झारखंड में भाजपा का ‘मिशन 2029’: 28 आदिवासी सीटों में सिर्फ 1 पर जीत, क्या नितिन नबीन की बैठक बदलेगी तस्वीर?

Anand Kumar
7 Min Read

आनंद कुमार

झारखंड भाजपा की प्रदेश कार्यसमिति की बैठक 24-25 अक्टूबर को रांची में होनी है। राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन 23 अक्टूबर की शाम ही रांची पहुंच रहे हैं। पार्टी की भीतरी बैठकें आम तौर पर रूटीन मानी जाती हैं, लेकिन इस बार तीन वजहों से इसे अलग नज़र से देखा जा रहा है। पहली, राष्ट्रीय अध्यक्ष खुद मौजूद रहेंगे। दूसरी, पिछले तीन हफ्तों में संगठन की शीर्ष टीम बदली है। तीसरी, चुनावी आंकड़े पार्टी के लिए सहज नहीं हैं।

तीन हफ्तों में बदली संगठन की तस्वीर

अक्टूबर की शुरुआत से ही झारखंड भाजपा में हलचल दिख रही है।

  • 2 अक्टूबर: छत्तीसगढ़ से आए पवन साय ने संगठन महामंत्री का कार्यभार संभाला। उन्होंने कर्मवीर सिंह की जगह ली, जिन्हें छत्तीसगढ़ भेजा गया है। साय के आने के बाद सोशल मीडिया पर संगठन की स्थिति को लेकर बहस भी चली।
  • 5 अक्टूबर: नए प्रभारी गजेंद्र पटेल रांची पहुंचे। उनके साथ सह-प्रभारी निवेदिता सिंह और सौरभ सिंह भी आए। इन नेताओं ने प्रदेश के पदाधिकारियों के साथ कई दौर की बैठकें कीं।
  • 20 से 22 अक्टूबर: राष्ट्रीय सह-संगठन महामंत्री सौदान सिंह झारखंड में रहे।
  • 23 अक्टूबर: अब राष्ट्रीय अध्यक्ष खुद रांची में हैं।

एक के बाद एक आ रहे केंद्रीय नेताओं का यह सिलसिला बताता है कि पार्टी नेतृत्व झारखंड को प्राथमिकता में रख रहा है। जनवरी 2026 में नितिन नबीन के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद झारखंड में यह उनका दूसरा दौरा है।

आदिवासी चेहरों पर दांव

पवन साय और गजेंद्र पटेल, दोनों आदिवासी समुदाय से आते हैं। पटेल मध्य प्रदेश की खरगोन सीट से सांसद हैं, जबकि साय छत्तीसगढ़ में संगठन महामंत्री रह चुके हैं। यह चयन संयोग नहीं लगता, क्योंकि झारखंड में भाजपा की सबसे बड़ी कमजोरी आदिवासी इलाकों में ही है।

दोनों नेताओं के सार्वजनिक बयान भी लक्ष्य साफ करते हैं। साय ने कार्यकर्ताओं से “2029 में हमरे जीतब” का नारा लगवाया। पटेल ने कहा कि जब पार्टी दूसरे राज्यों में जीत हासिल कर सकती है, तो झारखंड में क्यों नहीं, खासकर तब जब यहां पहले भी भाजपा की सरकारें रही हैं।

आंकड़े क्या कहते हैं

भाजपा की चिंता को समझने के लिए पिछले तीन चुनावों के आंकड़े देखना जरूरी है।

चुनावभाजपा की स्थिति
2014 विधानसभा37 सीटें, सरकार बनी (तब जेएमएम के 18 विधायक)
2019 विधानसभा24 सीटें, जेएमएम ने 30 सीटें जीतकर कांग्रेस, राजद और भाकपा माले के साथ सरकार बनाई
2024 लोकसभाआदिवासियों के लिए आरक्षित सभी 5 सीटों पर हार
2024 विधानसभाएनडीए को 24 सीटें और 38.14% वोट; जेएमएम गठबंधन को 56 सीटें और 44.33% वोट

आदिवासी आरक्षित सीटें सबसे अहम हैं। झारखंड विधानसभा की 28 आरक्षित सीटों में भाजपा 2019 में सिर्फ 2 जीत सकी थी। 2024 में यह संख्या घटकर 1 रह गई, जो सरायकेला से चंपाई सोरेन की जीत थी। बाकी 27 सीटें जेएमएम-कांग्रेस के खाते में गईं। 2024 में जेएमएम 34 सीटों के साथ सबसे बड़ा दल बना।

सिर्फ आदिवासी इलाका नहीं, शहरी सीटों पर भी दबाव

भाजपा को शहरी और सामान्य सीटों पर भी झटका लगा है। 2024 में बोकारो, भवनाथपुर, सारठ, सिंदरी और निरसा जैसी सीटें पार्टी के हाथ से निकल गईं। गिरिडीह में जेएमएम ने लगातार दूसरी बार जीत दर्ज की।

