सा होगा। वहीं, मां की संपत्ति में बेटे और बेटी को समान अधिकार मिलेगा।

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वरिष्ठ पत्रकार आनंद कुमार करीब 30 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। उन्होंने एम.ए. (इतिहास), बैचलर ऑफ जर्नलिज्म और एमबीए (मार्केटिंग) की शिक्षा प्राप्त की है। 1996 में 'प्रभात खबर', रांची से बतौर प्रशिक्षु पत्रकार करियर की शुरुआत करके 'हिन्दुस्तान' और 'अमर उजाला' जैसे राष्ट्रीय समाचार पत्रों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल चुके आनंद कुमार हिन्दुस्तान, जमशेदपुर के स्थानीय संपादक भी रहे हैं। इसके अलावा The Photon News अखबार सहित Lagatar.in तथा Newswing.com जैसे डिजिटल माध्यमों में संपादक पद का दायित्व संभाल चुके हैं। इसके अलावा आनंद कुमार कॉरपोरेट कम्यूनिकेशन/जनसंपर्क, प्रबंधन, सरकार/प्रशासन और मीडिया शिक्षण का भी गहन अनुभव रखते हैं। उन्होंने सरयू राय - एक नाम कई आयाम' नामक पुस्तक का संपादन भी किया है।
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