आनंद कुमार
रांची। झारखंड जब 15 नवंबर 2000 को अलग राज्य बना, तब उसके सामने सिर्फ एक नए राज्य के निर्माण की चुनौती नहीं थी। इसके साथ एक बड़ी उम्मीद भी जुड़ी थी—जल, जंगल और जमीन से समृद्ध इस क्षेत्र के संसाधनों का लाभ यहां रहने वाले लोगों तक पहुंचेगा।
- 2000 में सिर्फ एक राज्य नहीं बना था, एक उम्मीद बनी थी
- 26 साल में क्या बदला?
- खनिज है, लेकिन रोजगार कितना?
- पलायन को केवल समस्या मानना भी सही नहीं
- छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड से क्या सीख मिलती है?
- अब बहस सिर्फ विकास की नहीं, खनिज अधिकारों की भी है
- फिर आया MMDR Amendment Act, 2026
- केंद्र का तर्क क्या है?
- लेकिन झारखंड का सवाल क्या है?
- 2024 और 2026 के बीच असली सवाल क्या बदला?
- झारखंड के सामने असली चुनौती यहीं से शुरू होती है
- 2050 की ओर देखता झारखंड
- आखिरी सवाल
26 साल बाद, 2026 में झारखंड एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां उसके सामने विकास का पुराना सवाल एक नए रूप में लौट आया है।
सवाल यह नहीं है कि झारखंड के पास संसाधन हैं या नहीं। सवाल यह है कि क्या इन संसाधनों को रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल, उद्योग और बेहतर जीवन में पर्याप्त रूप से बदला जा सका है?
और इसी सवाल के बीच अब खनिज संपदा से जुड़े कराधान और राज्यों के अधिकार का संवैधानिक विवाद भी सामने है।
2000 में सिर्फ एक राज्य नहीं बना था, एक उम्मीद बनी थी
झारखंड, छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड—तीनों राज्य 2000 में अलग हुए। तीनों के अलग राज्य बनने की परिस्थितियां अलग थीं, लेकिन इनके पीछे क्षेत्रीय पहचान, बेहतर प्रशासन और स्थानीय विकास की अपेक्षा महत्वपूर्ण थी।
झारखंड के मामले में खनिज संपदा इस कहानी का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा रही है।
राज्य सरकार के अनुसार झारखंड के पास देश के कुल खनिज संसाधनों का करीब 40 प्रतिशत हिस्सा है। राज्य कोयला भंडार में पहले, लौह अयस्क में दूसरे और तांबा अयस्क भंडार में तीसरे स्थान पर बताता है।
लेकिन प्राकृतिक संसाधनों की प्रचुरता अपने आप में मानव विकास की गारंटी नहीं होती।
यही झारखंड के विकास की सबसे महत्वपूर्ण बहस है।
26 साल में क्या बदला?
इन 26 वर्षों में झारखंड में सड़क, बिजली, शहरी ढांचा, डिजिटल कनेक्टिविटी, औद्योगिक गतिविधियों और सरकारी सेवाओं का विस्तार हुआ है।
राज्य के आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार 2023-24 में झारखंड के GSVA में औद्योगिक क्षेत्र की हिस्सेदारी 44.1 प्रतिशत थी। संगठित विनिर्माण में रोजगार भी बढ़ा है और 2025-26 के लिए संगठित विनिर्माण का GVA 63,873 करोड़ रुपये अनुमानित किया गया है। हालांकि औद्योगिक गतिविधि का बड़ा हिस्सा अभी भी बेसिक मेटल और आयरन-स्टील जैसे क्षेत्रों में केंद्रित है।
यानी तस्वीर सिर्फ नकारात्मक नहीं है।
लेकिन दूसरी तरफ सवाल यह है कि क्या खनिज और बड़े उद्योगों से पैदा होने वाली आर्थिक गतिविधि का पर्याप्त लाभ गांवों, युवाओं और स्थानीय समुदायों तक पहुंच रहा है?
यही वह जगह है जहां विकास की बहस जटिल हो जाती है।
खनिज है, लेकिन रोजगार कितना?
झारखंड सरकार के खनन विभाग के घोषित उद्देश्यों में खनिजों का मूल्य संवर्धन, खनिज आधारित उद्योगों की स्थापना और प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रोजगार पैदा करना शामिल है।
इसका अर्थ यह है कि सिर्फ अयस्क निकालना विकास का अंतिम लक्ष्य नहीं हो सकता।
यदि लौह अयस्क बाहर जाए और तैयार उत्पाद कहीं और बने, यदि कोयले से ऊर्जा पैदा हो लेकिन स्थानीय अर्थव्यवस्था में पर्याप्त रोजगार न बने, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि संसाधन संपदा का स्थानीय आर्थिक मूल्य कितना बढ़ा।
इसीलिए झारखंड के सामने भविष्य की चुनौती माइनिंग से आगे बढ़कर वैल्यू एडिशन, मैन्युफैक्चरिंग, MSME, कौशल और स्थानीय उद्यमिता को मजबूत करने की है।
पलायन को केवल समस्या मानना भी सही नहीं
झारखंड की विकास कहानी में पलायन का सवाल भी महत्वपूर्ण है।
हर पलायन मजबूरी नहीं होता। बेहतर वेतन, शिक्षा और करियर के लिए दूसरे शहर में जाना आर्थिक अवसर भी हो सकता है।
लेकिन जब किसी व्यक्ति को स्थानीय स्तर पर पर्याप्त रोजगार, कौशल के अनुरूप अवसर या आय का विकल्प न मिलने के कारण बाहर जाना पड़े, तो यह स्थानीय अर्थव्यवस्था की चुनौती का संकेत बन जाता है।
इसलिए असली सवाल यह नहीं है कि झारखंड से कितने लोग बाहर जाते हैं।
सवाल यह है कि कितने लोगों के पास अपने राज्य में रहने और आगे बढ़ने का वास्तविक विकल्प है?
छत्तीसगढ़ और उत्तराखंड से क्या सीख मिलती है?
छत्तीसगढ़ ने खनिज अर्थव्यवस्था के साथ कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी अपनी विकास बहस का हिस्सा बनाया।
वहीं उत्तराखंड का अनुभव अलग है। वहां पहाड़ी और मैदानी क्षेत्रों की भौगोलिक परिस्थितियां अलग होने के कारण पर्यटन, सेवा क्षेत्र, बुनियादी ढांचे और पलायन की चुनौती अलग रूप में सामने आती है।
झारखंड की चुनौती इन दोनों से अलग है।
यहां एक तरफ विशाल खनिज संसाधन और औद्योगिक आधार है, तो दूसरी तरफ बड़ी ग्रामीण आबादी, आदिवासी क्षेत्र, वन क्षेत्र और संसाधन आधारित आजीविका की अपनी विशिष्ट जरूरतें हैं।
इसलिए झारखंड के लिए विकास का मॉडल केवल किसी दूसरे राज्य की नकल से तैयार नहीं हो सकता।
अब बहस सिर्फ विकास की नहीं, खनिज अधिकारों की भी है
यहीं से कहानी संविधान और खनिज अधिकारों तक पहुंचती है।
संविधान की सातवीं अनुसूची में खनिजों से संबंधित अलग-अलग विधायी शक्तियां केंद्र और राज्यों के बीच बांटी गई हैं।
2024 में सुप्रीम कोर्ट की नौ-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने Mineral Area Development Authority v. Steel Authority of India मामले में खनिज अधिकारों पर राज्यों की कराधान शक्ति से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्नों पर फैसला दिया। सुप्रीम कोर्ट के रिकॉर्ड में इस मामले का निर्णय 25 जुलाई 2024 को दर्ज है।
इस फैसले के बाद खनिज अधिकारों पर राज्य की कराधान शक्ति और संसद द्वारा उस शक्ति पर लगाई जा सकने वाली सीमाओं को लेकर संवैधानिक बहस और महत्वपूर्ण हो गई।
फिर आया MMDR Amendment Act, 2026
अगस्त 2026 में केंद्र सरकार ने Mines and Minerals (Development and Regulation) Amendment Act, 2026 लागू किया।
केंद्र सरकार के अनुसार इसका उद्देश्य खनन क्षेत्र में एक समान और अनुमान योग्य राजकोषीय व्यवस्था बनाना है। सरकार का कहना है कि राज्यों को खनन से मिलने वाले राजस्व का करीब 90 प्रतिशत हिस्सा मिलता रहेगा।
संशोधन में नया Section 9D जोड़ा गया है। इसके तहत खनिज अधिकारों और mineral-bearing lands पर राज्य सरकारों द्वारा कर, cess या अन्य levy लगाने को केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित शर्तों और प्रतिबंधों से जोड़ा गया है। संशोधन में पहले से बकाया या वसूल न किए गए कुछ levies के संबंध में भी प्रावधान किए गए हैं।
यहीं से राज्यों की चिंता सामने आती है।
केंद्र का तर्क क्या है?
केंद्र सरकार का तर्क है कि अलग-अलग राज्यों में खनिजों पर अलग-अलग प्रकार के कर और शुल्क लगने से खनन की लागत बढ़ सकती है और निवेश तथा उद्योग की प्रतिस्पर्धात्मकता प्रभावित हो सकती है।
PIB के अनुसार राज्यों को खनन क्षेत्र से मिलने वाला राजस्व कम नहीं किया गया है और लगभग 90 प्रतिशत खनन राजस्व राज्यों को ही मिलता रहेगा।
केंद्र सरकार का एक और तर्क यह है कि खनिज केवल उस राज्य की अर्थव्यवस्था का हिस्सा नहीं हैं जहां वे पाए जाते हैं। कोयला, लौह अयस्क, बॉक्साइट और दूसरे खनिज बिजली, स्टील, निर्माण, परिवहन और रणनीतिक उद्योगों के लिए राष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण हैं।
लेकिन झारखंड का सवाल क्या है?
झारखंड सरकार ने इस कानून के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाने का निर्णय लिया है।
14 सितंबर 2026 को द न्यू इंडियन एक्सप्रेस ने रिपोर्ट किया कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने MMDR Amendment Act के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाने के फैसले को मंजूरी दी है। राज्य के वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने इसे झारखंड के संदर्भ में चुनौतीपूर्ण बताया और कहा कि राज्य कानूनी रास्ता अपनाएगा।
राज्य सरकार का दावा है कि केंद्र से कोयला रॉयल्टी और जमीन से संबंधित मदों में करीब 1.36 लाख करोड़ रुपये का दावा जुड़ा हुआ है। यह राज्य सरकार का दावा है; इसकी अंतिम कानूनी स्थिति न्यायिक प्रक्रिया में तय होगी।
यहीं पर सवाल केवल राजस्व का नहीं रह जाता।
सवाल संघीय ढांचे का भी है।
2024 और 2026 के बीच असली सवाल क्या बदला?
2024 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने खनिज अधिकारों पर राज्यों की कराधान शक्ति से जुड़ा महत्वपूर्ण संवैधानिक दृष्टिकोण सामने रखा।
2026 का संशोधन उस शक्ति के इस्तेमाल पर नए वैधानिक प्रतिबंधों का ढांचा बनाता है।
इसलिए अब असली प्रश्न यह है कि—
क्या संसद द्वारा लगाए गए ये प्रतिबंध संविधान में राज्यों को मिली कराधान शक्ति की सीमा के भीतर हैं?
और दूसरा प्रश्न—
क्या खनिज अधिकारों और mineral-bearing land से जुड़े अलग-अलग प्रकार के करों पर एक समान व्यवस्था लागू करने से राज्यों की अन्य संवैधानिक शक्तियां भी प्रभावित होंगी?
इन सवालों का अंतिम उत्तर अदालतों से ही आएगा।
झारखंड के सामने असली चुनौती यहीं से शुरू होती है
मान लीजिए कि खनिज से राज्य को पर्याप्त राजस्व मिलता है।
तो अगला सवाल होना चाहिए—उस राजस्व का कितना हिस्सा मानव विकास में बदलता है?
कितने युवाओं को स्थानीय रोजगार मिलता है?
कितने आदिवासी और ग्रामीण परिवारों की आय बढ़ती है?
खनन वाले इलाकों में स्वास्थ्य और शिक्षा की स्थिति कैसी है?
विस्थापन और पर्यावरण की लागत का भुगतान कौन करता है?
और सबसे महत्वपूर्ण—
क्या खनिज निकालने के बाद उसकी अधिकतम आर्थिक वैल्यू झारखंड के भीतर ही पैदा होती है?
झारखंड सरकार की मौजूदा औद्योगिक नीति में भी प्राकृतिक संसाधनों का value addition, रोजगार और राज्य में उद्योगों की स्थापना को महत्वपूर्ण उद्देश्य बताया गया है।
यानी चुनौती की पहचान सरकार के अपने नीति दस्तावेजों में भी मौजूद है।
2050 की ओर देखता झारखंड
अब झारखंड ने भविष्य की चर्चा को 2050 तक ले जाने की कोशिश शुरू की है।
राज्य सरकार के विजन दस्तावेजों और हालिया प्रस्तुतियों में खनिजों के साथ तकनीक, critical minerals, value addition, पर्यावरणीय जिम्मेदारी, skilled employment और inclusive growth पर जोर दिया गया है।
इसका मतलब है कि आने वाले वर्षों में झारखंड के लिए केवल यह पर्याप्त नहीं होगा कि वह देश का बड़ा खनिज उत्पादक राज्य बना रहे।
उसे यह साबित करना होगा कि खनिज संपदा से पैदा होने वाली आर्थिक शक्ति मानव संपदा में बदल सकती है।
आखिरी सवाल
26 साल पहले झारखंड ने एक राजनीतिक और प्रशासनिक पहचान हासिल की थी।
अब 26 साल बाद उसके सामने विकास की एक नई परीक्षा है।
क्या झारखंड केवल देश का खनिज भंडार बना रहेगा?
या फिर खनिज, जंगल, जमीन और मानव संसाधन—इन सबको मिलाकर ऐसी अर्थव्यवस्था बनाएगा जिसमें स्थानीय युवा को रोजगार मिले, स्थानीय उद्यमी को अवसर मिले, आदिवासी और ग्रामीण समाज की भागीदारी बढ़े और प्राकृतिक संसाधनों का लाभ व्यापक रूप से लोगों तक पहुंचे?
खनिज पर अधिकार की संवैधानिक बहस अपनी जगह महत्वपूर्ण है।
लेकिन उससे भी बड़ा सवाल शायद यह है—
जिस खनिज संपदा ने झारखंड को आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण बनाया, क्या वही संपदा झारखंड के लोगों के जीवन को भी उतना ही मजबूत बना पाएगी?
यही 2000 से 2026 तक की झारखंड की कहानी का सबसे बड़ा सवाल है। और शायद 2050 तक की सबसे बड़ी चुनौती भी।
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