हाल के नगर निगम चुनाव भी पार्टी के लिए अच्छे संकेत नहीं देते। नौ नगर निगमों में से देवघर और गिरिडीह में जेएमएम समर्थित उम्मीदवार मेयर और डिप्टी मेयर बने। भाजपा समर्थित उम्मीदवार सिर्फ तीन निगमों में जीते और छह में मेयर पद पर हार गए। यह नतीजे संगठन की कमजोर कड़ियों की ओर इशारा करते हैं।

दूसरा पक्ष: हेमंत सोरेन की रणनीति

भाजपा के सामने चुनौती सिर्फ अपना संगठन ठीक करने की नहीं है। विश्लेषकों के मुताबिक हेमंत सोरेन का आदिवासी समाज में कद लगातार बढ़ा है। भाजपा के रणनीतिकार यह भी मान रहे हैं कि जेएमएम गठबंधन में रहकर भी 34 से बढ़कर अकेले दम पर 41 सीटों के आंकड़े तक पहुंचने की कोशिश करेगा।

अनुसूचित जाति की राजनीति में भी जेएमएम सक्रिय दिख रहा है। राज्यसभा की दो सीटों में से एक पर पार्टी ने लातेहार के बैजनाथ राम को जिताया। इसे आदिवासी के साथ दलित समुदाय को भी साधने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। विधानसभा की 9 अनुसूचित जाति सीटों में फिलहाल सत्तारूढ़ गठबंधन के पास पांच और भाजपा गठबंधन के पास चार सीटें हैं।

भाजपा का पक्ष और असली परीक्षा

भाजपा के प्रदेश महामंत्री अमर कुमार बाउरी के मुताबिक कार्यसमिति की बैठक संगठन को मजबूत करने, कार्यकर्ताओं की भूमिका तय करने और आगे के राजनीतिक व संगठनात्मक कार्यक्रमों का खाका बनाने का अवसर है। पार्टी का तर्क है कि चुनाव में अभी तीन साल बाकी हैं और संगठन को पूरी तरह तैयार करने के लिए पर्याप्त समय है।

राजनीतिक प्रेक्षकों का आकलन है कि केंद्रीय नेतृत्व झारखंड की स्थिति से वाकिफ है और आदिवासी नेताओं के बीच कद के सवाल को भी समझता है। उनके अनुसार अगर रणनीतिकार प्रदेश के बड़े नेताओं के बीच मतभेद दूर कर जमीन पर काम दिखा पाए, तो हालात बदल सकते हैं।

पार्टी के सामने चार सवाल हैं:

  1. आदिवासी इलाकों में भरोसा कैसे लौटे?
  2. प्रदेश के बड़े नेताओं के बीच तालमेल कैसे बने?
  3. गठबंधन में चुनाव लड़ना है या अकेले?
  4. शहरी और सामान्य सीटों की पकड़ फिर कैसे मजबूत हो?

आगे की राह: गिरिडीह उपचुनाव

इस पूरी कवायद का पहला छोटा इम्तिहान गिरिडीह में होने वाला उपचुनाव माना जा रहा है। नतीजे बताएंगे कि नए संगठनात्मक चेहरों का असर जमीन पर कितना पड़ा है। हालांकि एक उपचुनाव से 2029 की तस्वीर तय नहीं होती, फिर भी यह पार्टी के लिए संकेतक जरूर होगा।

यह भी पढ़ें – झारखंड भाजपा कार्यसमिति की बैठक 24-25 अक्टूबर को रांची में, राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन होंगे शामिल

Share This Article
Follow:
वरिष्ठ पत्रकार आनंद कुमार करीब 30 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। उन्होंने एम.ए. (इतिहास), बैचलर ऑफ जर्नलिज्म और एमबीए (मार्केटिंग) की शिक्षा प्राप्त की है। 1996 में 'प्रभात खबर', रांची से बतौर प्रशिक्षु पत्रकार करियर की शुरुआत करके 'हिन्दुस्तान' और 'अमर उजाला' जैसे राष्ट्रीय समाचार पत्रों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल चुके आनंद कुमार हिन्दुस्तान, जमशेदपुर के स्थानीय संपादक भी रहे हैं। इसके अलावा The Photon News अखबार सहित Lagatar.in तथा Newswing.com जैसे डिजिटल माध्यमों में संपादक पद का दायित्व संभाल चुके हैं। इसके अलावा आनंद कुमार कॉरपोरेट कम्यूनिकेशन/जनसंपर्क, प्रबंधन, सरकार/प्रशासन और मीडिया शिक्षण का भी गहन अनुभव रखते हैं। उन्होंने सरयू राय - एक नाम कई आयाम' नामक पुस्तक का संपादन भी किया है।
Leave a Comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *