भाई साहब, पैसा आया कहां से?

Anand Kumar
3 Min Read

Shashi Singh

कमाई

हमारे समाज में एक प्रचलित कहावत है: “औरत की उम्र और मर्द की कमाई नहीं पूछी जाती।”
यह बात इतने आत्मविश्वास से कही जाती है मानो यह कोई शालीनता का सिद्धांत हो। लेकिन अगर हम इस कहावत को गौर से देखें, तो इसके भीतर एक ऐसा अंधकार छिपा है जो पारदर्शिता, जवाबदेही और सामाजिक न्याय की बुनियाद को ही खोखला कर देता है।

मैं स्पष्ट शब्दों में कहता हूँ, कमाई पूछी जानी चाहिए, और वह भी ज़ोर से पूछी जानी चाहिए!

दरअसल, हमारे देश में भ्रष्टाचार के जो अनगिनत रूप हैं, वे इसी प्रवृत्ति से उपजे हैं। चाहे कोई कितने भी धतकरम से कमाई करे, फिर भी कमाई मत पूछो। व्यक्ति की कमाई को “निजी” और “गोपनीय” मान लिया गया है। जब तक समाज को यह अधिकार नहीं मिलेगा कि वह सवाल करे, “आप क्या कमाते हैं और कैसे कमाते हैं?” तब तक भ्रष्टाचार को जड़ से मिटा पाना असंभव है।

यह भी पढ़े – मिशन झारखंड – 2029 : मोदी-शाह का नया प्लान, क्या चंपाई-अर्जुन बदलेंगे राजनीति?

पारदर्शिता के बिना नैतिकता नहीं आती। अगर एक नागरिक बड़े बंगले में रहता है, महंगी गाड़ियों से चलता है, विदेश घूमता है, लेकिन उसके पेशे और टैक्स रिटर्न में इसका कोई हिसाब नहीं है, तो यह सवाल समाज को पूछना चाहिए:

“भाई साहब, यह सब पैसा आया कहां से?”

और अगर जवाब नहीं मिले, तो उस व्यक्ति को सिर्फ कानूनी नहीं, सामाजिक रूप से भी बेनक़ाब किया जाना चाहिए। शर्मिंदा किया जाना चाहिए। हमें एक ऐसी सामाजिक संस्कृति की ज़रूरत है जहाँ ईमानदार व्यक्ति को मंच मिले और बेईमान को तिरस्कार।

ईमानदार उद्यमी एक सच्चा रचनाकार है। यह भी समझना ज़रूरी है कि उद्यमिता केवल पैसों का खेल नहीं है। एक ईमानदार उद्यमी उतना ही रचनात्मक होता है जितना एक लेखक, एक कवि या एक वैज्ञानिक। वह जोखिम लेता है, नवाचार करता है, लोगों को रोज़गार देता है और समाज को आगे बढ़ाता है। ऐसे लोगों को खुलकर सम्मानित किया जाना चाहिए।

मेरी सीधी माँग है कि देश के हर आम और खास, यानी हर नागरिक का ITR सार्वजनिक हो।

यह निजता का उल्लंघन नहीं, बल्कि सामाजिक उत्तरदायित्व है। अगर आपकी संपत्ति समाज को प्रभावित करती है, चाहे वह घर हो, गाड़ी हो, ज़मीन हो या निवेश, तो उस संपत्ति के स्रोत की पारदर्शिता भी समाज का अधिकार बनती है।

पारदर्शिता ही भ्रष्टाचार के विषाणु का एंटीबायोटिक है। बाकी सारे उपाय सिर्फ मरहम-पट्टी हैं।

… और हां, औरत का उम्र छुपाना भी भ्रष्टाचार है। दादी की उम्र में भी “आँटी मत कहना!” बोलने वालियों पर तो भारतीय न्याय संहिता की धारा 318 (पूर्व IPC 420) के तहत मुक़दमा किया जाना चाहिए।

यह भी पढ़ें – झारखंड राज्यसभा चुनाव : क्या कांग्रेस अपनी राजनीतिक हैसियत बचा पाएगी

Share This Article
Follow:
वरिष्ठ पत्रकार आनंद कुमार करीब 30 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय हैं। उन्होंने एम.ए. (इतिहास), बैचलर ऑफ जर्नलिज्म और एमबीए (मार्केटिंग) की शिक्षा प्राप्त की है। 1996 में 'प्रभात खबर', रांची से बतौर प्रशिक्षु पत्रकार करियर की शुरुआत करके 'हिन्दुस्तान' और 'अमर उजाला' जैसे राष्ट्रीय समाचार पत्रों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल चुके आनंद कुमार हिन्दुस्तान, जमशेदपुर के स्थानीय संपादक भी रहे हैं। इसके अलावा The Photon News अखबार सहित Lagatar.in तथा Newswing.com जैसे डिजिटल माध्यमों में संपादक पद का दायित्व संभाल चुके हैं। इसके अलावा आनंद कुमार कॉरपोरेट कम्यूनिकेशन/जनसंपर्क, प्रबंधन, सरकार/प्रशासन और मीडिया शिक्षण का भी गहन अनुभव रखते हैं। उन्होंने सरयू राय - एक नाम कई आयाम' नामक पुस्तक का संपादन भी किया है।
Leave a Comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *